Breaking News

मनेंद्रगढ़/बैकुंठपुर@ जब पूरी फोर्स वर्दी में थी…तब ‘सुपर कॉप’ बिना वर्दी के क्यों?

Share

  • जब पूरा पुलिस महकमा वर्दी में था, तब ‘मायावी प्रधान आरक्षक’ अपने ही नियमों पर चलते दिखे…
  • आम जनता को दिखती हैं कमियां, कैमरे में कैद हो जाती हैं तस्वीरें, लेकिन सिस्टम की आंखों तक पहुंचते-पहुंचते सब कैसे गायब हो जाता है?
  • नौगई तिहरा हत्याकांड में ‘सुपर कॉप’ की नई एंट्री! क्या कुछ लोगों के लिए नियमों की किताब अलग होती है?
  • नौगई हत्याकांड की कार्रवाई में दिखा अनुशासन का दोहरा मापदंड!
  • जो जनता को दिखा, वह सिस्टम को क्यों नहीं दिखा?
  • नियम सलाम ठोकते रहे, ‘मायावी’ आगे बढ़ता रहा!
  • कानून के रखवाले और नियमों के अपवाद पर अनुशासन की वर्दी में एक ‘अपवाद’ क्यों?
  • नौगई कांड के आरोपियों से ज्यादा चर्चा एक तस्वीर की…


