
- अग्रिम जमानत याचिकाओं पर कोर्ट ने दी अंतरिम सुरक्षा,अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी पर रोक;पुलिस जांच के तरीके पर फिर उठे सवाल
- आईसी मार्ट प्रकरण में पुलिस जांच के तरीके पर कोर्ट की नजर,फरारी पंचनामा ,CCTV DVR,, तलाश में इस्तेमाल वाहन और प्रेस रिलीज को लेकर जवाब तलब
- 8 सितंबर की सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा…पुलिस प्रशासन द्वारा जांच करने के तरीके को देखते हुए जगत बैद और दीपक बैद को मिली अंतरिम अग्रिम जमानत,29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
- एफआईआर 9 जुलाई को…फरारी पंचनामा 10 जुलाई को क्यों? कोर्ट ने मांगा जवाब,वाहन की जानकारी और CCTV DVR रिपोर्ट भी तलब,29 सितंबर को अगली सुनवाई
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/बिलासपुर,09 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। आईसी मार्ट प्रकरण में दैनिक घटती-घटना द्वारा शुरुआत से उठाए जा रहे पुलिस की कार्यप्रणाली और जांच की निष्पक्षता से जुड़े सवाल अब महज मीडिया की पड़ताल तक सीमित नहीं रह गए हैं,मामले की न्यायिक कार्यवाही में हाईकोर्ट ने भी पुलिस प्रशासन द्वारा जांच किए जाने के तरीके पर गंभीरता से गौर किया है, 8 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई के आदेश में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से ‘manner of conducting the investigation by the Police Administration’ (‘पुलिस प्रशासन द्वारा जांच करने का तरीका) ‘को ध्यान में रखते हुए जगत कुमार बैद और दीपक बैद को अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की है,यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दैनिक घटती-घटना ने इस प्रकरण के शुरुआती घटनाक्रम से ही सवाल उठाया था कि क्या मामले की जांच सभी पहलुओं को सामने रखकर की जा रही है,क्या उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों का समय पर इस्तेमाल किया जा रहा है और क्या पुलिस की कार्रवाई में प्रक्रिया का पूरा पालन हुआ है? अब हाईकोर्ट के आदेशों में सामने आए सवालों ने इन मुद्दों को एक नया कानूनी आयाम दे दिया है। बता दे की आईसी मार्ट आत्महत्या प्रकरण में हाईकोर्ट ने आरोपी जगत कुमार बैद और दीपक बैद को महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिकाओं पर एड-इंटरिम अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है, न्यायालय ने अगली सुनवाई तक दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है, साथ ही पुलिस प्रशासन द्वारा की गई जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयासों को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां और दस्तावेज मांगे हैं, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर में 8 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ के समक्ष CRA No. 1795/2026, जगत कुमार बैद बनाम राज्य छत्तीसगढ़ तथा CRA No. 1800/2026 की सुनवाई हुई। हाईकोर्ट के आदेश में अपराध क्रमांक 214/2026, थाना बैकुंठपुर में दर्ज अपराध और उसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 3(5), 107,296, 308(2),309(4) तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(1) का उल्लेख है।
आरोपी बोले…सामान्य और सामूहिक आरोप,सक्रिय भूमिका का स्वतंत्र साक्ष्य नहीं-सुनवाई के दौरान जगत बैद और दीपक बैद की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि दोनों को सामान्य एवं सामूहिक आरोपों के आधार पर प्रकरण में आरोपी बनाया गया है और उनकी अपराध में सक्रिय भागीदारी स्थापित करने वाली कोई स्वतंत्र सामग्री नहीं है,आदेश में दर्ज है कि बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घटनास्थल पर केवल मौजूदगी, बिना किसी आपराधिक भागीदारी या किसी विशेष कृत्य के प्रमाण के,अग्रिम जमानत से राहत न देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकती,इसी आधार पर दोनों की ओर से अग्रिम जमानत की मांग की गई,वहीं राज्य की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध किया गया और याचिकाएं खारिज करने की मांग की गई।
