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कविता @ पेड लगाबो…

आवव एकक पेड़ लगाबो,महतारी के नाव में।मया अउ दुलार हम पाबो,जेखर कोंवर छाँव में।पेड़ लगा के निसदिन करबो,हम ओखर निगरानी।जरूरत परे मा देवत रहिबो,सरलग खातू पानी।मया अउ दुलार ल पाके,ओ रुख ह जब बाड़ जाही।कोवर कोवर छाँव दिही अउ,सुघ्घर फूल फर आही।दाई के अंचरा कस छाँव म,अपन थकान ल मिटाबो।ओखर परोसे कस गुरतुर,फल फलहारी खाबो।हर मइनखे ल तइयार करन,जम्मो शहर …

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कविता @ बाल श्रमिक…

आज एक नए युग,भारत का उदय हो रहा।देश में बहुत से, बालयुवा अंधेरों में जी रहा।अपने जिंदगी तंग आकर, होटलढाबा कारखाना में काम कर रहा।हालात और गरीबी से मजबूर,श्रमिकों के समक्ष गहरा रहा।जिनके हाथों में कलम किताब,वो मजदूरी दिहाड़ी कर रहा।बच्चे देश का निर्माण भविष्य,भारत का संविधान भी कह रहा।गरीबी की खातिर पेट के लिए,दो वक्त रोटी कमाने निकल रहा।पढ़ने …

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लेख @ पृथ्वी की उष्णता और जटिल समाधान, भविष्य ऑक्सीजन के बगैर ?

आजादी हमें मिली है यानी कि मानव को परंतु प्रकृति आजादी से अछूती रही है। अमूमन हमारी जरूरत रोटी, कपड़ा, मकान और जल की थी कि हमको उद्योग धंधे का विकास तीव्र गति से करना पड़ा। मशीनें जितनी बड़ी से बड़ी होती गई आदमी उतना ही बौना होता गया। जब हम अपने विकास का इतिहास देखते हैं तो ब्रिटिश सत्ता …

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