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कोरिया @ लालमुनि यादव या अंशु लकड़ा? कांग्रेस टिकट पर दो दावेदार,भूपेंद्र यादव-अजीत ‘गज्जू’ लकड़ा के सियासी समीकरण आमने-सामने

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  • अंबिका सिंहदेव की भूमिका पर भी नजर,संगठन बनाम स्थानीय समीकरण के बीच फंसा टिकट का फैसला,अंदरूनी कलह हुई तो भाजपा को मिल सकता है सीधा फायदा
  • शिवपुर-चरचा में कांग्रेस का टिकट संग्राम,लालमुनि बनाम अंशु,किसके साथ जाएगा ‘हाथ’?
  • पुरानी दोस्ती बनी सियासी दुश्मनी,शिवपुर-चरचा में कांग्रेस टिकट पर आर-पार
  • लालमुनि या अंशु? शिवपुर-चरचा में कांग्रेस के दो दावेदार,टिकट का फैसला बनेगा बड़ी चुनौती
  • कांग्रेस के घर में टिकट की जंग! लालमुनि यादव बनाम अंशु लकड़ा,किस गुट पर भरोसा करेगा संगठन?
  • एक कुर्सी,दो दावेदार और दो सियासी खेमे…शिवपुर-चरचा में कांग्रेस का इम्तिहान
  • अंबिका सिंहदेव की भूमिका से बदलेगा शिवपुर-चरचा का सियासी समीकरण? टिकट पर सबकी नजर
  • संगठन बनाम सियासी समीकरण,शिवपुर-चरचा में लालमुनि-अंशु की दावेदारी ने बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किल
  • पुराने साथी बने प्रतिद्वंद्वी,अब पत्नी-पत्नी की दावेदारी के बीच कांग्रेस का फैसला!
  • शिवपुर-चरचा में ‘टिकट की लड़ाई’ या गुटों की अग्निपरीक्षा? कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल

-रवि सिंह-
कोरिया,15 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
दिसंबर 2026 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनावों ने कोरिया जिले की सियासत को एक बार फिर गरमा दिया है, बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा नगरपालिका परिषद के चुनाव केवल स्थानीय निकाय की सत्ता का चुनाव नहीं होंगे, बल्कि इन्हें भाजपा और कांग्रेस के बीच जमीनी ताकत की अग्निपरीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है, राज्य और केंद्र में भाजपा की सत्ता के बीच स्थानीय निकाय में भी यदि भाजपा अपना कब्जा बरकरार रखती है तो ‘ट्रिपल इंजन’ का नारा और मजबूत होगा, लेकिन यदि शिवपुर-चरचा में कांग्रेस वापसी करती है तो भाजपा के ट्रिपल इंजन की रफ्तार पर सवाल खड़े होंगे, सरकार ने दिसंबर 2026 में जिन नगरीय निकायों में चुनाव प्रस्तावित किए हैं, उनमें बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा दोनों नगरपालिका परिषद शामिल हैं,लेकिन शिवपुर-चरचा का चुनाव इस बार इसलिए ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि यहां भाजपा से पहले कांग्रेस को अपने ही घर की राजनीतिक दीवारें मजबूत करनी होंगी।
कांग्रेस के सामने पहला सवाल-लालमुनि या अंशु?-स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में कांग्रेस की ओर से दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में बताए जा रहे हैं—पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष लालमुनि यादव और अंशु लकड़ा, लालमुनि यादव का नाम इसलिए मजबूत माना जा रहा है क्योंकि वह पहले ही नगरपालिका अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुकी हैं, दूसरी ओर अंशु लकड़ा के रूप में कांग्रेस के सामने नया चेहरा है, लेकिन उनके पीछे पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा का राजनीतिक अनुभव और स्थानीय प्रभाव माना जा रहा है,यही वजह है कि शिवपुर-चरचा में संभावित मुकाबला केवल दो महिला चेहरों के बीच नहीं है, असल मुकाबला दो राजनीतिक खेमों के बीच माना जा रहा है, एक तरफ भूपेंद्र यादव का राजनीतिक खेमा है, तो दूसरी तरफ अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा का, और इस पूरी कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि कभी इन दोनों नेताओं की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी, आज वही दोस्ती राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में बदल चुकी है।
अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा का अनुभव बनाम लालमुनि का अध्यक्षीय अनुभव- अंशु लकड़ा के पक्ष में सबसे बड़ा राजनीतिक आधार उनके पति अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा का अनुभव माना जा रहा है, अजीत लकड़ा स्वयं नगरपालिका अध्यक्ष रह चुके हैं, ऐसे में नगर की राजनीति, पार्षदों का समीकरण, वार्ड स्तर की स्थिति और मतदाताओं के राजनीतिक व्यवहार को समझने का उनका अनुभव अंशु लकड़ा की दावेदारी के पीछे महत्वपूर्ण ताकत बन सकता है, दूसरी ओर लालमुनि यादव के पक्ष में उनका स्वयं का राजनीतिक अनुभव है, वह नगरपालिका अध्यक्ष रह चुकी हैं और परिषद की कार्यप्रणाली को करीब से देख चुकी हैं, इस लिहाज से मुकाबला बेहद दिलचस्प है की एक उम्मीदवार के पीछे पूर्व अध्यक्ष का अनुभव है, तो दूसरी के पास स्वयं अध्यक्ष रह चुकी महिला का अनुभव,यही कारण है कि कांग्रेस के लिए फैसला आसान नहीं माना जा रहा।
