विशेष न्यायालय का फैसला…पीडि़ता की आयु नाबालिग मानी गई…लेकिन बयान में विरोधाभास…
-संवाददाता-
जशपुर/कोरिया,20 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। विशेष न्यायालय,जशपुर ने पॉक्सो से जुड़े एक प्रकरण में आरोपी महेन्द्र पाण्डेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 294,506 भाग-दो, 509 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 12 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है,न्यायालय ने उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों के परीक्षण के बाद माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उस स्तर तक प्रमाणित नहीं कर सका,जहां आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आवश्यक संदेह से परे प्रमाण स्थापित हो। अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करने का आदेश दिया।
मामला उस समय का है,जब शिकायतकर्ता की पुत्री जशपुर क्षेत्र के एक शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत थी,अभियोजन की ओर से आरोप लगाया गया था कि आरोपी द्वारा मोबाइल फोन के माध्यम से पीडि़ता से संपर्क किया जाता था और उसके साथ कथित रूप से अश्लील बातचीत की जाती थी, शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि विरोध करने पर गाली-गलौज तथा धमकी दी गई,मामले की शिकायत के आधार पर पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की और बाद में अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया।
आरोपों की जांच में कई पहलुओं पर हुआ साक्ष्यों का परीक्षण-प्रकरण की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य तथा मामले से जुड़े अन्य रिकॉर्ड का परीक्षण किया,बचाव पक्ष की ओर से गवाहों के बयानों में विरोधाभास और अभियोजन की कहानी की पुष्टि करने वाले स्वतंत्र साक्ष्यों की कमी का मुद्दा उठाया गया,अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोप उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस स्तर तक सिद्ध होते हैं कि आरोपी को दोषी ठहराया जा सके,न्यायालय ने साक्ष्यों को अलग-अलग देखने के बजाय पूरे मामले को समग्र रूप से परखा।
पीडि़ता की आयु को लेकर दस्तावेजों का परीक्षण-प्रकरण में पीडि़ता की आयु भी महत्वपूर्ण मुद्दा रही, न्यायालय ने विद्यालयीन रिकॉर्ड सहित उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया,उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने घटना के समय पीडि़ता की आयु 18 वर्ष से कम होना स्वीकार किया,हालांकि, न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पीडि़ता की नाबालिग आयु स्थापित हो जाने मात्र से आरोपी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप स्वतः सिद्ध नहीं हो जाते,अभियोजन को प्रत्येक आरोपित कृत्य के आवश्यक तत्वों को स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना आवश्यक है,यही बिंदु इस मामले में महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि अदालत के सामने केवल पीडि़ता की आयु का प्रश्न नहीं था,बल्कि आरोपी पर लगाए गए विशिष्ट आरोपों की प्रमाणिकता भी जांच के दायरे में थी।
शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी पर भी अदालत की नजर-न्यायालय ने शिकायत दर्ज कराने में हुए विलंब को भी साक्ष्यों के मूल्यांकन के दौरान ध्यान में रखा,अभियोजन की ओर से देरी के कारण के संबंध में स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया,लेकिन अदालत ने उसे पर्याप्त रूप से संतोषजनक नहीं माना,शिकायत में देरी अपने आप में किसी मामले को झूठा साबित नहीं करती,लेकिन जब अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों में भी विरोधाभास या कमी सामने आए तो अदालत के लिए प्रत्येक परिस्थिति का समग्र मूल्यांकन करना आवश्यक हो जाता है,इसी दृष्टिकोण से न्यायालय ने शिकायत में हुई देरी को भी अन्य साक्ष्यों के साथ जोड़कर देखा।
माता-पिता प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे-मामले में पीडि़ता के माता-पिता के बयान भी अभियोजन के साक्ष्य का हिस्सा रहे। हालांकि, वे कथित घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे,उनके बयान मुख्य रूप से पीडि़ता से मिली जानकारी और उसके बाद की परिस्थितियों पर आधारित थे,न्यायालय ने ऐसे बयानों को भी मुख्य घटना से संबंधित प्रत्यक्ष साक्ष्य के बजाय परिस्थितिजन्य एवं सुनी-सुनाई जानकारी के रूप में परीक्षण किया,जब मुख्य गवाही में विरोधाभास सामने आए और तकनीकी साक्ष्य से भी कथित मोबाइल बातचीत की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई, तब अभियोजन के अन्य साक्ष्यों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई।