8 सितंबर का आदेशः पुलिस जांच के तरीके पर कोर्ट की नजर-8 सितंबर को हाईकोर्ट के समक्ष CRA No. 1795/2026, जगत कुमार बैद बनाम राज्य छत्तीसगढ़ और CRA No. 1800/2026 की सुनवाई हुई, दोनों मामलों में आरोपी पक्ष ने अग्रिम जमानत की मांग की थी,बचाव पक्ष ने अदालत के सामने तर्क दिया कि आरोपियों को सामान्य और व्यापक आरोपों के आधार पर फंसाया गया है तथा उनके खिलाफ सक्रिय भागीदारी का स्वतंत्र सामग्री से पर्याप्त आधार नहीं है, राज्य ने इसका विरोध किया,सुनवाई के दौरान तत्कालीन कोरिया एसपी रवि कुर्रे और डीएसपी आशा रानी सेन न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए,इसके बाद न्यायालय ने मामले के तथ्यों और पुलिस प्रशासन द्वारा जांच किए जाने के तरीके को देखते हुए दोनों अपीलकर्ताओं को अंतरिम अग्रिम जमानत देना उचित माना, अभियोजन को अगली सुनवाई तक उनकी गिरफ्तारी से रोक दिया गया,गिरफ्तारी होने की स्थिति में 25-25 हजार रुपये के निजी मुचलके पर रिहाई का निर्देश दिया गया और आरोपियों को अभियोजन के साथ सहयोग करने को कहा गया,यह अंतिम अग्रिम जमानत नहीं है,यह अगली सुनवाई तक की अंतरिम सुरक्षा है।
एफआईआर 9 जुलाई को,फरारी पंचनामा 10 जुलाई को…कोर्ट ने पूछा क्यों?-8 सितंबर के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पुलिस की कार्रवाई की टाइमलाइन से जुड़ा है,हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को शपथपत्र दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि जब एफआईआर 9 जुलाई 2026 को दर्ज हुई,तो उसके एक दिन बाद 10 जुलाई को फरारी पंचनामा जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? कोर्ट ने यह भी पूछा है कि उस अवधि में आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कौन-कौन से कदम उठाए,इतना ही नहीं,आरोपियों की तलाश में इस्तेमाल किए गए वाहन की जानकारी भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है, यही वह बिंदु है जहां पुलिस की कार्रवाई की टाइमलाइन खुद एक महत्वपूर्ण सवाल बन गई है, एफआईआर—9 जुलाई,फरारी पंचनामा—10 जुलाई,अब कोर्ट जानना चाहता है कि इन दोनों के बीच पुलिस ने क्या कार्रवाई की और फरारी पंचनामा की आवश्यकता क्यों पड़ी,इसका जवाब अब पुलिस को दस्तावेजी रिकॉर्ड के साथ देना होगा।
CCTV DVR पर भी कोर्ट सख्त—जब्त हुआ तो FSL क्यों नहीं पहुंचा?CCTV DVR रिपोर्ट अब हर हाल में पेश करनी होगी-मामले का दूसरा बड़ा सवाल CCTV DVR को लेकर है,21 अगस्त की सुनवाई में न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया था कि घटना 7 जुलाई 2026 को हुई और CCTV का DVR 10 जुलाई को जब्त किया गया था, लेकिन वह उस समय तक फॉरेंसिक लैब नहीं भेजा गया था,हाईकोर्ट ने तब DVR रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे,अब 8 सितंबर के आदेश में कोर्ट ने फिर DVR रिपोर्ट को अगली सुनवाई में रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है, आदेश की प्रति FSL को भेजने और अगली सुनवाई पर रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा गया है,रिपोर्ट नहीं आने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है,यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CCTV इस पूरे मामले का संभावित महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य हो सकता है,ऐसे में सवाल यह है कि जब DVR पुलिस ने जब्त कर लिया था,तो उसकी फॉरेंसिक जांच में देरी क्यों हुई? इसका जवाब अब न्यायालय के सामने रिकॉर्ड के साथ रखना होगा।
आरोपियों की तलाश में इस्तेमाल वाहन की भी मांगी जानकारी-हाईकोर्ट ने पुलिस से केवल गिरफ्तारी के प्रयासों का विवरण ही नहीं मांगा है,बल्कि यह भी निर्देश दिया है कि आरोपियों की तलाश के लिए इस्तेमाल किए गए वाहन का पूरा विवरण रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किया जाए,अब पुलिस को न्यायालय के समक्ष यह बताना होगा कि आरोपियों की तलाश के दौरान कौन-सा वाहन इस्तेमाल किया गया और उस संबंध में क्या रिकॉर्ड उपलब्ध है।
हाईकोर्ट के लगातार आदेशों से पुलिस जांच पर बढ़ी निगरानी-आईसी मार्ट प्रकरण में हाईकोर्ट के लगातार आदेशों के बाद अब जांच प्रक्रिया के कई पहलू न्यायालय की निगरानी में आ गए हैं,पहले न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोपों के बीच पुलिस अधिकारियों से जानकारी मांगी थी, बाद में पुलिस वेबसाइट पर जारी प्रेस रिलीज में आरोपियों को फरार बताए जाने और उनकी लंबित अग्रिम जमानत याचिका के संबंध में भी सवाल उठाए गए थे, अब 8 सितंबर के आदेश में न्यायालय ने स्वयं पुलिस प्रशासन द्वारा जांच किए जाने के तरीके को ध्यान में रखते हुए दोनों आरोपियों को अंतरिम अग्रिम जमानत प्रदान की है।
