अयोध्या के महंत राजू दास और कुंवर सिंह निषाद के बीच विवाद ने फिर खड़ा किया सवाल—धार्मिक पद गरिमा देता है, अपशब्द बोलने का अधिकार नहीं
अयोध्या केवल एक शहर नहीं,करोड़ों लोगों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। हनुमानगढ़ी जैसे धार्मिक स्थल से जुड़े संत-महंतों से समाज सामान्य व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक संयम, मर्यादा और विनम्रता की अपेक्षा करता है। ऐसे में यदि किसी धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति की भाषा सार्वजनिक मंच पर मर्यादा की सीमा लांघती दिखाई दे,तो सवाल केवल उसके व्यक्तिगत आचरण का नहीं, उस पद की गरिमा का भी बन जाता है।
महंत राजू दास और निषाद समाज के नेता कुंवर सिंह निषाद के बीच एक टीवी बहस के दौरान हुई तीखी नोकझोंक इसी वजह से चर्चा में है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बहस के दौरान दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई और राजू दास की ओर से कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा तथा मारने की धमकी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। यदि सार्वजनिक रूप से प्रसारित सामग्री में दिखाई गई बातें सही हैं तो निश्चित रूप से ऐसी भाषा किसी भी सभ्य संवाद का हिस्सा नहीं हो सकती।
लेकिन इस मामले को केवल जातीय या राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा। बहस में किसी भी पक्ष की ओर से व्यक्तिगत टिप्पणी या उकसावे की भाषा हो तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। एक व्यक्ति की कथित अभद्रता दूसरे व्यक्ति के लिए अभद्र होने का लाइसेंस नहीं बन सकती। सार्वजनिक जीवन में मर्यादा दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।
मूल सवाल इससे भी बड़ा है—क्या धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति से संयम की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए?
संत और महंत समाज के लिए केवल धार्मिक कर्मकांड कराने वाले व्यक्ति नहीं होते। लोग उनके शब्दों में धर्म की सीख और उनके व्यवहार में संस्कार तलाशते हैं। भगवा वस्त्र,मंदिर की जिम्मेदारी और धार्मिक पहचान किसी को कानून या सामाजिक मर्यादा से ऊपर नहीं करती। बल्कि ऐसी पहचान जिम्मेदारी और बढ़ा देती है।
धर्म की शक्ति आवाज ऊंची करने में नहीं,आचरण ऊंचा करने में है। राम की परंपरा मर्यादा की बात करती है और हनुमान भक्ति,विनम्रता तथा समर्पण के प्रतीक हैं। ऐसे में धार्मिक मंच से जुड़े व्यक्ति की भाषा में संयम अपेक्षित होना स्वाभाविक है।
इस विवाद की पृष्ठभूमि में मछली भोज को लेकर उठा राजनीतिक विवाद भी है। भारत विविधताओं का देश है। अलग-अलग समुदायों की भोजन परंपराएं अलग हैं। किसी के लिए मछली सामान्य भोजन हो सकती है और किसी दूसरे के लिए धार्मिक कारणों से अस्वीकार्य। लोकतंत्र में किसी की भोजन परंपरा से असहमति हो सकती है, लेकिन असहमति को अपमान और धमकी में बदल देना किसी भी पक्ष के लिए उचित नहीं।
निषाद समाज की नाराजगी को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। किसी समुदाय के प्रतिनिधि को सार्वजनिक मंच पर अपमानित महसूस होना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। लेकिन किसी एक व्यक्ति के कथित आचरण के आधार पर पूरे साधु-संत समाज या किसी धार्मिक परंपरा को कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा। जवाबदेही व्यक्ति की होनी चाहिए, सामूहिक आरोपों की नहीं।
इस मामले में सबसे जरूरी है कि पूरे विवाद का निष्पक्ष आकलन हो। मूल वीडियो और संदर्भ सामने आएं,दोनों पक्ष अपनी बात रखें और यदि वास्तव में अपमानजनक भाषा या धमकी दी गई है तो संबंधित संस्था तथा कानून अपने स्तर पर उचित कार्रवाई करे। धार्मिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा भी इसी में है कि वे अपने पदाधिकारियों के आचरण के मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी रहें।
आज जरूरत किसी को ‘सांप’ या ‘नरपिशाच’ कहने की नहीं,बल्कि यह तय करने की है कि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा की सीमा सबके लिए समान होगी या नहीं।
राजनेता हों,संत हों, पत्रकार हों या सामाजिक कार्यकर्ता—असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है,लेकिन गाली और धमकी लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा नहीं हो सकती।
अयोध्या की पहचान विवाद और कटुता से नहीं,बल्कि राम की मर्यादा से है। इसलिए इस पूरे प्रकरण से एक ही संदेश निकलना चाहिए—धर्म का वस्त्र पहनना आसान है, लेकिन धर्म की मर्यादा को अपने आचरण में उतारना ही असली संतत्व है।
आस्था बड़ी है,व्यक्ति छोटा।
धर्म बड़ा है,अहंकार छोटा।
और संवाद हमेशा अपमान से बड़ा होना चाहिए।
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