अभियोजन को साबित करना था अपराध, केवल संभावना नहीं-न्यायालय ने आपराधिक मामलों में लागू मूल सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन को अपराध संदेह से परे साबित करना होता है,केवल यह संभावना कि घटना अभियोजन के बताए तरीके से हुई हो सकती है,दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होती, इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए पाया कि आरोपों के आवश्यक तत्व उस स्तर तक प्रमाणित नहीं हुए,जिससे आरोपी को दोषी ठहराया जा सके,गवाह के बयान, शिकायत में देरी,मोबाइल बातचीत की स्वतंत्र पुष्टि का अभाव और अन्य परिस्थितियों को संयुक्त रूप से देखने के बाद अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देना उचित माना।
पीडि़ता के बयान में सामने आए विरोधाभास
न्यायालय में पीडि़ता के बयान और प्रतिपरीक्षण को मामले का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना गया। प्रतिपरीक्षण के दौरान पीडि़ता ने घटना की निश्चित तारीख और वर्ष के संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं होने की बात कही,उसके बयान में आरोपी द्वारा कथित रूप से दी गई धमकी तथा अन्य आरोपित कृत्यों को लेकर भी ऐसे तथ्य सामने आए,जिन्हें अभियोजन की मूल कहानी के साथ जोड़ना आसान नहीं था,रिकॉर्ड के अनुसार पीडि़ता ने यह भी कहा कि आरोपी ने उसे जान से मारने की धमकी नहीं दी थी,इसी तरह छेड़छाड़ से संबंधित आरोप की भी उसके बयान से स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई,न्यायालय ने इन बयानों को मामले के अन्य साक्ष्यों के साथ रखकर देखा और पाया कि अभियोजन की ओर से प्रस्तुत कहानी के महत्वपूर्ण हिस्सों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक स्तर पर नहीं हो सकी।
मोबाइल बातचीत का स्वतंत्र प्रमाण भी नहीं आया सामने…
मामले में मोबाइल फोन से बातचीत का आरोप महत्वपूर्ण था,अभियोजन के अनुसार आरोपी द्वारा मोबाइल के माध्यम से पीडि़ता से संपर्क किया जाता था,लेकिन न्यायालय के समक्ष कथित बातचीत की स्वतंत्र तकनीकी पुष्टि के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका, विशेष रूप से कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) जैसे तकनीकी साक्ष्य का अभाव भी मामले में महत्वपूर्ण रहा,आरोपी के जिस मोबाइल नंबर से कथित बातचीत किए जाने की बात कही गई थी,उसकी पुष्टि भी न्यायालय के समक्ष पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हो सकी,ऐसे मामलों में मौखिक बयान के साथ तकनीकी साक्ष्य अभियोजन के मामले को मजबूत कर सकते हैं,लेकिन इस प्रकरण में मोबाइल बातचीत के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाने से अभियोजन की कहानी को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल सकी।
फैसले ने जांच और अभियोजन की गुणवत्ता पर भी छोड़े सवाल…
न्यायालय का फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि गंभीर प्रकृति के मामलों में केवल प्राथमिकी और मौखिक आरोप पर्याप्त नहीं होते, जांच के दौरान उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों को सुरक्षित करना,मोबाइल नंबर और बातचीत की पुष्टि करना,घटनाक्रम की समय-सीमा स्पष्ट करना तथा गवाहों के बयानों में सामंजस्य स्थापित करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण होता है,इस मामले में अदालत के सामने प्रस्तुत साक्ष्यों में जो कमियां और विरोधाभास सामने आए,वे आरोपी को संदेह का लाभ मिलने का आधार बने,हालांकि,न्यायालय द्वारा आरोपी को दोषमुक्त किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि शिकायत या घटना के संबंध में लगाए गए प्रत्येक आरोप को न्यायालय ने झूठा घोषित किया है,फैसला मुख्य रूप से इस सवाल पर आधारित है कि क्या अभियोजन उपलब्ध साक्ष्यों से आरोपों को आपराधिक न्याय के आवश्यक मानक…संदेह से परे…तक साबित कर पाया,न्यायालय का उत्तर अभियोजन के पक्ष में नहीं रहा और इसी आधार पर महेन्द्र पाण्डेय को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया।
सभी आरोपों से किया दोषमुक्त
अंततः विशेष न्यायालय ने कोरिया के पत्रकार महेन्द्र पाण्डेय को धारा 294, धारा 506 भाग-दो,धारा 509 भारतीय दंड संहिता तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 12 के तहत लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त कर दिया,इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने पीडि़ता की आयु को लेकर अभियोजन के दस्तावेजों को स्वीकार किए जाने के बावजूद आरोपी के खिलाफ लगाए गए आपराधिक आरोपों को अलग से प्रमाणित करने की आवश्यकता पर जोर दिया,यानी नाबालिग होने का तथ्य अपने आप में आरोपी की दोषसिद्धि का आधार नहीं बना।
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