



- सहकारिता में ‘वन डे सचिव’ मॉडल! नई पंजी से कर्मचारी वापसी और फिर लाखों का भुगतान
- पंजी बदली तो कहानी बदली! सोनपुर समिति में हर बैठक के साथ नया अध्याय
- ‘नई पंजी’ का कमाल…एक दिन का सचिव आया,कर्मचारी लौटा और खाते से लाखों निकले!
- पुरानी पंजी शायद भारी पड़ गई! सोनपुर में नई पंजी के सहारे फैसलों पर सवाल…
- पुरानी कार्यवाही पंजी शायद अब बोझ लगने लगी है,जब जरूरत पड़ी नई पंजी खुली,
- एक दिन का कार्यवाहक आया और फिर समिति के खाते से लाखों की राह भी खुल गई!
- सोनपुर समिति में 7 अगस्त के बाद 5 सितंबर को फिर नई कार्यवाही पंजी का खेल?
- पहले विवादित कर्मचारी की वापसी,फिर लंबित वेतन के नाम पर भुगतान—
- 7 अगस्त को अनुमति के बाद भुगतान की बात थी तो 5 सितंबर को किस अनुमति से खुला खजाना?
- विवेक की वापसी से लाखों के भुगतान तक….सोनपुर समिति में दस्तावेजों की जांच पर सवाल
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,20 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता विभाग में नियमों की किताब शायद इतनी मोटी हो गई है कि उसे पढ़ने के बजाय अब नई कार्यवाही पंजी खोलना ज्यादा आसान लगने लगा है,कम से कम आदिम जाति सेवा सहकारी समिति सोनपुर से सामने आए घटनाक्रम को देखकर तो यही व्यंग्यात्मक सवाल उठता है की यहां मामला सिर्फ किसी कर्मचारी की नियुक्ति या वेतन भुगतान का नहीं है,बल्कि सवाल उस पूरी व्यवस्था पर है जहां पुरानी कार्यवाही पंजी मौजूद होने के बावजूद नई पंजी सामने आती है,एक दिन के लिए कार्यवाहक सचिव/प्रबंधक की व्यवस्था होती है, विवादित कर्मचारी की वापसी का रास्ता खुलता है और कुछ समय बाद फिर नई पंजी में लाखों रुपये के भुगतान का निर्णय सामने आ जाता है,सवाल यह नहीं कि कर्मचारी को वेतन मिलना चाहिए या नहीं,सवाल यह है कि नियमों के दरवाजे से भुगतान हुआ या पंजी के पिछले दरवाजे से? और यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक था तो फिर इतनी नई-नई पंजी की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? सोनपुर समिति से जुड़े दस्तावेजों और सामने आए आरोपों के आधार पर पूरा घटनाक्रम अब सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर रहा है,खासकर बैंक शाखा भैयाथान के शाखा प्रबंधक एवं समिति के प्राधिकृत अधिकारी श्यामलाल सिंह की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि सक्षम विभागीय जांच और मूल अभिलेखों के परीक्षण से ही होगी।
पहला अध्याय—6 अगस्त की सूचना,मगर एजेंडा का रहस्य बरकरार!- सूत्रों के द्वारा बताया गया है कि श्यामलाल सिंह द्वारा 6 अगस्त 2026 को बोर्ड बैठक के लिए सूचना जारी की गई,अब यहां से सहकारिता की कहानी में पहला रोचक मोड़ आता है, बोर्ड की बैठक होनी थी तो एजेंडा क्या था? क्या सदस्यों को पहले से बताया गया था कि बैठक में कर्मचारी की नियुक्ति अथवा पुनर्नियुक्ति पर चर्चा होगी? क्या यह बताया गया था कि किसी विवादित कर्मचारी को वापस सेवा में लेने का प्रस्ताव आएगा? क्या वित्तीय भुगतान पर निर्णय होना था? या फिर बैठक का एजेंडा इतना गोपनीय था कि बोर्ड सदस्य बैठक में पहुंचने के बाद ही जानें कि आज कौन-सा अध्याय लिखा जाना है? यदि एजेंडा स्पष्ट था तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए, यदि स्पष्ट नहीं था तो इतनी महत्वपूर्ण कार्रवाई किस आधार पर हुई, यह जांच का विषय होना चाहिए था,क्योंकि बोर्ड बैठक कोई चाय की बैठक नहीं होती कि लोग बैठे, चर्चा की और जो मन आया लिख दिया, बोर्ड बैठक संस्था के आधिकारिक निर्णयों का आधार होती है।
