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सूरजपुर/ओड़गी@ शिकायत लेकर पहुंचा था न्याय मांगने, आरोप है कि थाने में ही पिट गया फरियादी!

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ओडगी थाना प्रभारी पर गंभीर आरोप, जमीन विवाद की शिकायत नहीं ली, उल्टे मारपीट का लगाया आरोप
एक पक्ष की रिपोर्ट आधे घंटे में दर्ज, दूसरे पक्ष को दो दिन तक चक्कर? पुलिस की निष्पक्षता पर उठे सवाल
सूरजपुर/ओड़गी 23 जून 2026 (घटती-घटना)।
कानून के दरवाजे पर न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचा एक युवक अब खुद पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है, ओडगी थाना क्षेत्र में सामने आए एक मामले ने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। आरोप है कि जमीन विवाद में शिकायत लेकर दो दिनों से थाने का चक्कर काट रहे युवक की न तो शिकायत दर्ज की गई और न ही उसका आवेदन लिया गया, जबकि विपक्षी पक्ष की रिपोर्ट पर बिना जांच के तत्काल एफआईआर दर्ज कर ली गई। इससे भी गंभीर आरोप यह है कि जब युवक ने अपनी शिकायत दर्ज करने की मांग दोहराई तो उसे थाने के भीतर ही कथित रूप से मारपीट का शिकार होना पड़ा।

दो दिन तक न्याय की गुहार, लेकिन नहीं सुनी गई फरियाद- शिकायतकर्ता के अनुसार जमीन विवाद से जुड़ा मामला 21 जून 2026 का है, घटना के बाद वह लगातार थाना ओडगी पहुंचकर अपनी शिकायत दर्ज कराने का प्रयास करता रहा, उसका आरोप है कि पुलिस ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे लगातार टालते रहे, आवेदन लेने तक की जहमत नहीं उठाई गई और एफआईआर दर्ज करना तो दूर, मामले की प्रारंभिक जांच तक नहीं की गई, युवक का कहना है कि वह न्याय की उम्मीद में थाने पहुंचता रहा, लेकिन उसे केवल इंतजार और निराशा ही मिली।
आधे घंटे में एफआईआर, आखिर इतनी जल्दी कैसे?- मामले का सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिकायतकर्ता के अनुसार 22 जून को विपक्षी पक्ष को थाने बुलाया गया और उनकी शिकायत पर मात्र आधे घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज कर ली गई, आरोप है कि यह कार्रवाई बिना निष्पक्ष जांच और दोनों पक्षों की बात सुने की गई, अब सवाल उठ रहा है कि जब एक पक्ष की शिकायत पर इतनी तत्परता दिखाई जा सकती है तो दूसरे पक्ष की शिकायत को दो दिन तक क्यों अनसुना किया गया? क्या कानून का पैमाना दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग है?
शिकायत दर्ज कराने की मांग की तो थाने में ही मारपीट?- शिकायतकर्ता का सबसे गंभीर आरोप थाना प्रभारी जगन एस. कंवर पर है, उसका दावा है कि 23 जून को जब वह फिर से थाने पहुंचा और अपनी शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की, तब थाना प्रभारी ने उसकी बात सुनने के बजाय कथित रूप से उसके साथ मारपीट की, यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला नहीं होगा, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल होगा जहां नागरिक अपनी सुरक्षा और न्याय के लिए पहुंचते हैं।
आखिर युवक के पास ऐसा क्या था जिसे लेकर हुई खींचतान?– वायरल वीडियो सामने आने के बाद एक नया सवाल भी चर्चा का विषय बन गया है, वीडियो में दिखाई दे रहा है कि थाना परिसर के भीतर युवक और पुलिसकर्मियों के बीच किसी वस्तु को लेकर खींचतान जैसी स्थिति बनती नजर आ रही है, इस दृश्य को देखकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर युवक के पास ऐसा क्या था जिसे पुलिस अपने कब्जे में लेना चाहती थी और युवक उसे बचाने की कोशिश कर रहा था, हालांकि वीडियो में यह स्पष्ट दिख रहा है कि युवक के हाथ में मोबाइल फोन था, लेकिन वीडियो के सामने आने के बाद क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं, यदि युवक के आरोपों पर विश्वास किया जाए तो वह अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए थाने पहुंचा था, ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या उसके पास मामले से जुड़ा कोई दस्तावेज, आवेदन अथवा ऐसा कोई साक्ष्य था जिसे लेकर विवाद की स्थिति बनी? या फिर मामला कुछ और था? इसका जवाब केवल निष्पक्ष जांच और पुलिस के आधिकारिक पक्ष के बाद ही सामने आ सकेगा।
वीडियो ने खड़े कर दिए कई नए सवाल– युवक के हाथ में आखिर क्या था? पुलिस और युवक के बीच खींचतान किस बात को लेकर हुई? क्या युवक अपनी शिकायत या कोई दस्तावेज बचाने का प्रयास कर रहा था? क्या पूरे घटनाक्रम का सीसीटीवी फुटेज मौजूद है? क्या वरिष्ठ अधिकारी मामले की जांच कराएंगे? वायरल वीडियो के बाद अब मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि थाने के भीतर हुई कथित घटना और पुलिस के व्यवहार को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं, अब लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक करते हैं या नहीं।
पुलिस थाना या फरियादियों के लिए भय का केंद्र?- लोकतांत्रिक व्यवस्था में थाना वह स्थान माना जाता है जहां पीडç¸त व्यक्ति अपनी समस्या लेकर पहुंचता है और उसे कानून के अनुसार संरक्षण मिलता है, लेकिन यदि फरियादी ही यह आरोप लगाने लगे कि उसकी शिकायत नहीं सुनी गई और उसे प्रताडç¸त किया गया, तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाएगी, क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यदि शिकायतकर्ता के आरोपों में सच्चाई है तो पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर शिकायत दर्ज करने में भेदभाव क्यों किया गया और कथित मारपीट की नौबत क्यों आई।
निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी सच्चाई– फिलहाल यह आरोप शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए हैं और मामले में पुलिस विभाग का पक्ष सामने आना बाकी है, लेकिन आरोप इतने गंभीर हैं कि उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है, अब निगाहें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर टिकी हैं, सवाल केवल एक जमीन विवाद का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का है जो आम नागरिक कानून व्यवस्था पर करता है, यदि न्याय मांगने वाला ही खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।


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