Breaking News

संपादकीय

लेख@ वकालत को सुरक्षित पेशा ही नहीं,सुरक्षित जीवन भी चाहिए : अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण की नई परिकल्पना : सुरक्षा,शुरुआती संघर्ष, बीमारी,वृद्धावस्था और न्यायालयीन कार्यस्थल…पांचों मोर्चों पर एक समग्र व्यवस्था की जरूरत…किसी न्यायालय में जब कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल की ओर से खड़ा होकर तर्क रखता है,तो सामने दिखाई देता है केवल उसका पेशेवर पक्ष। उसके पीछे एक ऐसा जीवन भी है जिसमें रोज की तैयारी, लगातार अध्ययन, न्यायालयीन दौड़-भाग,मुवक्किलों की …

Read More »

संपादकीय@ सड़कें गड्ढों में नहीं,व्यवस्था की जवाबदेही में फंसी हैं…

सरगुजा की सड़कें इन दिनों केवल राहगीरों की परीक्षा नहीं ले रहीं,बल्कि व्यवस्था की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रही हैं। सड़क पर गड्ढा होना सामान्य बात हो सकती है,लेकिन एक ही सड़क का बार-बार टूटना,बारिश आते ही सड़क का गड्ढों में बदल जाना और मरम्मत के नाम पर कुछ दिनों के लिए खानापूर्ति कर देना सामान्य नहीं कहा …

Read More »

संपादकीय@घोषणाओं से आगे बढ़े छत्तीसगढ़ अब फैसलों को चाहिए जमीन

500 करोड़ का स्टार्टअप मिशन,33 जिलों में उद्यमिता केंद्र और नई निर्यात नीति—साय सरकार ने विकास की दिशा तो तय की, अब परिणाम दिखाने की बारी है किसी सरकार की दिशा उसके भाषणों से नहीं,उसके फैसलों से दिखाई देती है। और फैसलों की असली कीमत तब सामने आती है,जब उनका असर फाइलों से निकलकर खेत,कारखाने, बाजार और युवा की जिंदगी …

Read More »

संपादकीय@ एक कमेंट से पत्थर तकः आखिर हम कब सीखेंगे कि सोशल मीडिया खिलौना नहीं है?

बिलासपुर की हिंसक झड़प ने फिर चेताया…शब्द स्क्रीन पर लिखे जाते हैं,लेकिन उनका असर सड़क तक पहुंच सकता है। बिलासपुर के खपरगंज में सोशल मीडिया पर किए गए कथित आपत्तिजनक कमेंट से शुरू हुआ विवाद देर रात दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प और पथराव तक पहुंच गया। स्थिति संभालने पहुंची पुलिस भी पथराव की चपेट में आई और थाना …

Read More »

संपादकीय@पोस्टर में कमजोर विद्यार्थी, असली परीक्षा में सरकार

छत्तीसगढ़ की राजनीति में पोस्टर वार ने फिर गर्माया माहौल;व्यंग्य के पीछे उठे सवालों का जवाब नारों से नहीं,काम से देना होगाछत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों पोस्टर केवल दीवारों पर चिपके कागज नहीं रह गए हैं। वे सत्ता और विपक्ष के बीच चल रहे राजनीतिक संवाद,आरोप-प्रत्यारोप और जनता के बीच अपनी-अपनी कहानी स्थापित करने का माध्यम बन चुके हैं। …

Read More »

संपादकीय@ संत की वाणी में संयम जरूरी

अयोध्या के महंत राजू दास और कुंवर सिंह निषाद के बीच विवाद ने फिर खड़ा किया सवाल—धार्मिक पद गरिमा देता है, अपशब्द बोलने का अधिकार नहींअयोध्या केवल एक शहर नहीं,करोड़ों लोगों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। हनुमानगढ़ी जैसे धार्मिक स्थल से जुड़े संत-महंतों से समाज सामान्य व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक संयम, मर्यादा और विनम्रता की अपेक्षा …

Read More »

संपादकीय@मिठास की धरती पर चीनी महंगी क्यों?

जिस देश ने दुनिया को चीनी बनाना सिखाया,आज उसी देश में मिठास की कीमत आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही है । भारत में चीनी केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है। यह हमारी संस्कृति,त्योहारों,परंपराओं और सामाजिक जीवन का हिस्सा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक,खुशी से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक—चीनी,गुड़ और मिठाई हमारी जिंदगी में किसी न किसी …

Read More »

संपादकीय@जब अफसर की सख्ती से खाने की थाली तक बदलने लगे रंग

तुकाराम मुंढे का ‘FDA मॉडल’ बना चर्चा का विषय,लेकिन असली चुनौती कार्रवाई से आगे जाकर व्यवस्था को स्थायी रूप से बदलने की खाना हमारी जिंदगी की सबसे बुनियादी जरूरत है। लेकिन जिस चीज के बिना जीवन संभव नहीं, उसी भोजन की गुणवत्ता को लेकर हमारा समाज अक्सर सबसे ज्यादा लापरवाह दिखाई देता है। चमचमाते होटल हों या सड़क किनारे का …

Read More »

संपादकीय@ जब सत्ता की गाड़ी फंसी तब जागा सिस्टम

जनता के लिए गड्ढे वर्षों तक नहीं दिखे…सत्ता की गाड़ी फंसी तो व्यवस्था की आंखें खुल गईं…कभी-कभी एक छोटी-सी घटना पूरी व्यवस्था का बड़ा सच सामने ला देती है। 20 अगस्त को एनएच-43 पर सत्तारूढ़ दल के प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय की गाड़ी का गहरे गड्ढे में फंसना भी ऐसी ही घटना है। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि …

Read More »

संपादकीय@अगर मैं मुख्यमंत्री का सलाहकार होता… तो सत्ता बचाने नहीं…विश्वास जीतने की सलाह देता…

लोकतंत्र में सरकारें केवल घोषणाओं से नहीं,बल्कि जनता के अनुभव से बनती और बिगड़ती हैं। चुनाव से कुछ महीने पहले सड़कें बनवाना, योजनाओं की बौछार करना और विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर देना अब उतना प्रभावी नहीं रह गया है। आज का मतदाता पहले से कहीं अधिक जागरूक है। वह देखता है कि सरकार ने पूरे कार्यकाल में क्या …

Read More »