दूसरा अध्याय—7 अगस्त को पुरानी पंजी ने क्या बिगाड़ा था?- 7 अगस्त 2026 को बोर्ड की बैठक हुई और आरोप है कि नई कार्यवाही पंजी संधारित की गई, यहीं सहकारिता के इस नए फार्मूले का जन्म होता दिखाई देता है की पुरानी पंजी है तो नई पंजी बनाओ,सचिव चाहिए तो एक दिन का सचिव बनाओ, प्रस्ताव चाहिए तो प्रस्ताव पारित करो, और फिर नियम पूछने वाला आए तो पंजी दिखाओ! व्यंग्य अपनी जगह है,लेकिन सवाल गंभीर है,यदि संस्था की मूल कार्यवाही पंजी मौजूद थी तो नई पंजी क्यों? क्या पुरानी पंजी में जगह खत्म हो गई थी? क्या पुरानी पंजी किसी जांच में थी? क्या उसे किसी सक्षम अधिकारी ने जब्त किया था? क्या पुरानी पंजी उपलब्ध नहीं थी? या फिर किसी खास कार्यवाही को अलग पंजी में दर्ज करना अधिक सुविधाजनक समझा गया? इन सवालों का जवाब समिति के रिकॉर्ड से मिल सकता है।
फिर आया 5 सितंबर—नई पंजी का दूसरा एपिसोड!- कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, 5 सितंबर 2026 को फिर नई कार्यवाही पंजी संधारित किए जाने का आरोप है, यानी 7 अगस्त की पंजी के बाद 5 सितंबर को फिर एक नई पंजी,अब यह सवाल और बड़ा हो गया…हर बैठक में नई पंजी क्यों? क्या पुरानी पंजी बैठक समाप्त होते ही सेवानिवृत्त हो जाती है? क्या सहकारिता में अब पंजी भी कार्यवाहक सचिव की तरह ‘एक दिन की’ हो गई है? या फिर हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए नया पन्ना नहीं, पूरी नई किताब जरूरी हो गई है? व्यंग्य छोड़ दें तो यह जांच का गंभीर विषय है।
एक साल से अधिक अनुपस्थिति का वेतन…‘काम नहीं तो वेतन’ का नया अध्याय?-सबसे गंभीर सवाल उन कर्मचारियों को लेकर भी है जिन्हें कथित तौर पर एक वर्ष से अधिक समय तक संस्था के काम से अनुपस्थित रहने की अवधि का वेतन दिए जाने की बात कही जा रही है,यदि कर्मचारी संस्था में उपस्थित नहीं था तो वेतन किस आधार पर? अगर वह अधिकृत अवकाश पर था तो उसका रिकॉर्ड कहां है? यदि उसकी अनुपस्थिति स्वीकृत थी तो आदेश कहां है? यदि वह सेवा में था लेकिन काम पर नहीं था तो उपस्थिति पंजी क्या कहती है? यदि भुगतान वैधानिक था तो वेतन निर्धारण किस अधिकारी ने किया? और यदि उच्च कार्यालय की अनुमति जरूरी थी तो वह अनुमति कहां है? सहकारिता की भाषा में इसे नियम कहते हैं, लेकिन यदि दस्तावेजों के बिना भुगतान हुआ है तो इसे समझने के लिए विभागीय जांच जरूरी होगी।
श्यामलाल सिंह की भूमिका पर इसलिए उठ रहे हैं सवाल-श्यामलाल सिंह बैंक शाखा भैयाथान के शाखा प्रबंधक और सोनपुर समिति के प्राधिकृत अधिकारी के रूप में किस सीमा तक निर्णय लेने के लिए अधिकृत थे,यह संबंधित बैंक नियमों, समिति के उपनियमों और उन्हें दिए गए अधिकार-पत्र से तय होगा,लेकिन आरोप यह है कि उनके कार्यकाल में समिति के प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में लगातार ऐसे निर्णय हुए जिनकी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं,इसलिए असली जांच यह होनी चाहिए कि किस आदेश के तहत कौन-सा अधिकार दिया गया था? किसने बोर्ड बैठक की सूचना जारी की? किसने एजेंडा तय किया? किसने नई कार्यवाही पंजी खोली? किसने कार्यवाहक सचिव नियुक्त किया? किसने कर्मचारी को पुनःसेवा में लेने का प्रस्ताव तैयार किया? किसने वेतन भुगतान का प्रस्ताव रखा? किसने बैंक भुगतान स्वीकृत किया? और किस अधिकारी ने अंतिम स्तर पर उसकी जांच की? जवाब देही का रास्ता यहीं से निकलेगा।
नई पंजी अब सबसे बड़ा किरदार क्यों बन गई?- पूरे मामले में यदि किसी एक चीज ने सबसे ज्यादा सवाल पैदा किए हैं तो वह है…कार्यवाही पंजी,क्योंकि पंजी सिर्फ कागज नहीं है,उसमें संस्था के निर्णयों का इतिहास दर्ज होता है, कौन-सी बैठक कब हुई? किसने भाग लिया? कौन-सा प्रस्ताव आया? किसने समर्थन किया? क्या निर्णय हुआ? किस आधार पर निर्णय हुआ? यही पंजी भविष्य में किसी भी जांच की पहली सीढ़ी बनती है, ऐसे में यदि किसी संस्था में बार-बार नई कार्यवाही पंजी तैयार होती है तो सबसे पहला सवाल यही होना चाहिए कि मूल पंजी कहां है और नई पंजी किस अधिकार से बनाई गई?
