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संपादकीय@घोषणाओं से आगे बढ़े छत्तीसगढ़ अब फैसलों को चाहिए जमीन

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500 करोड़ का स्टार्टअप मिशन,33 जिलों में उद्यमिता केंद्र और नई निर्यात नीति—साय सरकार ने विकास की दिशा तो तय की, अब परिणाम दिखाने की बारी है किसी सरकार की दिशा उसके भाषणों से नहीं,उसके फैसलों से दिखाई देती है। और फैसलों की असली कीमत तब सामने आती है,जब उनका असर फाइलों से निकलकर खेत,कारखाने, बाजार और युवा की जिंदगी तक पहुंचता है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में 9 सितंबर को हुई कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है। सरकार ने युवाओं के लिए ‘मुख्यमंत्री स्टार्टअप एवं एनआईपीयूएन मिशन’ को मंजूरी दी है,जिसके लिए अगले पांच वर्षों में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके तहत प्रदेश के सभी 33 जिलों में उद्यमिता विकास केंद्र,100 इमर्जिंग टेक्नोलॉजी लैब और पांच इंडस्ट्री एक्सीलेंस सेंटर स्थापित किए जाने हैं। यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के युवा को देखने के नजरिए में बदलाव का संकेत है। अब तक रोजगार की चर्चा का केंद्र सरकारी नौकरी रहा है। स्टार्टअप मिशन की सोच इससे आगे जाती है—युवा नौकरी मांगने वाला ही नहीं,नौकरी देने वाला भी बने। लेकिन यही वह जगह है जहां सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होती है। स्टार्टअप सेंटर बना देना आसान है, स्टार्टअप खड़ा करना मुश्किल। लैब खोल देना आसान है,उसमें पैदा हुए विचार को बाजार तक पहुंचाना कठिन। युवाओं को प्रशिक्षण देना आसान है,उन्हें प्रशिक्षण के बाद टिकाऊ रोजगार या व्यवसाय दिलाना कठिन।
इसलिए 500 करोड़ रुपये का असली मूल्य इस बात से तय होगा कि इससे कितने सफल उद्यम खड़े हुए,कितने युवाओं को रोजगार मिला और कितने युवा अपने जिले में रहकर अपना कारोबार शुरू कर सके।
छत्तीसगढ़ की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। रायपुर,दुर्ग या भिलाई में स्टार्टअप संस्कृति विकसित करना एक बात है,लेकिन सरगुजा,बस्तर,बलरामपुर,जशपुर,कोरिया या सुकमा के युवाओं तक उद्यमिता का यह अवसर पहुंचाना दूसरी बात। अगर 33 जिलों में केंद्र बनते हैं, लेकिन उनकी गतिविधियां कुछ शहरों तक सिमट जाती हैं, तो मिशन अपनी मूल भावना से दूर चला जाएगा।
कैबिनेट ने छत्तीसगढ़ निर्यात प्रोत्साहन नीति 2026-30 को भी मंजूरी दी है। इसका लक्ष्य राज्य को प्रमुख निर्यात केंद्र बनाना,लॉजिस्टिक्स और निर्यात इकोसिस्टम मजबूत करना तथा कृषि और औद्योगिक क्षेत्र के मूल्यवर्धित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना है। ई-कॉमर्स, व्यापार मेलों और प्रदर्शनियों के जरिए प्रदेश के उद्यमियों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की योजना भी है।
यह फैसला छत्तीसगढ़ के लिए विशेष महत्व रखता है…
यह प्रदेश वर्षों से खनिज संपदा के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब समय केवल धरती से संसाधन निकालने का नहीं,उन संसाधनों से मूल्य पैदा करने का है। धान से तैयार उत्पाद,वन उपज,हस्तशिल्प,खाद्य प्रसंस्करण,औद्योगिक उत्पाद और स्थानीय कारीगरों की कला—इन सबको वैश्विक बाजार मिल सकता है।
जरूरत केवल नीति की नहीं,बाजार तक पहुंच की है…
