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संपादकीय@ मौन शहर,मनमाने फैसले और आने वाली पीढि़यों का सवाल

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किसी भी शहर का भविष्य केवल इमारतों,सड़कों और सरकारी योजनाओं से तय नहीं होता। उसका भविष्य इस बात से तय होता है कि वहां लिए जाने वाले निर्णय कितने दूरदर्शी,पारदर्शी और जनहित पर आधारित हैं। दुर्भाग्य तब होता है,जब फैसले तो होते हैं,लेकिन जनता को उनकी जानकारी नहीं होती;योजनाएं बनती हैं,लेकिन स्थानीय लोगों से राय नहीं ली जाती; और विरोध की जगह समाज में एक खामोश स्वीकृति दिखाई देती है।
बैकुंठपुर शहर को लेकर भी ऐसे ही सवाल उठने लगे हैं। यदि शहर में विकास कार्य या प्रशासनिक निर्णय बिना पर्याप्त जनसंवाद,बिना विशेषज्ञों की राय और बिना स्थानीय आवश्यकताओं का समुचित आकलन किए जा रहे हैं,तो यह चिंता का विषय है। विकास का अर्थ केवल निर्माण कार्य नहीं होता,बल्कि ऐसा निर्णय लेना होता है जो वर्षों बाद भी शहर के हित में साबित हो।
इतिहास गवाह है कि कई शहरों ने जल्दबाजी में लिए गए फैसलों की कीमत दशकों तक चुकाई है। कहीं जल निकासी की अनदेखी ने हर बरसात में बाढ़ की समस्या खड़ी कर दी,कहीं अतिक्रमण को नजरअंदाज करने से सड़कें सिकुड़ गईं,तो कहीं बिना योजना के विकास ने शहर की पहचान ही बदल दी। उस समय भी बहुत लोग चुप थे,लेकिन बाद में वही चुप्पी सबसे बड़ी गलती मानी गई।
लोकतंत्र में मौन हमेशा सहमति का प्रतीक नहीं होता। कई बार लोग इसलिए नहीं बोलते क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जाएगी। कई बार लोग टकराव से बचना चाहते हैं, और कई बार जानकारी के अभाव में भी चुप रहते हैं। लेकिन यदि हर निर्णय बिना सार्वजनिक चर्चा के स्वीकार कर लिया जाएगा, तो जवाबदेही का सवाल भी कमजोर पड़ जाएगा।
यह संपादकीय किसी एक निर्णय या किसी एक व्यक्ति की आलोचना नहीं है। यह उस सोच पर प्रश्न है जिसमें जनता की भागीदारी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। शहर किसी अधिकारी,जनप्रतिनिधि या विभाग का नहीं,बल्कि वहां रहने वाले प्रत्येक नागरिक का होता है। इसलिए शहर के भविष्य को प्रभावित करने वाले निर्णयों में नागरिकों की आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए। विरोध का अर्थ विकास रोकना नहीं होता। रचनात्मक सुझाव देना,कमियों की ओर ध्यान दिलाना और बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। यदि जनता हर निर्णय पर चुप रहे और बाद में केवल अफसोस करे, तो इसका नुकसान आने वाली पीढि़यों को उठाना पड़ता है।
आज बैकुंठपुर के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या शहर का विकास संवाद से होगा या केवल आदेशों से? क्या योजनाएं भविष्य को ध्यान में रखकर बनेंगी या केवल वर्तमान की जरूरतों तक सीमित रहेंगी?
आने वाली पीढि़यां यह नहीं पूछेंगी कि उस समय कौन अधिकारी था या कौन जनप्रतिनिधि था। वे केवल इतना पूछेंगी—जब शहर का भविष्य तय हो रहा था,तब समाज चुप क्यों था?


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