ग्रामीणों की मांगें दरकिनार करने,प्रस्तावों में मनमानी और बैठक व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप…विभागीय जांच पूरी होने के बाद भी कार्रवाई का इंतजार
सुदामा राजवाड़े
बलरामपुर,20 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। ग्राम पंचायत को लोकतंत्र की सबसे निचली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना जाता है, जहां गांव के लोगों की आवाज ग्रामसभा के जरिए सामने आती है। लेकिन राजपुर जनपद पंचायत के अंतर्गत ग्राम पंचायत चंद्रगढ़ में ग्रामीणों ने ग्रामसभा की कार्यप्रणाली से लेकर पंचायत सचिव की भूमिका तक कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में उनकी मांगों और जनहित के प्रस्तावों को महत्व नहीं दिया जा रहा,जबकि कुछ प्रस्ताव सीमित लोगों की मौजूदगी में आगे बढ़ाए जा रहे हैं। इससे पंचायती राज व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामसभा में मतदाता सूची में दर्ज ग्रामीण सदस्य होते हैं और पंचायत व्यवस्था में ग्रामसभा की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में ग्रामीणों का आरोप है कि यदि ग्रामसभा में रखी जाने वाली मांगों और प्रस्तावों को ही गंभीरता से नहीं लिया जाएगा तो फिर ग्रामसभा की उपयोगिता क्या रह जाएगी?
24 अगस्त की बैठक में मांगें रखीं, प्रस्ताव में शामिल हुईं या नहीं? ग्रामीणों के अनुसार 2० अगस्त को आयोजित विशेष ग्रामसभा में गांव में बकरी शेड निर्माण तथा स्ट्रीट लाइट के लिए हैलोजन बल्ब लगाने जैसी स्थानीय जरूरतों से जुड़े प्रस्ताव रखने की मांग की गई थी। आरोप है कि इन मांगों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि ग्रामसभा में आने वाले प्रस्तावों की प्रक्रिया स्पष्ट और पारदर्शी होनी चाहिए। यदि किसी मांग को प्रस्ताव के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है तो उसका कारण भी ग्रामीणों के सामने रखा जाना चाहिए। सवाल यह है कि ग्रामसभा में ग्रामीणों की मांगों पर क्या निर्णय हुआ और उसे कार्यवाही रजिस्टर में किस रूप में दर्ज किया गया?
20-25 लोगों की मौजूदगी में प्रस्तावों पर सवाल : ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कई बैठकों में अपेक्षाकृत कम संख्या में लोग उपस्थित रहते हैं और इसी दौरान कुछ प्रस्ताव पारित किए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। उनका दावा है कि 700 से अधिक मतदाताओं वाले गांव में ग्रामसभा की बैठकों की उपस्थिति, कोरम, सूचना और कार्यवाही की निष्पक्ष जांच की जरूरत है। यहां सवाल केवल संख्या का नहीं, बल्कि बैठक की वैधानिक प्रक्रिया और रिकॉर्ड की विश्वसनीयता का है। बैठक की सूचना कब और कैसे दी गई? उपस्थिति पंजी में कितने लोगों के हस्ताक्षर हैं? कोरम की गणना किस आधार पर की गई? किस प्रस्ताव पर किसने सहमति दी? और पूरी कार्यवाही किस अधिकारी या पदाधिकारी की उपस्थिति में हुई? इन सवालों के जवाब पंचायत के रिकॉर्ड से ही सामने आ सकते हैं।
सचिव पर 24 लाख की वित्तीय अनियमितता के आरोप, जांच के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं? चंद्रगढ़ पंचायत में सबसे गंभीर सवाल पंचायत सचिव रामचंद्र यादव के खिलाफ लगाए गए कथित करीब 24 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता / गबन के आरोपों को लेकर है। शिकायतकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा मामले में जांच और कार्रवाई की मांग किए जाने की बात सामने आई है। इसी मामले को लेकर न्यायालय में याचिका दायर किए जाने तथा विभागीय जांच की मांग किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले जांच और सक्षम प्राधिकारी के अंतिम निष्कर्ष का इंतजार आवश्यक है, लेकिन यदि विभागीय स्तर पर जांच वास्तव में पूरी हो चुकी है तो उसका निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? दोष निर्धारित हुआ है या नहीं? कितनी राशि पर आपत्ति दर्ज हुई? संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई या नहीं? यदि आरोप निराधार पाए गए तो शिकायतकर्ता को इसकी जानकारी दी गई या नहीं? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब ग्रामीण प्रशासन से मांग रहे हैं।