अगर सब कुछ नियम से था तो जांच से डर कैसा?-यहां सहकारिता विभाग के लिए भी एक सीधा सवाल है, यदि 7 अगस्त की बैठक नियमसम्मत थी, तो उसकी पूरी कार्यवाही जांची जाए,यदि 5 सितंबर की बैठक नियमसम्मत थी, तो उसकी पूरी कार्यवाही जांची जाए,यदि भुगतान वैध था तो भुगतान से जुड़े दस्तावेज सामने रखे जाएं,यदि विवेक चौरसिया की पुनर्नियुक्ति वैधानिक थी तो उनकी मूल नियुक्ति की पूरी फाइल जांची जाए,यदि एक दिन के कार्यवाहक सचिव की नियुक्ति वैध थी तो उसका आदेश दिखाया जाए,और यदि उच्च कार्यालय की अनुमति लेकर भुगतान हुआ था तो वह अनुमति सामने रखी जाए,दस्तावेज सामने आते ही आधे सवाल अपने आप खत्म हो जाएंगे।
अब सवाल ‘किसका आदमी’ नहीं, ‘किसका आदेश’ होना चाहिए-
ऐसे मामलों में अक्सर चर्चा इस बात पर पहुंच जाती है कि अधिकारी किसके करीब है,किसके प्रभाव में है या किसके संरक्षण में काम कर रहा है,लेकिन बिना प्रमाण किसी मंत्री, विधायक या अधिकारी पर संरक्षण देने का आरोप लगाना उचित नहीं होगा,इसलिए जांच का रास्ता सरल होना चाहिए,किसका आदेश था? किस फाइल पर हस्ताक्षर थे? किसने अनुमति दी? किसने प्रस्ताव पारित किया? किसने भुगतान स्वीकृत किया? किसके हस्ताक्षर से चेक जारी हुआ? बैंक ने किस आधार पर भुगतान किया? इन सवालों के जवाब अगर दस्तावेजों में मिल जाते हैं तो संरक्षण की चर्चा की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
सहकारिता में ‘कुर्सी’ स्थायी, सचिव अस्थायी और पंजी नई…व्यवस्था किसकी?-पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही है कि समिति में कुर्सी स्थायी दिखाई देती है, सचिव अस्थायी हो जाता है और कार्यवाही पंजी नई,कर्मचारी की नियुक्ति विवादित हो सकती है,सेवा समाप्त हो सकती है, फिर वापस आ सकता है, कार्यवाहक सचिव एक दिन के लिए आ सकता है,पंजी बदली जा सकती है, बैठक फिर हो सकती है,और अंत में समिति के खाते से भुगतान भी हो सकता है, लेकिन सवाल वही रह जाता है—नियम कहां है? अगर नियम मौजूद है तो लागू क्यों नहीं दिख रहा? अगर लागू हुआ है तो दस्तावेज कहां हैं? अगर दस्तावेज हैं तो जांच में सामने क्यों नहीं आते?
