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@कविता @न बिछड़े कभी

पंछी का पंछीन बिछड़े कभीपतझड़ में भी कोई घरन उजड़े कभीहाथों की लकीरों मेंचाहे जो लिखा होधड़कने धड़कनों सेना बिछड़े कभीजिंदगी में दुख तोआते -जाते रहते हैंपर कांत की कांतन छूटे कभीपतझड़ में भीपत्ता शाख सेन टूटे कभीपंछी का पंछीन बिछड़े कभी।गरिमा राकेश गर्विताकोटा ,राजस्थान

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कविता@ ठंडी की धूप

मास है शरद ऋतु, सिहराती ठंडी हैरोम-रोम सिहरन,तन को कँपाती है।धूप है सुनहरी ये,मन को लुभाती हैठंड की है धूप,तन-मन को भाती है।धूप है सलौनी और बड़ी मस्तानी हैबाग में बहार आई लगती सुहानी है।फूल हैं खिलते अब कली मुस्काई हैठंड की धूप में रौनकता भर आई है।शीतल सुगन्ध ठंडी हवा चली आई हैतरु-तृण धरा सभी ओस से नहाई है।मोतियों …

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