विभागीय जांच पूरी, अब कार्रवाई का इंतजार : इस मामले में जनपद पंचायत राजपुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से फोन पर जानकारी लिए जाने पर उन्होंने बताया कि विभागीय जांच पूरी कर प्रशासन को भेजी जा चुकी है। अब सवाल यह है कि जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकला? रिपोर्ट किस अधिकारी को भेजी गई? उसके आधार पर आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है? और यदि जांच में वित्तीय अनियमितता प्रमाणित नहीं हुई है तो इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? जांच पूरी होने के बाद भी कार्रवाई अथवा स्थिति स्पष्ट नहीं होने से ग्रामीणों में असमंजस बना हुआ है।
अध्यक्ष की आसंदी पर भी सवाल, सचिव की भूमिका कितनी? ग्रामीणों ने पंचायत की बैठकों में बैठने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि निर्वाचित अध्यक्ष की निर्धारित आसंदी के स्थान पर पंचायत सचिव द्वारा अपनी कुर्सी लगाए जाने जैसी स्थिति देखने को मिली। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल कुर्सी का विवाद नहीं,बल्कि पंचायत की संस्थागत मर्यादा और बैठक संचालन की प्रक्रिया से जुड़ा प्रश्न है। बैठक की अध्यक्षता कौन कर रहा था? कार्यवाही किसने संचालित की? सचिव की भूमिका क्या थी? और अध्यक्ष की आसंदी निर्धारित होने के बावजूद व्यवस्था अलग क्यों रही? इसका जवाब संबंधित बैठक की कार्यवाही और उपस्थित अधिकारियों-पदाधिकारियों से मिल सकता है।
ग्रामसभा जनता की है या चंद लोगों की? चंद्रगढ़ का मामला अब केवल एक पंचायत सचिव के खिलाफ लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है। असली सवाल यह है कि गांव की पंचायत व्यवस्था में निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। यदि ग्रामीणों की जायज मांगें ग्रामसभा में दर्ज नहीं होतीं,बैठक की उपस्थिति और कोरम पर सवाल उठते हैं, प्रस्तावों की प्रक्रिया पर संदेह रहता है और वित्तीय अनियमितता के आरोपों की जांच रिपोर्ट कार्रवाई के इंतजार में रहती है,तो पंचायत प्रशासन को इन सभी बिंदुओं पर सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। पंचायती राज का अर्थ केवल पंचायत भवन में बैठक करना नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आवाज को रिकॉर्ड पर लेना और निर्णय प्रक्रिया को पारदर्शी रखना है।
अब इन सवालों का जवाब जरूरी
– 24 अगस्त की विशेष ग्रामसभा में कुल कितने मतदाता/ग्रामीण उपस्थित थे?
– उपस्थिति पंजी में दर्ज संख्या कितनी है?
– बैठक का कोरम किस आधार पर पूरा माना गया?
– बकरी शेड और स्ट्रीट लाइट की मांग का प्रस्ताव कार्यवाही में दर्ज है या नहीं?
– ग्रामसभा में पारित सभी प्रस्तावों की प्रति सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
– 24 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता की विभागीय जांच में क्या निष्कर्ष निकला?
– जांच रिपोर्ट किस अधिकारी को भेजी गई और उसके बाद क्या कार्रवाई हुई?
– बैठक में अध्यक्ष की आसंदी और सचिव की भूमिका से संबंधित नियमों का पालन हुआ या नहीं?
चंद्रगढ़ के ग्रामीण अब केवल आरोप नहीं,दस्तावेजी जवाब चाहते हैं। पंचायत की कार्यवाही पंजी, उपस्थिति रजिस्टर,प्रस्ताव पुस्तिका, वित्तीय अभिलेख और विभागीय जांच रिपोर्ट सामने आने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और पंचायत व्यवस्था में वास्तव में कहां चूक हुई है।
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