मामला अब सिर्फ गिरफ्तारी का नहीं, जांच की प्रक्रिया भी सवालों में-हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद आईसी मार्ट प्रकरण में न्यायिक लड़ाई का दायरा और बढ़ गया है, अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जगत बैद और दीपक बैद की अग्रिम जमानत आगे स्थायी होती है या नहीं,बल्कि पुलिस द्वारा जांच किस तरीके से की गई,गिरफ्तारी के प्रयास कब और कैसे किए गए,फरारी पंचनामा किस आधार पर तैयार हुआ और CCTV DVR की फॉरेंसिक जांच में क्या सामने आता है…इन सभी बिंदुओं पर न्यायालय की नजर है,हालांकि हाईकोर्ट ने अपने 8 सितंबर के आदेश में आरोपियों को दोषमुक्त घोषित नहीं किया है और न ही पुलिस को दोषी ठहराया है,न्यायालय ने उपलब्ध परिस्थितियों और जांच के तरीके को देखते हुए फिलहाल अंतरिम अग्रिम जमानत दी है तथा पुलिस से आवश्यक स्पष्टीकरण और दस्तावेज मांगे हैं, अब 29 सितंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। उस दिन पुलिस द्वारा पेश की जाने वाली फरारी पंचनामा संबंधी जानकारी, गिरफ्तारी के प्रयासों का विवरण,इस्तेमाल किए गए वाहन की जानकारी और विशेष रूप से CCTV DVR की FSL रिपोर्ट मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
21 अगस्त को भी कोर्ट ने पुलिस की प्रेस रिलीज पर मांगा था जवाब-पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर न्यायालय की चिंता केवल DVR तक सीमित नहीं रही,21 अगस्त के आदेश में हाईकोर्ट के समक्ष यह तथ्य रखा गया था कि कोरिया पुलिस की वेबसाइट पर एक प्रेस रिलीज जारी कर आरोपियों को फरार बताया गया,जबकि उनकी अग्रिम जमानत याचिका हाईकोर्ट में लंबित थी,इस पर तत्कालीन एसपी रवि कुर्रे को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया गया था कि प्रेस रिलीज जारी करने से पहले पुलिस ने कौन-सी सामग्री जुटाई थी और क्या हाईकोर्ट में लंबित अग्रिम जमानत की स्थिति का महाधिवक्ता कार्यालय से सत्यापन किया गया था,यानी सवाल केवल‘आरोपी फरार थे या नहीं’ का नहीं था,बल्कि सवाल यह था कि पुलिस ने सार्वजनिक रूप से ऐसी सूचना जारी करने से पहले उपलब्ध न्यायिक स्थिति और तथ्यों का सत्यापन किस स्तर पर किया।
दैनिक घटती-घटना ने शुरुआत से क्या पूछा था?-इस पूरे प्रकरण में दैनिक घटती-घटना का सवाल किसी आरोपी को बचाने या किसी दूसरे पक्ष को दोषी ठहराने का नहीं रहा है,सवाल शुरू से यही रहा की घटना से पहले क्या हुआ? पुलिस को किस समय और किस माध्यम से जानकारी मिली? यदि किसी प्रकार की कथित प्रताड़ना की जानकारी थी तो क्या कार्रवाई हुई? घटना और आत्महत्या के बीच की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच हुई या नहीं? CCTV और अन्य डिजिटल साक्ष्यों का वैज्ञानिक परीक्षण समय पर क्यों नहीं हुआ? पुलिस द्वारा जारी प्रेस रिलीज का आधार क्या था? न्यायालय में अग्रिम जमानत लंबित होने के बावजूद आरोपियों को फरार बताए जाने से पहले कानूनी स्थिति का सत्यापन हुआ या नहीं? एफआईआर के अगले ही दिन फरारी पंचनामा तैयार करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? आरोपियों की तलाश में कौन-सा वाहन इस्तेमाल हुआ और उसका रिकॉर्ड क्या है? जांच में किसी भी संबंधित पुलिसकर्मी या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका होने पर उसकी स्वतंत्र जांच कैसे सुनिश्चित की गई? आज इन सवालों में से कई सवाल हाईकोर्ट के आदेशों में दर्ज हो चुके हैं।
29 सितंबर को होगी अगली परीक्षा- हाईकोर्ट ने दोनों मामलों को 29 सितंबर 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है, अब अगली सुनवाई में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर नजर रहेगी 9 जुलाई की FIR के बाद 10 जुलाई को फरारी पंचनामा क्यों बनाया गया? आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए उस दौरान पुलिस ने क्या कदम उठाए? आरोपियों की तलाश में इस्तेमाल वाहन कौन-सा था और उसका रिकॉर्ड क्या है? CCTV DVR की FSL रिपोर्ट क्या कहती है? पुलिस की पिछली कार्रवाई और न्यायालय के निर्देशों के बीच क्या स्थिति सामने आती है?