-रवि सिंह-
मनेंद्रगढ़/बैकुंठपुर,21 जून 2026 (घटती-घटना)।
नौगई तिहरा हत्याकांड में नामजद सभी 9 आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अपनी कार्रवाई को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, तीन लोगों की हत्या से जुड़े इस बहुचर्चित मामले में आरोपियों का आत्मसमर्पण,गिरफ्तारी और उन्हें न्यायालय तक पहुंचाने की प्रक्रिया सुर्खियों में रही, लेकिन इसी बीच एक तस्वीर और वीडियो ने ऐसी चर्चा छेड़ दी है जिसने अपराधियों से ज्यादा पुलिस व्यवस्था के भीतर मौजूद एक अलग ही कहानी को सामने ला दिया है।
तस्वीर उस समय की है जब आत्मसमर्पण करने वाले आरोपियों को मनेंद्रगढ़ थाने के लॉकअप से निकालकर बैकुंठपुर भेजा जा रहा था,थाना प्रभारी सहित लगभग 10 से 15 पुलिसकर्मी पूरी वर्दी में दिखाई दे रहे थे, किसी की बेल्ट चमक रही थी,किसी के कंधे पर स्टार और बैज अनुशासन का संदेश दे रहे थे,देखने वाला कह सकता था कि पुलिस विभाग की नियमावली का अक्षरशः पालन हो रहा है,लेकिन इसी भीड़ में एक ऐसा चेहरा भी था जो मानो यह घोषणा कर रहा था कि नियम सबके लिए होते हैं,लेकिन कुछ लोग नियमों से ऊपर भी होते हैं,वह थे क्षेत्र में चर्चित प्रधान आरक्षक,जो इस पूरी कार्रवाई के दौरान वर्दी में नहीं दिखाई दिए,(यह लेख मेरे स्वतंत्र विचार एवं विश्लेषणात्मक टिप्पणी, किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध दोष सिद्ध होना सक्षम विभागीय या न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।)
अब सवाल यह है कि जब हत्या जैसे गंभीर मामले में आरोपियों को पुलिस अभिरक्षा में ले जाया जा रहा था और वहां मौजूद प्रत्येक पुलिसकर्मी वर्दी में था, तब एक पुलिसकर्मी को इस व्यवस्था से अलग रहने का विशेषाधिकार किसने दिया? क्या पुलिस विभाग में कोई नई श्रेणी बन गई है? एक श्रेणी वह जो नियमों का पालन करती है और दूसरी वह जिसके लिए नियम सिर्फ सलाह की तरह हैं? यदि वर्दी आवश्यक नहीं थी तो बाकी पुलिसकर्मियों ने क्यों पहनी? और यदि आवश्यक थी तो फिर बिना वर्दी ड्यूटी करने वाले के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यह पहली बार नहीं,इसलिए सवाल और बड़ा है…
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है,क्षेत्र में अक्सर संबंधित प्रधान आरक्षक को बिना वर्दी या अलग अंदाज में देखा जाता रहा है, इसलिए लोगों की हैरानी इस बात पर नहीं है कि वह बिना वर्दी दिखाई दिए, बल्कि इस बात पर है कि इतने वर्षों बाद भी किसी अधिकारी को यह दिखाई क्यों नहीं दिया, चाय की दुकानों पर चर्चा है,सोशल मीडिया पर चर्चा है, पत्रकारों के कैमरे में तस्वीरें कैद हो जाती हैं, आम नागरिक इसे देख लेते हैं,लेकिन विभागीय अधिकारियों की नजर वहां तक क्यों नहीं पहुंचती? यही वह सवाल है जिसका जवाब शायद जनता जानना चाहती है।
संरक्षण का ऐसा कवच,जिसमें सारी शिकायतें समा जाती हैं?
क्षेत्र में एक धारणा तेजी से बनती जा रही है कि संबंधित प्रधान आरक्षक को कोई ऐसा संरक्षण प्राप्त है, जो उन्हें हर सवाल, हर शिकायत और हर आलोचना से बचा लेता है,लोग कहते हैं कि सामान्य पुलिसकर्मी की छोटी सी गलती पर नोटिस जारी हो जाता है,स्पष्टीकरण मांगा जाता है,लाइन अटैच कर दिया जाता है, विभागीय जांच बैठ जाती है,लेकिन यहां तस्वीरें सामने आती हैं,चर्चाएं होती हैं, सवाल उठते हैं,फिर भी सब कुछ सामान्य बना रहता है,यही वजह है कि अब लोग उन्हें केवल सुपर कॉप नहीं बल्कि मायावी प्रधान आरक्षक भी कहने लगे हैं, क्योंकि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी वर्दी नहीं,बल्कि वह माया बताई जाती है जिसमें शिकायतें दाखिल होते ही अदृश्य हो जाती हैं।
सत्ता बदलती रही,लेकिन ‘माया’ कायम रही…
सबसे दिलचस्प चर्चा यह है कि वर्षों में सरकारें बदलीं,मंत्री बदले, विधायक बदले,पुलिस कप्तान बदले,थानेदार बदले,अधिकारी बदले,लेकिन यदि कुछ नहीं बदला तो वह इस प्रधान आरक्षक की प्रभावशाली स्थिति, लोग व्यंग्य में कहते हैं कि लोकतंत्र में सरकार पांच साल की होती है,लेकिन इनका प्रभावकाल शायद उससे कहीं ज्यादा लंबा है,सत्ता चाहे किसी भी दल की रही हो,विभाग में कोई भी अधिकारी आया हो,लेकिन इनकी कार्यशैली को लेकर उठे सवाल कभी किसी निर्णायक कार्रवाई तक नहीं पहुंचे,इसीलिए अब जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि शायद इनका वास्तविक पदनाम प्रधान आरक्षक नहीं,बल्कि सिस्टम से अप्रभावित अधिकारी होना चाहिए।
क्या विभाग के लिए अनुशासन चयनात्मक हो गया है?
पुलिस विभाग अनुशासन के लिए जाना जाता है,यहां वर्दी का महत्व उतना ही है जितना न्यायालय में न्यायाधीश के वस्त्र का,लेकिन यदि कुछ लोग खुलेआम उस अनुशासन से अलग दिखाई दें और फिर भी सब कुछ सामान्य बना रहे, तो सवाल केवल उस कर्मचारी पर नहीं उठता,बल्कि उस व्यवस्था पर भी उठता है जो यह सब देखकर भी मौन रहती है,क्योंकि अनुशासन तब तक प्रभावी नहीं माना जाता जब तक वह सब पर समान रूप से लागू न हो।
सबसे बड़ा सवालः आखिर यह ‘माया’ है क्या?
लोग पूछ रहे हैं कि आखिर वह कौन-सी शक्ति है जो एक सामान्य कर्मचारी को उपलब्ध नहीं है? क्या यह प्रभाव है? क्या यह संरक्षण है? क्या यह रिश्तों का नेटवर्क है? या फिर सचमुच कोई ऐसी माया है जिसके भीतर पहुंचते ही शिकायतें,नियम,अनुशासन और जवाबदेही सब गायब हो जाते हैं? क्योंकि यदि जनता को दिख रहा है, पत्रकारों को दिख रहा है,कैमरों को दिख रहा है,सोशल मीडिया को दिख रहा है,तो फिर विभाग को क्यों नहीं दिख रहा?
इस मुद्दे पर मेरा स्वयं का कटाक्ष
पुलिस विभाग में वर्दी अनुशासन का प्रतीक मानी जाती है,लेकिन शायद कुछ लोग इतने बड़े हो जाते हैं कि अनुशासन को ही उनकी पहचान के हिसाब से ढलना पड़ता है,आम पुलिसकर्मी नियम पुस्तिका देखकर ड्यूटी करते हैं,लेकिन कुछ लोग शायद नियम पुस्तिका को देखकर मुस्कुरा देते हैं,जनता कहती है कि कानून की आंखें सब कुछ देखती हैं,लेकिन यहां मामला कुछ ऐसा दिखाई देता है कि कानून की आंखें खुली हैं, कैमरे भी चालू हैं,तस्वीरें भी सामने हैं, फिर भी सब कुछ अदृश्य है।
चीखते सवाल
नौगई तिहरा हत्याकांड में आरोपियों की गिरफ्तारी महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि पुलिस विभाग अपने भीतर के अनुशासन को कितना गंभीरता से लेता है, क्योंकि अपराधियों को पकड़ना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन अपने ही नियमों का पालन कराना पुलिस की विश्वसनीयता का आधार है, और जब किसी कर्मचारी को लेकर वर्षों से एक ही तरह की चर्चाएं चलती रहें, तस्वीरें सामने आती रहें, सवाल उठते रहें और फिर भी कोई जवाब न मिले, तो सवाल व्यक्ति से आगे बढ़कर पूरे सिस्टम पर खड़े होने लगते हैं, आखिर जनता यह जानना चाहती है कि यह सुपर कॉप है, मायावी प्रधान आरक्षक है या फिर संरक्षण की ऐसी मिसाल, जहां नियमों की किताब भी प्रवेश करने से पहले अनुमति मांगती है?


Share

Check Also

बलरामपुर@अवैध रेत परिवहन पर प्रशासन का शिकंजा,6 वाहन जब्त

Share सेंदूर नदी क्षेत्र में खनिज विभाग की कार्रवाई से मचा हड़कंप,खनिज नियमों के तहत …

Leave a Reply