छत्तीसगढ़ की राजनीति में पोस्टर वार ने फिर गर्माया माहौल;व्यंग्य के पीछे उठे सवालों का जवाब नारों से नहीं,काम से देना होगा
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों पोस्टर केवल दीवारों पर चिपके कागज नहीं रह गए हैं। वे सत्ता और विपक्ष के बीच चल रहे राजनीतिक संवाद,आरोप-प्रत्यारोप और जनता के बीच अपनी-अपनी कहानी स्थापित करने का माध्यम बन चुके हैं। कांग्रेस की ओर से जारी किया गया हालिया व्यंग्यात्मक पोस्टर इसी राजनीतिक शैली का एक नया उदाहरण है,जिसमें भाजपा सरकार और उसके संगठन के बीच कथित तालमेल की कमी को लेकर तीखा कटाक्ष किया गया है। पोस्टर में संगठन के शीर्ष पदाधिकारी द्वारा मंत्रियों और नेताओं की ‘क्लास’लगाए जाने का चित्रण करते हुए सरकार के मंत्रियों को ‘कमजोर विद्यार्थी’बताया गया है। सतह पर यह महज राजनीतिक व्यंग्य दिखाई देता है,लेकिन इसके भीतर विपक्ष का एक स्पष्ट संदेश छिपा है…सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और संगठन को स्वयं मंत्रियों की कार्यशैली पर निगरानी रखनी पड़ रही है। अब यह आरोप कितना सच है और कितना राजनीतिक कल्पना का हिस्सा,इसका फैसला पोस्टर नहीं कर सकता। लेकिन राजनीति में पोस्टर की असली ताकत इसी बात में होती है कि वह जटिल राजनीतिक संदेश को कुछ शब्दों और एक तस्वीर में जनता तक पहुंचा देता है।
कांग्रेस ने इस पोस्टर में खराब सड़कों,धान के भंडारण,नकली दवाइयों और कथित कमीशनखोरी जैसे मुद्दों को भी शामिल किया है। यही वह हिस्सा है जिसे केवल राजनीतिक मजाक कहकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। विपक्ष का काम ही सरकार से सवाल पूछना है। यदि सड़कें खराब हैं तो सरकार को जवाब देना होगा,यदि धान के भंडारण में समस्या है तो जिम्मेदारी तय करनी होगी,यदि नकली दवाइयों का कारोबार सामने आ रहा है तो कार्रवाई दिखनी चाहिए और यदि कमीशनखोरी के आरोप लग रहे हैं तो जांच के जरिए सच सामने आना चाहिए। लेकिन यहां विपक्ष के सामने भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। आरोप लगाना आसान है,प्रमाण के साथ सवाल उठाना कठिन। पोस्टर बनाना आसान है,जनता के मुद्दे को लगातार सदन,सड़क और प्रशासनिक मंच तक ले जाना कठिन। इसलिए यदि विपक्ष वास्तव में जनहित के मुद्दों को उठा रहा है तो उसे पोस्टर की राजनीति से आगे बढ़कर उन मुद्दों पर ठोस दस्तावेज,आंकड़े और तथ्य जनता के सामने रखने चाहिए। सत्ता पक्ष के लिए भी यह पोस्टर एक राजनीतिक संदेश से अधिक एक अवसर है। यदि सरकार को लगता है कि विपक्ष केवल भ्रम फैला रहा है तो उसका सबसे प्रभावी जवाब पलटवार वाला पोस्टर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला काम होगा। सड़कें सुधर जाएं,धान का भंडारण व्यवस्थित हो जाए,नकली दवाओं पर कठोर कार्रवाई हो और भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई दिखाई दे तो विपक्ष के पोस्टर अपने आप कमजोर पड़ जाएंगे। राजनीति में सबसे मजबूत जवाब प्रेस विज्ञप्ति नहीं,परिणाम होता है।
यह भी देखना दिलचस्प है कि संगठन और सरकार के संबंधों को लेकर विपक्ष किस तरह की तस्वीर जनता के सामने रखना चाहता है। संगठन का सरकार पर निगरानी रखना अपने आप में असामान्य बात नहीं है। राजनीतिक दलों में संगठन और सरकार की अपनी-अपनी भूमिकाएं होती हैं। संगठन जनता और कार्यकर्ताओं से मिलने वाली प्रतिक्रिया सरकार तक पहुंचाता है और सरकार उस प्रतिक्रिया के आधार पर अपनी कार्यशैली सुधारती है। इसे लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा भी माना जा सकता है। लेकिन यदि समीक्षा बैठकें सार्वजनिक राजनीतिक तमाशे की तरह प्रस्तुत होने लगें या बार-बार यह संदेश जाए कि संगठन को सरकार के कामकाज पर ‘क्लास’ लगानी पड़ रही है,तो विपक्ष को राजनीतिक मुद्दा मिलना स्वाभाविक है। सत्ता पक्ष को यह तय करना होगा कि समीक्षा की प्रक्रिया संगठनात्मक मजबूती का संकेत बने या कमजोरी की सार्वजनिक धारणा पैदा करे।
वहीं कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि जनता केवल पोस्टर देखकर अपना फैसला नहीं करती। आज का मतदाता पहले की तुलना में अधिक जानकारी रखता है। वह पोस्टर भी देखता है,सरकार का काम भी देखता है और विपक्ष का व्यवहार भी। वह यह भी देखता है कि जो मुद्दे विपक्ष उठा रहा है, उनके समाधान के लिए उसने स्वयं क्या प्रयास किए। पोस्टर वार लोकतंत्र की भाषा का हिस्सा हो सकता है,लेकिन लोकतंत्र को केवल पोस्टर वार तक सीमित कर देना खतरनाक है। राजनीति यदि सिर्फ मीम, पोस्टर, वीडियो और सोशल मीडिया के कटाक्षों तक सिमट गई तो वास्तविक मुद्दे धीरे-धीरे पीछे छूट जाएंगे। जनता को सड़क चाहिए,पोस्टर नहीं;अस्पताल में दवा चाहिए,राजनीतिक आरोप नहीं; किसान को अपनी उपज के भंडारण और भुगतान की चिंता है,उसे राजनीतिक व्यंग्य से राहत नहीं मिलेगी। इसलिए कांग्रेस के पोस्टर में उठाए गए सवालों का जवाब भाजपा को राजनीतिक भाषा में नहीं,प्रशासनिक प्रदर्शन में देना चाहिए। और कांग्रेस को भी यह साबित करना होगा कि वह केवल सत्ता पर तंज कसने के लिए नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को गंभीरता से उठाने के लिए विपक्ष में है।
पोस्टर में चाहे कोई मंत्री ‘कमजोर विद्यार्थी’ दिखाई दे,असली परीक्षा चुनाव के मैदान में नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में होती है। सड़क पर चलते नागरिक,अस्पताल पहुंचता मरीज,खेत में खड़ा किसान,स्कूल जाता बच्चा और राशन की दुकान पर खड़ा गरीब—यही वे परीक्षक हैं,जिनके हाथ में सरकार की असली मार्कशीट है। इसलिए पोस्टर लगते रहें,व्यंग्य चलते रहें और राजनीतिक वार-पलटवार भी होते रहें—लोकतंत्र में इसकी जगह है। लेकिन अंततः जनता यही पूछेगी कि किसने सवाल ज्यादा अच्छे पूछे और किसने काम ज्यादा अच्छा किया?
क्योंकि सियासत की दीवार पर पोस्टर कुछ दिनों में उतर जाता है,लेकिन सड़क का गड्ढा,किसान की परेशानी और मरीज की तकलीफ लंबे समय तक याद रहती है।
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