सरकारी पैसा हो या किसानों का पैसा…जवाबदेही जरूरी-
सहकारी समितियों का पैसा केवल किसी एक व्यक्ति या अधिकारी का पैसा नहीं होता, इसमें किसानों, सदस्यों और संस्थागत वित्तीय संसाधनों का हित जुड़ा होता है,इसलिए समिति के खाते से निकलने वाला प्रत्येक बड़ा भुगतान जांच की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए,यह कहना पर्याप्त नहीं कि भुगतान वेतन का था,यह साबित करना होगा कि वेतन वास्तव में देय था, कितनी अवधि का देय था,कर्मचारी उस अवधि में किस स्थिति में था,भुगतान की गणना कैसे हुई और भुगतान की अनुमति किसने दी।
एक दिन का कार्यवाहक सचिव…सहकारिता में ‘वन डे सर्विस’ का नया मॉडल?
7 अगस्त की बैठक में एक दिन के लिए कार्यवाहक सचिव/प्रबंधक नियुक्त किए जाने का भी आरोप है,अब सहकारिता के इस मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है, एक दिन के लिए सचिव! यानी संस्था के महत्वपूर्ण निर्णय लेने हैं तो स्थायी व्यवस्था की जरूरत नहीं…एक दिन का इंतजाम करो और काम पूरा करो,अगर यह व्यवस्था नियमों के अनुसार थी तो उसका आदेश कहां है? कार्यवाहक सचिव की नियुक्ति किस आधार पर हुई? उस दिन उसे कौन-कौन से अधिकार दिए गए थे? क्या वह समिति के प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय लेने के लिए अधिकृत था? क्या बैंक खाते से भुगतान संबंधी प्रक्रिया में उसकी भूमिका निर्धारित थी? और सबसे महत्वपूर्ण…क्या यह व्यवस्था पहले से निर्धारित थी या बैठक के दौरान तत्काल बनाई गई? यदि दस्तावेज मौजूद हैं तो जांच में सब कुछ स्पष्ट हो सकता है।
विवेक चौरसिया की वापसी…पुरानी नियुक्ति की फाइल कहां गई?
इसी बैठक में विवादित कर्मचारी विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने का निर्णय लिए जाने का आरोप है,यहां सवाल कर्मचारी के खिलाफ या पक्ष में खड़ा होना नहीं है, सवाल है की उन्हें वापस लेने से पहले उनकी मूल नियुक्ति की फाइल खोली गई या नहीं? यदि उनकी नियुक्ति पहले से विवादित थी तो क्या देखा गया कि नियुक्ति के समय विज्ञापन निकला था या नहीं? पद स्वीकृत था या नहीं? आवेदन प्राप्त हुए थे या नहीं? चयन प्रक्रिया हुई थी या नहीं? बोर्ड की स्वीकृति थी या नहीं? नियुक्ति आदेश जारी हुआ था या नहीं? और सबसे महत्वपूर्ण…क्या वह समिति के नियमित स्वीकृत कर्मचारी थे? यदि इन दस्तावेजों का परीक्षण किया गया था तो सवाल खत्म,लेकिन यदि बिना फाइल देखे केवल किसी पुराने आदेश के आधार पर कर्मचारी को वापस लिया गया,तो फिर सवाल यह है कि सहकारिता में नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया की जरूरत ही क्यों है?
5 सितंबर की बैठक में कर्मचारियों कोबुलाया गया और फिर खुला भुगतान का रास्ता…
आरोप के अनुसार 5 सितंबर को समिति के चिन्हांकित कर्मचारियों को बैंक शाखा में बुलाया गया और फिर नई कार्यवाही पंजी में बैठक की कार्रवाई दर्ज की गई,बैठक संचालन के लिए नया सचिव/प्रबंधक नियुक्त किया गया,इसके बाद कर्मचारियों के पूर्व लंबित वेतन के नाम पर समिति के बचत खाते से भुगतान करने का निर्णय लिया गया,बताया गया है कि चेक जारी किए गए और संबंधित कर्मचारियों के खातों में उसी दिन लाखों रुपये की राशि का भुगतान किया गया,अब यहां सहकारिता के नियमों की असली परीक्षा शुरू होती है,क्या भुगतान से पहले वेतन की पूरी देनदारी जांची गई? क्या कर्मचारियों की उपस्थिति देखी गई? क्या अनुपस्थिति अवधि का सत्यापन हुआ? क्या सेवा पुस्तिका देखी गई? क्या वेतन बिल तैयार हुआ? क्या भुगतान का सक्षम अधिकारी से अनुमोदन हुआ? क्या उच्च कार्यालय की अनुमति जरूरी थी? और यदि जरूरी थी तो क्या अनुमति ली गई?
