शिक्षक सिर्फ आसान निशाना बन गया
एक स्कूल में बच्चों से सजा के तौर पर गालियां लिखवाई गईं। वीडियो सामने आया और पूरा देश मानो फैसला सुनाने बैठ गया। किसी ने कहा शिक्षिका को बर्खास्त करो,किसी ने कहा जेल भेजो, किसी ने स्कूल की मान्यता खत्म करने की मांग कर दी।
लेकिन एक सवाल किसी ने नहीं पूछा…आखि़र बच्चे गालियां सीखते कहां से हैं? क्या किसी स्कूल की किताब में मां-बहन की गालियां पढ़ाई जाती हैं? क्या कोई शिक्षक कक्षा में खड़ा होकर बच्चों को अश्लील भाषा सिखाता है? जवाब सबको पता है—नहीं। फिर भी कटघरे में सिर्फ शिक्षक है।
बच्चा दिन के पांच-छह घंटे स्कूल में रहता है,लेकिन बाकी समय घर,गली, मोहल्ले, मोबाइल और सोशल मीडिया के बीच। घर में पिता गाली देता है, सड़क पर लोग गाली देकर झगड़ते हैं,क्रिकेट खेलते बच्चे गाली देते हैं,बारात में बजने वाले गानों में गालियां हैं,फिल्मों और वेब सीरीज में गालियां हैं,यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर गालियां मनोरंजन बन चुकी हैं।
लेकिन इन सब पर समाज चुप है।
सोशल मीडिया पर हर दिन ऐसे वीडियो वायरल होते हैं,जहां लोग खुलेआम अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्या कभी किसी ने मांग की कि इन लोगों के खिलाफ भी वैसी ही कार्रवाई हो जैसी एक शिक्षिका के खिलाफ मांग रहे हैं?
समस्या यह नहीं कि शिक्षिका से गलती हुई या नहीं। यदि अनुशासन के नाम पर गलत तरीका अपनाया गया है,तो नियम के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क्या कार्रवाई का मतलब यह है कि समाज अपनी सारी जिम्मेदारी शिक्षक पर डालकर मुक्त हो जाए?
सच यह है कि हमने शिक्षक को गुरु से कर्मचारी बना दिया है।
एक समय था जब शिक्षक का सम्मान परिवार से शुरू होता था। बच्चे गलती करते थे तो अभिभावक कहते थे—सर,जरूरत पड़े तो डांटिए,समझाइए, सुधारिए। आज स्थिति उलट गई है। शिक्षक की आवाज ऊंची हो जाए तो शिकायत,हल्का अनुशासन कर दे तो वीडियो,कोई काम बता दे तो कैमरे लेकर मीडिया पहुंच जाती है।
दूसरी तरफ वही बच्चा घर में घंटों मोबाइल पर क्या देख रहा है,किससे क्या सीख रहा है,इसकी चिंता कम ही दिखाई देती है।
सबसे बड़ा सवाल मीडिया से भी है।
यदि स्कूल में बच्चा झाड़ू लगा रहा हो,पानी भर रहा हो या कुर्सी उठा रहा हो तो कैमरे पहुंच जाते हैं। लेकिन शादी-ब्याह में डीजे पर बजते अश्लील और गाली-गलौज वाले गीतों पर शायद ही कभी कोई बहस होती है। सार्वजनिक स्थानों पर गालियां देते लोगों को देखकर भी कैमरे उतने आक्रामक नहीं होते।
क्या इसलिए कि वहां टीआरपी कम है?
समाज को तय करना होगा कि वह बच्चों को कैसी भाषा और कैसा वातावरण देना चाहता है। यदि घर,गली,मोबाइल और मनोरंजन के हर माध्यम से बच्चा गालियां सीख रहा है,तो केवल एक शिक्षिका को सजा देकर हम समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
कड़वा सच यही है कि बच्चे वही बोलते हैं,जो वे सुनते हैं।
अगर हमें सचमुच गालियां खत्म करनी हैं,तो शुरुआत स्कूल से नहीं,अपने घर से करनी होगी। क्योंकि गाली सिखाने वाला कोई स्कूल नहीं…हमारा समाज है।
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