सबसे बड़ा सियासी पेच—अंबिका सिंह देव- इस पूरे समीकरण में कांग्रेस की पूर्व विधायक अंबिका सिंह देव की भूमिका भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार अतीत में भूपेंद्र यादव और अंबिका सिंह देव के बीच राजनीतिक नजदीकी रही है,उस दौर में लालमुनि यादव की अध्यक्ष पद की दावेदारी और उन्हें मिली राजनीतिक ताकत के समीकरण अलग थे, लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं, भूपेंद्र यादव और अंबिका सिंह देव के बीच दूरी की चर्चा है, जबकि अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा के साथ उनके राजनीतिक समीकरण को लेकर अलग तरह की चर्चाएं चल रही हैं,यही बदलाव अब टिकट चयन के समय कितना असर डालेगा,यह देखने वाली बात होगी,हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद या राजनीतिक नजदीकी को टिकट पर अंतिम निर्णय मानना उचित नहीं होगा, अंतिम फैसला कांग्रेस संगठन और उसकी अधिकृत चुनावी प्रक्रिया से ही होगा, फिर भी राजनीतिक गलियारों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि शिवपुर-चरचा में संगठन की पसंद भारी पड़ेगी या स्थानीय राजनीतिक प्रभाव?
कांग्रेस संगठन के सामने असली परीक्षा- कांग्रेस ने आगामी नगरीय निकाय चुनावों के लिए शिवपुर-चरचा में प्रशांत मिश्रा को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है,यानी पार्टी ने स्थानीय चुनावी समीकरणों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है, ऐसे में पर्यवेक्षक के सामने केवल दावेदारों की सूची तैयार करना चुनौती नहीं होगी,उन्हें यह भी देखना होगा कि किस उम्मीदवार की वास्तविक जमीनी पकड़ कितनी है? किसके साथ कितने पार्षद और स्थानीय कार्यकर्ता खड़े हैं? कौन सा उम्मीदवार विरोधी खेमे को अपने साथ जोड़ सकता है? टिकट कटने के बाद दूसरा खेमा पार्टी के लिए काम करेगा या नहीं? पिछले अविश्वास प्रस्ताव जैसी स्थिति दोबारा बनने की संभावना कितनी है? क्योंकि कांग्रेस यदि केवल उम्मीदवार के व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर टिकट देती है और दूसरे खेमे को नाराज छोड़ देती है, तो चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही पार्टी कमजोर हो सकती है।
भाजपा के लिए कांग्रेस की कलह सबसे बड़ा मौका-शिवपुर-चरचा में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान भाजपा के लिए सबसे बड़ा अवसर बन सकती है, 2024 में कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान 12 वोट मिलना इस बात का सार्वजनिक प्रमाण है कि कांग्रेस के भीतर मतभेद केवल बंद कमरे की चर्चा नहीं थे,बल्कि वे परिषद के फर्श तक पहुंच चुके थे,अब 2026 में चुनाव सीधे जनता के बीच जाना है,यानी इस बार किसी अध्यक्ष को हटाने के लिए पार्षदों की जरूरत नहीं होगी,जनता ही तय करेगी कि नगरपालिका की कमान किसे दी जाए, यही कारण है कि 2024 की अंदरूनी लड़ाई का असर 2026 के मतदान तक पहुंचता है या नहीं,यह कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल है, भाजपा के लिए भी तस्वीर आसान नहीं है, सत्ता में होने का लाभ अलग बात है और स्थानीय उम्मीदवार की स्वीकार्यता अलग,इसलिए भाजपा को भी ऐसा चेहरा उतारना होगा जो कांग्रेस के संभावित गुटीय विभाजन का लाभ उठाकर वोटों को अपने पक्ष में खींच सके।
‘ट्रिपल इंजन’ की असली परीक्षा शिवपुर-चरचा में-भाजपा के लिए यह चुनाव केवल नगरपालिका अध्यक्ष की कुर्सी का चुनाव नहीं है, राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार के बाद यदि शिवपुर-चरचा नगरपालिका भी भाजपा के कब्जे में रहती है तो पार्टी इसे ट्रिपल इंजन सरकार के स्थानीय मॉडल के रूप में पेश कर सकती है,लेकिन यदि कांग्रेस यहां वापसी करती है तो राजनीतिक संदेश बिल्कुल उलटा जाएगा,तब सवाल उठेगा कि सत्ता के तीनों स्तरों में से एक स्तर भाजपा के हाथ से निकल गया,इसीलिए शिवपुर-चरचा का चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखता है।
पुरानी दोस्ती का अंत या फिर राजनीतिक समझौते की शुरुआत?-इस चुनाव की सबसे दिलचस्प कहानी हालांकि टिकट से भी आगे जाती है, कभी भूपेंद्र यादव और अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा की दोस्ती की चर्चा होती थी,आज दोनों अलग-अलग राजनीतिक खेमों के साथ खड़े नजर आते हैं, राजनीति में रिश्ते स्थायी नहीं होते और समीकरण चुनाव दर चुनाव बदलते हैं, इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस इन दोनों खेमों के बीच की दूरी कम कर पाएगी? क्या संगठन दोनों को एक मंच पर ला पाएगा? क्या टिकट किसी एक को मिलने के बाद दूसरा खेमा पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के लिए पूरी ताकत से काम करेगा? या फिर पुरानी दोस्ती की जगह बनी राजनीतिक दूरी चुनाव मैदान में खुली लड़ाई का रूप लेगी?
