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संपादकीय

संपादकीय@ क्या हम सचमुच एक सभ्य समाज में जी रहे हैं ?

एक 13 वर्षीय मासूम बच्ची…पांच दिनों तक कथित बंधक जैसी स्थिति… और उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में 32 लोगों की गिरफ्तारी। यदि जांच और न्यायिक प्रक्रिया में ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह केवल एक जघन्य अपराध नहीं होगा,बल्कि सभ्य समाज के चेहरे पर ऐसा काला धब्बा होगा,जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। यह घटना केवल एक परिवार …

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संपादकीय@ फरार अपराधी,सवालों के घेरे में व्यवस्था और कानून की परीक्षा

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि कानून अपराधी से अधिक शक्तिशाली दिखाई दे। लेकिन जब किसी बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास का सजायाफ्ता दोषी वर्षों तक दूसरे राज्य के एक शहर में कथित रूप से रह सके और उसकी तलाश में आई पुलिस के सामने भी फरार हो जाए,तो सवाल केवल एक आरोपी …

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लेख @ पत्रकार बनने के लिए क्या सचमुच पत्रकारिता की डिग्री चाहिए!

आपका मूल मैटर कई महत्वपूर्ण बिंदुओं के साथ था…जिनमें कुछ उदाहरण और आपकी व्यक्तिगत टिप्पणी भी थी…जो पिछले संपादन में संक्षिप्त हो गए…नीचे उसी विचार को संपादकीय पृष्ठ की साहित्यिक शैली में… बिना मूल भाव छोड़े…पूर्ण रूप से प्रस्तुत किया गया है…पिछले कुछ समय से एक नया तर्क गढ़ा जा रहा है कि जिसने जर्नलिज्म की पढ़ाई नहीं की,वह पत्रकार …

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संपादकीय @ गाली से नहीं दबेगा सवाल

डिजिटल पत्रकारिता क्यों चुभ रही है?डॉक्टर्स डे के एक सार्वजनिक मंच से स्वतंत्र पत्रकारों,सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स और यूट्यूब पत्रकारों के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया,उसने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। असहमति का उत्तर तर्क से दिया जाना चाहिए या अपशब्दों से? जब किसी पत्रकार को चोर, चोट्टा या उससे भी अधिक अशोभनीय शब्दों से …

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लेख@ कानूनी नोटिस या दबाव की रणनीति?

खबरों पर सवाल उठाने वालों के लिए भी जरूरी है जवाबदेही जब खबर छपती है…तो सवाल उठते हैं…जब सवालों पर नोटिस आता है…तो लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है… पत्रकारिता का मूल धर्म है — सवाल पूछना। सत्ता,व्यवस्था और संस्थानों से जवाब मांगना। लेकिन यही पत्रकारिता तब कटघरे में खड़ी हो जाती है जब सवालों के जवाब देने के …

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संपादकीय@ मंच की कुर्सी,प्रोटोकॉल और लोकतंत्र की मर्यादा

शासकीय आयोजनों में दिखावे की संस्कृति पर विराम लगाने की जरूरत…लोकतंत्र में पद का सम्मान जरूरी है,लेकिन पद से भी ऊपर जनता का सम्मान होता है। शासकीय कार्यक्रम जनता के लिए होते हैं और इन कार्यक्रमों का उद्देश्य शासन की योजनाओं, जनहित के कार्यों और सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ाना होता है। ऐसे में यदि किसी कार्यक्रम में चर्चा का …

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लेख@भरोसे के रिश्तों के कत्ल से कांपता समाज

पुणे के लोहगढ़ किले की ऊंची पहाड़ी से मंगेतर केतन अग्रवाल को धक्का देकर हत्या करने के आरोप में सिया गोयल की गिरफ्तारी ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इससे पहले मेघालय में इंदौर के राजा रघुवंशी की हनीमून के दौरान कथित तौर पर पत्नी सोनम रघुवंशी द्वारा प्रेमी के साथ मिलकर की गई हत्या की घटना ने भी …

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लेख@बदलते मौसम का बढ़ता जोखिम

भारत में मानसून केवल एक ऋ तु नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, कृषि,जल-संसा धनों और जन जीवन की धुरी है। सदियों से मानसून को जीवनदायी माना जाता रहा है क्योंकि इसकी वर्षा खेतों को हरियाली देती है,नदियों और जलाशयों को भरती है तथा भीषण गर्मी से राहत प्रदान करती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मानसून का स्वरूप तेजी …

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लेख@मादक पदार्थों का बढ़ता साम्राज्य और सिमटते सपने

ड्रग्स के दलदल में धंसती युवा पीढ़ी… किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के सपनों,ऊर्जा और सृजनशीलता पर निर्भर करता है लेकिन जब यही युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आने लगे तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह जाती बल्कि राष्ट्रीय संकट का रूप धारण कर लेती है। आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के …

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लेख@वर्तमान परीक्षा प्रणाली की परीक्षा…

कोई जमाना था जब विद्यार्थी लोग गुरुकुल में जाकर शिक्षा प्राप्त करते थे। विद्यार्थी लोग अपने गुरुजनों की देखरेख तथा मार्गदर्शन में सब प्रकार की शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरुकुलों में कहीं भी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता था। जब वह गुरुकुलों से शिक्षा प्राप्त करके बाहर निकलते थे तो वह आदर्श व्यक्ति के तौर पर ही निकलते थे।तब …

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