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संपादकीय@न्याय का दोहरा पैमाना या व्यवस्था का विरोधाभास?

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एक राज्य में आत्मसमर्पण के बाद एनकाउंटर, दूसरे राज्य में तिहरा हत्याकांड के बाद आत्मसमर्पण — आखिर कानून की दिशा कौन तय कर रहा है?
एक देश, एक कानून… फिर न्याय की तस्वीर अलग-अलग क्यों दिखती है?

लेख by रवि सिंह- बिहार के भोजपुर जिले में 17 जून 2026 को हुई भारत भूषण तिवारी की मौत और छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के नौगई गांव में 16 जून 2026 को हुए तिहरे हत्याकांड ने कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, दोनों घटनाएं अलग-अलग राज्यों में हुईं, लेकिन दोनों में एक समानता है कि दोनों राज्य भाजपा शासित हैं, इसके बावजूद दोनों मामलों में पुलिस कार्रवाई की जो तस्वीर सामने आई है, वह एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है।
बिहार के मामले में चर्चा इस बात की है कि भारत भूषण तिवारी का एनकाउंटर हुआ, विभिन्न माध्यमों में यह भी कहा गया कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ था और आत्मसमर्पण की स्थिति में था, यदि ऐसा था तो यह सवाल स्वाभाविक है कि आत्मसमर्पण की स्थिति में पहुंचे व्यक्ति के खिलाफ घातक पुलिस कार्रवाई की नौबत क्यों आई? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अपेक्षा की जाती है कि यदि कोई व्यक्ति हथियार डाल देता है या पुलिस के नियंत्रण में आ जाता है, तो उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई न्यायालय के माध्यम से हो, ऐसे में यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत का नहीं बल्कि पुलिस कार्रवाई की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का विषय बन गया है।
दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का नौगई तिहरा हत्याकांड है, यह घटना अपनी क्रूरता के कारण पूरे प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में चर्चा का विषय बनी, आरोप है कि चार लोगों को वाहन में बंद कर आग लगा दी गई, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया, किसी व्यक्ति को जिंदा जलाना सामान्य अपराध नहीं माना जा सकता, यह ऐसा अपराध है जो समाज को झकझोर देता है और लोगों के मन में भय पैदा करता है, ऐसी घटना के बाद आमतौर पर जनता की अपेक्षा होती है कि पुलिस आरोपियों तक पहुंचने के लिए सख्त कार्रवाई करेगी, लेकिन इस मामले में चर्चा गिरफ्तारी से ज्यादा आत्मसमर्पण को लेकर हुई, यही बात लोगों के मन में सवाल पैदा कर रही है, जिस अपराध में तीन लोगों की जान चली गई, उस मामले में आरोपियों के आत्मसमर्पण की कहानी सामने आती है, जबकि दूसरे राज्य में आत्मसमर्पण की चर्चा के बीच एनकाउंटर की खबर सामने आती है।
इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर कानून का व्यवहार किस आधार पर तय हो रहा है? क्या हर मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली एक जैसी है? क्या सभी आरोपियों के लिए समान मानक अपनाए जाते हैं? यदि हां, तो दोनों घटनाओं की तस्वीर इतनी अलग क्यों दिखाई देती है? कानून का मूल सिद्धांत यह है कि अपराधी कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे न्यायालय के सामने पेश किया जाए और वहीं उसके अपराध का निर्धारण हो, पुलिस की भूमिका अपराध की जांच और आरोपी को कानून के सामने लाने तक सीमित मानी जाती है, लेकिन जब किसी मामले में एनकाउंटर और किसी दूसरे मामले में आत्मसमर्पण की चर्चा प्रमुख हो जाती है, तब लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है, नौगई कांड और भोजपुर की घटना में एक और समानता है, दोनों मामलों ने जनता के बीच यह बहस छेड़ दी है कि क्या देश में न्याय की प्रक्रिया हर जगह एक जैसी दिखाई देती है? क्या अलग-अलग परिस्थितियों में कानून का स्वरूप भी बदल जाता है? या फिर यह केवल घटनाओं की प्रकृति और परिस्थितियों का अंतर है?
लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है, यह विश्वास तभी मजबूत रहता है जब कानून का व्यवहार निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे, यदि किसी कार्रवाई पर सवाल उठते हैं तो उनका जवाब भी उतनी ही पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए, क्योंकि न्याय केवल किया जाना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही जरूरी होता है, आज बिहार और कोरिया की घटनाएं केवल दो आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं हैं, ये घटनाएं उस व्यापक सवाल को जन्म दे रही हैं कि क्या देश में कानून का व्यवहार हर मामले में समान रूप से दिखाई देता है? जब तक इन सवालों के स्पष्ट और भरोसेमंद जवाब नहीं मिलते, तब तक ये दोनों घटनाएं चर्चा और विवाद का विषय बनी रहेंगी।

रवि सिंह
कोरिया छत्तीसगढ़



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