
- जवाबदेही तय होगी,तभी न्याय व्यवस्था मजबूत होगी…
- न्यायालय की सख्तीः व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम
- न्याय केवल फैसला नहीं,जवाबदेही भी चाहता है…
- न्यायपालिका का संदेशः लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं होगी…
- सरकारी लापरवाही पर न्यायालय की सख्ती लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत…
- न्याय व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ेगी तो जनता का भरोसा भी मजबूत होगा…
- समय पर न्याय के लिए जवाबदेही जरूरी है,अदालतों की सक्रियता ने दिया स्पष्ट संदेश…न्यायिक प्रक्रिया से समझौता नहीं…
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है, सरकारें बदलती है,अधिकारी बदलते हैं,नीतियां बदलती हैं,लेकिन यदि जनता का विश्वास किसी संस्था पर सबसे अंत तक बना रहता है तो वह न्यायपालिका है,लोकतांत्रिक व्यवस्था तीन स्तंभों पर खड़ी मानी जाती है
विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका,इनमें न्यायपालिका वह अंतिम संस्था है,जहां नागरिक तब पहुंचता है जब उसे लगता है कि व्यवस्था के दूसरे दरवाजे उसके लिए बंद हो चुके हैं,इसलिए न्यायालय का हर आदेश केवल एक मुकदमे का फैसला नहीं होता,बल्कि व्यवस्था को दिया गया एक संदेश भी होता है,यही कारण है कि जब किसी नागरिक को हर दरवाजा बंद दिखाई देता है,तब वह अंततः अदालत का दरवाजा खटखटाता है,लेकिन न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं है, न्याय एक प्रक्रिया है,यदि वह प्रक्रिया ही बार-बार बाधित होती रहे,यदि विवेचक समय पर न्यायालय न पहुंचे,यदि सरकारी अधिकारी समन और वारंट के बावजूद गवाही देने न आएं,यदि वर्षों तक मुकदमे केवल इसलिए लंबित रहें क्योंकि जांच एजेंसी अपना दायित्व समय पर नहीं निभा रही है,तब सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं रह जाता कि आरोपी दोषी है या निर्दोष? सबसे बड़ा प्रश्न यह बन जाता है कि क्या व्यवस्था स्वयं अपने दायित्व का निर्वहन कर रही है? छत्तीसगढ़ में हाल ही में दो न्यायिक घटनाक्रमों ने यही संदेश दिया है कि अदालतें अब केवल मुकदमों का अंतिम निर्णय देने तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि वे यह भी देख रही हैं कि न्यायिक प्रक्रिया कहीं सरकारी लापरवाही की भेंट तो नहीं चढ़ रही,एक मामले में उच्च न्यायालय को पुलिस महानिदेशक से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगना पड़ा,क्योंकि विवेचक के न्यायालय में उपस्थित न होने से मुकदमे की सुनवाई प्रभावित हो रही थी,दूसरे मामले में एक सत्र न्यायालय ने गवाही के लिए लगातार अनुपस्थित रहने वाले पुलिस अधिकारी पर आर्थिक दंड लगाया और राशि वेतन से काटने का आदेश दिया, यह दोनों आदेश केवल दो व्यक्तियों या दो मामलों की कहानी नहीं हैं,यह पूरी व्यवस्था के लिए एक चेतावनी हैं कि न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने वाली लापरवाही अब केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं मानी जाएगी,बल्कि जवाबदेही का विषय बनेगी।
यह घटनाएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लंबे समय से आम नागरिकों के बीच एक धारणा बनती रही है कि यदि किसी सरकारी अधिकारी की लापरवाही से मुकदमे लंबित होते हैं,तो उसकी जवाबदेही शायद ही कभी तय होती है, तारीखें बढ़ती रहती हैं,गवाह लौटते रहते हैं,पीडि़त इंतजार करता रहता है और कई बार न्याय की गति सरकारी तंत्र की उदासीनता की भेंट चढ़ जाती है,पुलिस विवेचना किसी भी आपराधिक मुकदमे की आधारशिला होती है,यदि विवेचक समय पर न्यायालय नहीं पहुंचेगा, साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करेगा या न्यायिक आदेशों का पालन नहीं करेगा,तो सबसे बड़ा नुकसान उस व्यक्ति को होगा जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है,इसलिए न्यायालय का हस्तक्षेप केवल किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं,बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा की रक्षा का प्रयास है, इन आदेशों का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उन्होंने एक संदेश दिया है—सरकारी पद किसी को न्यायालय से ऊपर नहीं बनाता,चाहे अधिकारी कितना भी व्यस्त क्यों न हो,न्यायालय के आदेशों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता है,यदि किसी कारणवश उपस्थित होना संभव नहीं है,तो न्यायालय को समय पर सूचित करना भी उसी जवाबदेही का हिस्सा है, यह भी सही है कि पुलिस अधिकारियों पर कई प्रकार की जिम्मेदारियां होती हैं, गंभीर अपराधों की विवेचना,कानून-व्यवस्था,वीआईपी ड्यूटी और अन्य प्रशासनिक दायित्व उनके कार्य का हिस्सा हैं,लेकिन यही कारण उन्हें न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करने का स्वतः अधिकार नहीं देता,न्यायिक प्रक्रिया भी शासन व्यवस्था का उतना ही महत्वपूर्ण अंग है जितना अपराध की जांच,इन घटनाओं से एक और सकारात्मक संदेश जाता है—न्यायपालिका अब केवल