एक आदिवासी महिला द्वारा तैयार किया गया वन उत्पाद यदि गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है, तो वह सिर्फ एक उत्पाद का निर्यात नहीं होगा;वह छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी। इसी क्रम में नवा रायपुर में नेशनल स्किल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के लिए 10 एकड़ जमीन नि:शुल्क उपलब्ध कराने का फैसला भी महत्वपूर्ण है। प्रस्तावित संस्थान में आधुनिक तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था होगी। आज उद्योग को डिग्री से ज्यादा दक्षता चाहिए। मशीनें बदल रही हैं, तकनीक बदल रही है,रोजगार के तरीके बदल रहे हैं। ऐसे समय में कौशल विकास को केवल प्रमाणपत्र बांटने की प्रक्रिया बना देना युवाओं के साथ अन्याय होगा।
कौशल वही सफल है,जो रोजगार से जुड़े
इसलिए एनएसटीआई से निकलने वाले युवा कितने प्रशिक्षित हुए, यह आंकड़ा पर्याप्त नहीं होगा। असली आंकड़ा यह होना चाहिए कि उनमें से कितनों को रोजगार मिला, कितनों ने अपना व्यवसाय शुरू किया और कितनों की आय में वास्तविक वृद्धि हुई। कैबिनेट ने शासकीय एवं संबद्ध संस्थाओं के कर्मचारियों को अन्य शासकीय सेवाओं और उच्च पदों के लिए आवेदन करने की अधिकतम आयु सीमा 38 से बढ़ाकर 45 वर्ष करने का निर्णय भी लिया है। इससे पात्र कर्मचारियों को सात वर्ष की अतिरिक्त गुंजाइश मिलेगी। यह फैसला उन लोगों के लिए अवसर का विस्तार है, जो वर्षों से सेवा करते हुए भी बेहतर पद की प्रतिस्पर्धा से उम्र की सीमा के कारण बाहर हो जाते थे।
दुर्ग में नए जिला न्यायालय भवन के लिए भूमि उपलब्ध कराने का निर्णय भी न्यायिक अधोसंरचना को मजबूत करने की दिशा में है।इन फैसलों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए तो सरकार का संदेश साफ दिखाई देता है…युवा,कौशल, रोजगार,उद्यमिता,निर्यात और संस्थागत ढांचे को विकास के अगले चरण का आधार बनाना। लेकिन किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषणा और उपलब्धि के बीच पैदा होने वाली दूरी होती है। कागज पर 33 उद्यमिता केंद्र बहुत अच्छे लगते हैं। 100 टेक्नोलॉजी लैब प्रभावशाली लगती हैं। 500 करोड़ रुपये बड़ी राशि है। निर्यात नीति का लक्ष्य भी महत्वाकांक्षी है लेकिन जनता को अंततः यह नहीं देखना कि कितनी घोषणाएं हुईं। जनता यह देखेगी कि उसके बेटे को नौकरी मिली या नहीं,उसकी बेटी ने अपना कारोबार शुरू किया या नहीं, किसान की उपज को नया बाजार मिला या नहीं,स्थानीय उद्योग को विदेश से ऑर्डर मिला या नहीं। यही वजह है कि इन योजनाओं के साथ जवाबदेही का ढांचा भी उतना ही जरूरी है।सरकार को हर वर्ष सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि स्टार्टअप मिशन पर कितना खर्च हुआ,कितने स्टार्टअप शुरू हुए,कितने बंद हुए, कितने रोजगार बने और कितने उद्यम बाजार में टिके। निर्यात नीति के तहत प्रदेश के निर्यात में कितनी वृद्धि हुई,कितने नए निर्यातक जुड़े और किन जिलों के उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचे—इनका भी हिसाब जनता के सामने आना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में बजट सरकार का होता है, लेकिन उसकी सफलता जनता की होती है…
साय सरकार के सामने अब एक बड़ा अवसर है। छत्तीसगढ़ को यदि केवल खनिज और धान की पहचान से आगे ले जाना है, तो स्थानीय प्रतिभा, स्थानीय उत्पाद और स्थानीय उद्यम को वैश्विक बाजार से जोड़ना होगा। और इसके लिए सबसे जरूरी है—नीति में निरंतरता, क्रियान्वयन में पारदर्शिता और परिणामों में जवाबदेही। कैबिनेट ने दिशा की घोषणा कर दी है। अब प्रदेश यह देखना चाहेगा कि यह दिशा कितनी दूर तक जाती है।
क्योंकि छत्तीसगढ़ को अब केवल ऐसी सरकार नहीं चाहिए जो अच्छी योजनाएं बनाए। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जो अच्छी योजनाओं को अच्छे परिणामों में बदल सके। यही आज की कैबिनेट के फैसलों की असली कसौटी है। और आने वाले पांच साल इस बात का जवाब देंगे कि 500 करोड़ की यह पहल केवल बजट की एक बड़ी संख्या थी या छत्तीसगढ़ के युवाओं के भविष्य को बदलने वाली वास्तविक शुरुआत।


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