7 अगस्त का प्रस्ताव ही 5 सितंबर के भुगतान का सबसे बड़ा सवाल…
सबसे महत्वपूर्ण बात उस प्रस्ताव को लेकर है जिसे 7 अगस्त की बैठक में पारित किए जाने की बात सामने आ रही है,बताया गया है कि प्रस्ताव क्रमांक 9 में विवेक चौरसिया की पृथक अवधि के वेतन भुगतान के लिए उप पंजीयक,सहकारी संस्थाएं, सूरजपुर से अनुमति प्राप्त करने के बाद भुगतान किए जाने की बात दर्ज थी,अब सवाल बिल्कुल सीधा है क्या अनुमति ली गई? अगर हां,तो आदेश क्रमांक क्या है? कब मिला? किस अधिकारी ने अनुमति दी? कितनी राशि के भुगतान की अनुमति दी? क्या वही राशि भुगतान की गई? क्या अनुमति की प्रति समिति की फाइल में है? अगर अनुमति नहीं ली गई तो फिर 5 सितंबर को भुगतान किस आधार पर किया गया? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब किसी राजनीतिक बयान या मौखिक सफाई से नहीं,एक कागज से दिया जा सकता है।
अब जांच की दिशा तय होनी चाहिए…दो पंजी से बैंक खाते तक
सोनपुर मामले में यदि विभाग निष्पक्ष जांच करना चाहता है तो 6 अगस्त की बैठक सूचना से लेकर 5 सितंबर के बैंक भुगतान तक पूरी फाइल खोलनी होगी,7 अगस्त की मूल एवं नई कार्यवाही पंजी का मिलान होना चाहिए,5 सितंबर की नई पंजी की जांच होनी चाहिए,दोनों बैठकों में शामिल सदस्यों के हस्ताक्षर और उपस्थिति का मिलान होना चाहिए,कार्यवाहक सचिव की नियुक्ति का आदेश देखा जाना चाहिए,विवेक चौरसिया की मूल नियुक्ति फाइल और पुनः कार्य पर रखने की प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए, कर्मचारियों की उपस्थिति और वेतन रिकॉर्ड का मिलान होना चाहिए,और सबसे महत्वपूर्ण—5 सितंबर को समिति के खाते से निकली प्रत्येक राशि का बैंक स्टेटमेंट,चेक, वाउचर और संबंधित कर्मचारी के खाते में पहुंची राशि से मिलान होना चाहिए,तभी पता चलेगा कि मामला नियमसम्मत भुगतान का था या प्रक्रिया में गंभीर चूक हुई।
सबसे बड़ा सवाल…क्या सहकारिता में नियम किताब में और फैसले पंजी में अलग-अलग लिखे जा रहे हैं?
सोनपुर का मामला अब केवल एक कर्मचारी,एक सचिव या एक बैठक का मामला नहीं रह गया है,यह सवाल बन गया है कि क्या सहकारी संस्थाओं में रिकॉर्ड और प्रक्रिया की निगरानी वास्तव में उतनी ही मजबूत है जितनी कागजों पर दिखाई देती है? क्योंकि अगर पुरानी पंजी रहते हुए नई पंजी बनती है,फिर उसी नई पंजी में कर्मचारी वापस आता है,फिर दूसरी नई पंजी बनती है और उसी में समिति के खाते से लाखों रुपये के भुगतान का रास्ता तैयार होता है,तो सवाल उठना स्वाभाविक है,सहकारिता में आखिर चल क्या रहा है…नियम, निर्णय या ‘नई पंजी का नया अध्याय’? और यदि यह सब नियमों के अनुसार हुआ है तो संबंधित अधिकारी और समिति के जिम्मेदारों के लिए सबसे आसान रास्ता यही है कि मूल दस्तावेज सार्वजनिक जांच के सामने रख दें,क्योंकि इस मामले में अब सवाल किसी एक कर्मचारी के वेतन का नहीं है,सवाल यह है कि समिति की कार्यवाही पंजी किसकी है, निर्णय किसके हैं,पैसा किसका है और जवाबदेही आखिर किसकी है? यही चार सवाल सोनपुर समिति की पूरी कहानी का असली हिसाब खोल सकते हैं।
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