जिस लालमुनि ने संभाली थी कुर्सी, वही सत्ता कांग्रेस से खिसक गई…– शिवपुर-चरचा की मौजूदा राजनीतिक कहानी को समझने के लिए 2024 के घटनाक्रम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, नगरपालिका अध्यक्ष लालमुनि यादव के खिलाफ अगस्त 2024 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, मतदान में 12 पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में और 3 ने विरोध में मतदान किया,जिसके बाद लालमुनि यादव को अध्यक्ष पद गंवाना पड़ा, उस समय नगरपालिका में कुल 15 पार्षद थे और कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया था,यही वह घटनाक्रम था जिसने शिवपुर-चरचा की सत्ता का समीकरण बदल दिया,इसके बाद कांग्रेस ने अपने कुछ पार्षदों के खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों को लेकर कार्रवाई भी की थी,यानी जिस नगरपालिका में कांग्रेस ने अपना अध्यक्ष बैठाया था,वहीं कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अंदरूनी खींचतान ने पार्टी की सत्ता छीन ली,यही पुराना घटनाक्रम 2026 के चुनाव में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बनकर लौट रहा है।
अब लड़ाई सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं,टिकट बचाने की भी…– कांग्रेस के सामने इस बार चुनौती दोहरी है,पहली चुनौती है की किसे प्रत्याशी बनाया जाए? दूसरी और उससे भी बड़ी चुनौती है की जिसे टिकट न मिले, उसे पार्टी के साथ कैसे रखा जाए? यदि लालमुनि यादव को टिकट मिलता है तो अंशु लकड़ा के समर्थकों को एकजुट रखना चुनौती होगी, यदि अंशु लकड़ा को टिकट मिलता है तो लालमुनि यादव के खेमे को साधना आसान नहीं होगा, और अगर टिकट के बाद किसी एक पक्ष ने भीतर ही भीतर दूरी बना ली तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है, क्योंकि शिवपुर-चरचा में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्षी पार्टी से ज्यादा आंतरिक वोट ट्रांसफर और गुटीय राजनीति हो सकती है।
दिसंबर में फैसला सिर्फ अध्यक्ष का नहीं,कांग्रेस के भविष्य का भी…– शिवपुर-चरचा में इस बार मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस जरूर होगा,लेकिन उसके पहले कांग्रेस के भीतर ही एक और मुकाबला चल रहा है,लालमुनि यादव बनाम अंशु लकड़ा, भूपेंद्र यादव बनाम अजीत ‘कज्जू’ लकड़ा, संगठन बनाम स्थानीय राजनीतिक समीकरण, इन तीनों स्तरों पर होने वाली हलचल यह तय करेगी कि कांग्रेस चुनाव से पहले कितनी एकजुट होती है,यदि पार्टी दोनों खेमों को साथ लेकर चलती है और एक मजबूत महिला प्रत्याशी के पीछे पूरी संगठनात्मक ताकत खड़ी कर देती है तो शिवपुर-चरचा में मुकाबला कांटे का हो सकता है,लेकिन यदि टिकट के साथ ही कांग्रेस में बगावत,नाराजगी या निष्कि्रयता पैदा होती है तो भाजपा को बिना अतिरिक्त मेहनत के बड़ा राजनीतिक लाभ मिल सकता है, इसलिए दिसंबर 2026 का शिवपुर-चरचा चुनाव केवल नगरपालिका अध्यक्ष चुनने का चुनाव नहीं होगा,यह कांग्रेस की पुरानी अंदरूनी लड़ाई का हिसाब भी लेगा और भाजपा के ‘ट्रिपल इंजन’ दावे की स्थानीय परीक्षा भी, और अंततः सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा की कांग्रेस किसे टिकट देगी,दूसरा खेमा कितना साथ देगा और क्या कभी ‘जय-वीरू’ रही यह जोड़ी फिर एक मंच पर आएगी? इसका जवाब टिकट की घोषणा से शुरू होगा और दिसंबर के चुनाव परिणाम पर जाकर खत्म होगा।


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