अंतिम फैसला सुनाने वाली संस्था नहीं,बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गुणवत्ता और समयबद्धता पर भी निगरानी रख रही है,यदि यह प्रवृत्ति निरंतर बनी रहती है,तो इसका लाभ केवल न्यायालयों को नहीं,बल्कि पूरे समाज को मिलेगा,हालांकि जवाबदेही केवल न्यायालय की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, पुलिस मुख्यालय और राज्य सरकार को भी ऐसे मामलों की नियमित समीक्षा करनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी के कारण मुकदमे बार-बार प्रभावित हो रहे हैं,तो केवल न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा करने के बजाय विभागीय स्तर पर भी समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए, इससे न्यायालयों का समय बचेगा और नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा, आज जब न्यायालय यह संदेश दे रहे हैं कि लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी, तब कार्यपालिका के लिए भी यह आत्ममंथन का अवसर है,कानून का शासन तभी प्रभावी माना जाएगा, जब जांच एजेंसियां,अभियोजन और न्यायपालिका तीनों समान गति और समान जिम्मेदारी के साथ काम करें, न्याय केवल निर्णय देने से नहीं मिलता, बल्कि समय पर निर्णय मिलने से मिलता है,यदि न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने वाली लापरवाही पर इसी तरह जवाबदेही तय होती रही,तो निश्चित रूप से आम नागरिक का न्यायपालिका पर भरोसा और अधिक मजबूत होगा, यही किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता भी है।
न्याय की सबसे बड़ी दुश्मन अपराधी नहीं, देरी है-भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा लंबित मुकदमे रहे हैं,जब कोई मुकदमा दस-दस वर्ष चलता है,तब अक्सर लोग न्यायपालिका को दोष देते हैं,लेकिन शायद ही कभी यह चर्चा होती है कि उन मुकदमों में कितनी तारीखें इसलिए बढ़ीं क्योंकि पुलिस समय पर केस डायरी नहीं लाई,विवेचक उपस्थित नहीं हुआ,गवाह पेश नहीं हुए या सरकारी पक्ष ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई, एक तारीख केवल कैलेंडर का एक दिन नहीं होती,उस तारीख के साथ जुड़ा होता है पीडि़त का इंतजार,आरोपी का भविष्य,गवाह की उम्मीद,समाज का न्याय पर विश्वास,यदि किसी सरकारी अधिकारी की लापरवाही से एक तारीख बढ़ती है,तो उसका प्रभाव केवल एक दिन का नहीं होता,कई बार मुकदमे महीनों और वर्षों पीछे चले जाते हैं,यही कारण है कि जब न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करते हैं तो वे केवल एक अधिकारी को नहीं,बल्कि पूरी व्यवस्था को संदेश देते हैं कि न्याय में देरी भी न्याय के साथ अन्याय हो सकती है।
क्या पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध दर्ज करना है?- आम तौर पर पुलिस की भूमिका अपराध दर्ज करने और जांच करने तक सीमित समझी जाती है, लेकिन वास्तव में पुलिस की जिम्मेदारी तब तक समाप्त नहीं होती जब तक न्यायालय में मुकदमे का तार्किक निष्कर्ष नहीं निकल जाता,विवेचक ही वह व्यक्ति होता है जिसने घटनास्थल देखा,जिसने साक्ष्य एकत्र किए,जिसने गवाहों के बयान दर्ज किए,जिसने आरोपपत्र तैयार किया,यदि वही व्यक्ति न्यायालय में उपस्थित नहीं होगा,तो अभियोजन की पूरी श्रृंखला कमजोर पड़ सकती है,यही कारण है कि न्यायालय विवेचक की उपस्थिति को औपचारिकता नहीं,बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं।
न्यायपालिका का बदलता दृष्टिकोण-पिछले कुछ वर्षों में देशभर की अदालतों ने समयबद्ध न्याय पर अधिक जोर देना शुरू किया है,वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग,डिजिटल केस मैनेजमेंट, ई-कोर्ट और समयबद्ध ट्रायल जैसे प्रयास इसी सोच का हिस्सा हैं,अब यदि न्यायालय सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करने लगे हैं,तो यह उसी सुधार प्रक्रिया का अगला चरण माना जा सकता है।
लोकतंत्र में सबसे मजबूत संदेश- लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां कोई भी संस्था पूरी तरह निरंकुश नहीं है,कार्यपालिका पर न्यायपालिका की निगरानी लोकतांत्रिक संतुलन का हिस्सा है,यदि न्यायालय यह पूछते हैं कि आप समन के बावजूद क्यों नहीं आए? आपके कारण मुकदमा क्यों रुका? आपने आदेश का पालन क्यों नहीं किया? तो यह किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि संविधान द्वारा स्थापित जवाबदेही की व्यवस्था का संचालन है।
पीडि़त को भी अधिकार है कि मुकदमा समय पर पूरा हो-भारतीय न्याय व्यवस्था में अक्सर आरोपी के अधिकारों की चर्चा होती है, जो स्वाभाविक भी है, लेकिन पीडि़त के भी अधिकार हैं, उसे भी यह अधिकार है कि उसका मुकदमा वर्षों तक न लटके,उसे बार-बार अदालत के चक्कर न लगाने पड़ें, सरकारी अधिकारी की लापरवाही का बोझ उस पर न पड़े,जब न्यायालय ऐसे मामलों में सख्ती दिखाते हैं, तब वे केवल कानून लागू नहीं करते,बल्कि पीडि़त के अधिकारों की भी रक्षा करते हैं। - रवि सिंह
- कोरिया,छत्तीसगढ़
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