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संपादकीय@ आरक्षण पर टिप्पणी नहीं,संविधानपर आस्था की कसौटी है यह मामला

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छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी की सोशल मीडिया पोस्ट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संवैधानिक विषयों पर सार्वजनिक पदों पर बैठे अधिकारियों को निजी राय व्यक्त करते समय अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?
विवाद बढ़ने के बाद संबंधित अधिकारी ने पोस्ट हटा दी और खेद भी व्यक्त किया। लेकिन अब बहस केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं रह गई है। विपक्ष इसे आरक्षण और संविधान के सम्मान से जोड़ रहा है,जबकि सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह स्पष्ट करे कि ऐसे मामलों में उसकी नीति और जवाबदेही क्या होगी।
आरक्षण कोई राजनीतिक दल की देन या किसी सरकार की कृपा नहीं है। यह भारतीय संविधान द्वारा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से वंचित वर्गों को समान अवसर उपलब्ध कराने का एक संवैधानिक प्रावधान है। इस विषय पर मतभेद हो सकते हैं,न्यायालयों में बहस हो सकती है,नीतिगत समीक्षा की मांग भी उठ सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में इस पर होने वाली टिप्पणी मर्यादित, जिम्मेदार और संवेदनशील होनी चाहिए।
विशेष रूप से तब,जब टिप्पणी करने वाला व्यक्ति किसी सरकारी विभाग का अधिकारी हो। सरकारी सेवक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त नहीं होती,लेकिन उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने पद की गरिमा, सेवा नियमों और सार्वजनिक विश्वास का ध्यान रखे। क्योंकि उसकी व्यक्तिगत टिप्पणी भी कई बार पूरे विभाग या सरकार के दृष्टिकोण के रूप में देखी जाने लगती है।
दूसरी ओर, किसी विवादित पोस्ट के सामने आने के बाद केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी समाधान नहीं है। यदि वास्तव में सेवा नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और नियमों के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए। यदि केवल भूल हुई है, तो उसके अनुरूप कार्रवाई हो। लेकिन निर्णय तथ्यों और नियमों के आधार पर होना चाहिए,न कि केवल जनदबाव या राजनीतिक दबाव के आधार पर।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों को सामाजिक तनाव पैदा करने का माध्यम न बनाया जाए। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है,लेकिन संविधान के मूल सिद्धांतों के प्रति सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। सरकार की जिम्मेदारी केवल विवाद शांत कराने की नहीं,बल्कि यह भरोसा दिलाने की भी है कि उसके अधिकारी संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करेंगे। वहीं विपक्ष की जिम्मेदारी केवल विरोध दर्ज कराने की नहीं,बल्कि इस विषय पर समाज में तथ्यपरक और संयमित संवाद बनाए रखने की भी है।
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सार्वजनिक पद केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी है। सोशल मीडिया पर लिखे गए कुछ शब्द कभी-कभी वर्षों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।
आरक्षण पर बहस हो सकती है,लेकिन संविधान के प्रति सम्मान पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।


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