सबसे बड़ा सवालः क्या अब जांच की दिशा बदलेगी?-आईसी मार्ट प्रकरण अब केवल एक आत्महत्या,एफआईआर या अग्रिम जमानत का मामला नहीं रह गया है, यह मामला जांच की प्रक्रिया,पुलिस की जवाबदेही और वैज्ञानिक साक्ष्यों के इस्तेमाल का भी परीक्षण बन गया है,दैनिक घटती-घटना ने शुरुआत से पुलिस की भूमिका और जांच की दिशा को लेकर सवाल उठाए थे,तब ये सवाल पत्रकारिता की पड़ताल के रूप में सामने थे, अब हाईकोर्ट के आदेशों में पुलिस की जांच के तरीके,फरारी पंचनामा,प्रेस रिलीज, CCTV DVR और तलाश की कार्रवाई पर जवाब मांगा जाना यह दिखाता है कि मामले की जांच प्रक्रिया स्वयं न्यायिक scrutiny के दायरे में आ चुकी है, न्यायालय ने अभी किसी पक्ष को दोषी नहीं माना है, लेकिन उसने पुलिस से यह जरूर पूछना शुरू कर दिया है कि जांच आखिर किस तरीके से की गई और उपलब्ध साक्ष्यों के साथ क्या किया गया,और यही आईसी मार्ट प्रकरण का सबसे अहम मोड़ है,अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आरोपी कौन है,बल्कि यह भी है कि जांच कितनी निष्पक्ष,पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से हुई।
तत्कालीन एसपी रवि कुर्रे और डीएसपी आशा रानी सेन कोर्ट में मौजूद
हाईकोर्ट के पूर्व निर्देश के पालन में तत्कालीन कोरिया एसपी रवि कुर्रे तथा डीएसपी आशा रानी सेन व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए,इसके बाद न्यायालय ने मामले के तथ्यों और पुलिस प्रशासन द्वारा जांच किए जाने के तरीके को ध्यान में रखते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं को अंतरिम अग्रिम जमानत देने का निर्णय लिया।
पहले खबरों में सवाल थे,अब न्यायालय के आदेश में दर्ज हैं…
आईसी मार्ट प्रकरण में शुरुआत से ही घटनाक्रम की कई कडि़यों को लेकर सवाल उठते रहे, कथित चोरी, उसके बाद की परिस्थितियां,मृतका के साथ कथित व्यवहार,पुलिस तक पहुंची जानकारी,घटना और आत्महत्या के बीच का घटनाक्रम तथा बाद में हुई पुलिस कार्रवाई—इन सभी पहलुओं को लेकर दैनिक घटती-घटना ने लगातार यह सवाल रखा कि सच्चाई तक पहुंचने के लिए जांच कितनी निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से हो रही है,अखबार ने किसी पक्ष को दोषी घोषित करने के बजाय बार-बार यह सवाल उठाया कि मामले की प्रत्येक कड़ी की स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए,अब हाईकोर्ट की कार्यवाही में भी जांच के ऐसे ही पहलुओं पर पुलिस से रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण मांगा गया है, अर्थात जिन सवालों को पत्रकारिता के स्तर पर उठाया जा रहा था, उनमें से कई अब न्यायालय की निगरानी में जांच के विषय बन चुके हैं।
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