छत्तीसगढ़ सरकार ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग के नए परिपत्र के अनुसार अब शासकीय कार्यालयों में अधिकारी और कर्मचारियों के कार्य-पटल (Desk Assignment) का प्रत्येक तीन वर्ष में अनिवार्य रूप से परिवर्तन किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे कार्यकुशलता बढ़ेगी,पारदर्शिता आएगी,जवाबदेही मजबूत होगी और कर्मचारियों को विभिन्न प्रकार के कार्यों का अनुभव मिलेगा।
सिद्धांत रूप से यह निर्णय स्वागत योग्य है। किसी भी कार्यालय में वर्षों तक एक ही व्यक्ति का एक ही डेस्क पर बने रहना कई प्रकार की समस्याओं को जन्म देता है। एक ही शाखा में लंबे समय तक जमे रहने से न केवल एकाधिकार की स्थिति बनती है,बल्कि कई बार अनौपचारिक प्रभाव,व्यक्तिगत नेटवर्क और भ्रष्टाचार की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं। इसलिए समय-समय पर कार्य-पटल बदलना सुशासन का एक आवश्यक हिस्सा माना जाता है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या केवल आदेश जारी करने से व्यवस्था बदल जाएगी?
सरकारी कार्यालयों में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे,जहां एक ही कर्मचारी वर्षों नहीं,बल्कि दशकों तक एक ही शाखा में बैठा रहता है। फाइलें उसी की मेज से गुजरती हैं,नियमों की व्याख्या वही करता है और आम नागरिक के लिए वही कार्यालय का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन जाता है। कई बार अधिकारी बदल जाते हैं,लेकिन शाखा संभालने वाला कर्मचारी नहीं बदलता। परिणामस्वरूप कार्यालय का वास्तविक नियंत्रण भी उसी के हाथों में चला जाता है।
सरकार ने अपने आदेश में यह भी प्रावधान रखा है कि विशेष परिस्थितियों में सक्षम अधिकारी के लिखित अनुमोदन से किसी कर्मचारी को उसी डेस्क पर बनाए रखा जा सकता है। यहीं सबसे बड़ा खतरा भी छिपा है। यदि विशेष परिस्थिति ही सामान्य नियम बन गई,तो यह पूरा आदेश कागजों तक सीमित होकर रह जाएगा। इसलिए इस अपवाद का उपयोग अत्यंत सीमित और पारदर्शी होना चाहिए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि केवल डेस्क बदलने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता। यदि कार्य संस्कृति नहीं बदली,जवाबदेही तय नहीं हुई और प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन नहीं हुआ,तो कर्मचारी केवल एक मेज से दूसरी मेज तक स्थानांतरित होंगे, व्यवस्था नहीं बदलेगी।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि डेस्क परिवर्तन केवल कनिष्ठ कर्मचारियों तक सीमित न रहे। यदि पारदर्शिता उद्देश्य है,तो संवेदनशील शाखाओं में पदस्थ सभी स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों पर समान रूप से यह नीति लागू होनी चाहिए। चयनात्मक अनुपालन से इस आदेश की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे।
आज आम नागरिक सरकारी कार्यालय में किसी कर्मचारी का नाम नहीं,बल्कि उसकी सीट पहचानता है। लोग कहते हैं…उस सीट वाले बाबू से मिलिए,वही काम कराएंगे। यह स्थिति स्वयं बताती है कि कई कार्यालयों में व्यक्ति नहीं,बल्कि सीटें स्थायी शक्ति केंद्र बन चुकी हैं। यदि नया आदेश इस संस्कृति को बदलने में सफल होता है,तो यह प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम होगा।
लेकिन सरकार की परीक्षा आदेश जारी करने में नहीं,बल्कि उसके पालन में है। क्या तीन वर्ष पूरे होने पर वास्तव में हर कार्यालय में डेस्क बदलेगी? क्या अनुपालन की निगरानी होगी? क्या उल्लंघन करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? इन सवालों का जवाब आने वाले समय में मिलेगा।
सुशासन की पहचान अच्छे परिपत्रों से नहीं,बल्कि उनके ईमानदार क्रियान्वयन से होती है। यदि यह आदेश फाइलों से निकलकर कार्यालयों की वास्तविक कार्यसंस्कृति बदल सका,तभी इसे प्रशासनिक सुधार कहा जाएगा,अन्यथा यह भी सरकारी आदेशों की लंबी सूची में एक और दस्तावेज़ बनकर रह जाएगा।
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