
सरकारी सेवा में रहते हुए निजी क्लीनिक,एक्स-रे और सोनोग्राफी संचालन के आरोप,डॉक्टर ने कहा…सभी आरोप निराधार, क्लीनिक विधिवत पंजीकृत
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,06 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। जिले के रामानुजनगर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ एक सरकारी चिकित्सक के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर चार माह बाद भी कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आने से मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है,शिकायतकर्ता प्रमोद पांडे ने जिला कलेक्टर को स्मरण पत्र (रिमाइंडर) सौंपकर पूरे मामले की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराए जाने की मांग की है,शिकायतकर्ता का कहना है कि मार्च 2026 में शिकायत दर्ज कराने के बावजूद न तो उन्हें जांच की स्थिति से अवगत कराया गया और न ही किसी कार्रवाई की जानकारी दी गई,यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक सरकारी चिकित्सक पर शासकीय सेवा के दौरान निजी क्लीनिक संचालन, एक्स-रे एवं सोनोग्राफी जैसी सेवाओं के संचालन से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि संबंधित चिकित्सक ने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए अपना पक्ष स्पष्ट किया है।
27 मार्च को की गई थी शिकायत, चार माह बाद फिर पहुंचा मामला कलेक्टर तक-शिकायतकर्ता प्रमोद पांडे के अनुसार उन्होंने 27 मार्च 2026 को जिला कलेक्टर सूरजपुर को विस्तृत लिखित शिकायत सौंपकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामानुजनगर में पदस्थ एमबीबीएस चिकित्सक डॉ. डी.के.विश्वकर्मा के विरुद्ध जांच की मांग की थी,शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संबंधित चिकित्सक शासकीय सेवा में रहते हुए निजी क्लीनिक का संचालन कर रहे हैं, साथ ही बिना आवश्यक वैधानिक अनुमति के एक्स-रे एवं सोनोग्राफी (अल्ट्रासाउंड) सेवाएं भी संचालित किए जाने का आरोप लगाया गया था, अब चार माह बीत जाने के बाद शिकायतकर्ता ने पुनः स्मरण पत्र देकर प्रशासन से मामले में शीघ्र निर्णय लेने की मांग की है।
कार्रवाई नहीं होने से बढ़ रहा संदेह- शिकायतकर्ता का कहना है कि शिकायत के बाद यदि समय पर जांच प्रारंभ हो जाती तो अब तक पूरा मामला स्पष्ट हो चुका होता, उनका आरोप है कि कार्रवाई में हो रही देरी से आम लोगों के बीच यह संदेश जा रहा है कि प्रभावशाली लोगों के मामलों में जांच आगे नहीं बढ़ती, उन्होंने कहा कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर सेवा नियमों के उल्लंघन के आरोप लगते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना प्रशासन की जिम्मेदारी है,जांच में यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो संबंधित अधिकारी को क्लीन चिट मिलनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
स्मरण पत्र में उठाई गई प्रमुख मांगें- कलेक्टर को सौंपे गए स्मरण पत्र में शिकायतकर्ता ने मांग की है कि 27 मार्च 2026 को प्रस्तुत शिकायत की तत्काल उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए,जांच पूरी होने तक निजी क्लीनिक,एक्स-रे एवं सोनोग्राफी सेवाओं के संचालन की वैधानिक स्थिति की जांच की जाए, संबंधित अभिलेखों एवं अनुमति पत्रों का परीक्षण किया जाए,यदि जांच में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित प्रावधानों के तहत विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए।
शिकायतकर्ता का दावा—वर्षों से चल रहा है निजी संचालन– प्रमोद पांडे का दावा है कि संबंधित चिकित्सक पिछले लगभग दस वर्षों से निजी क्लीनिक तथा जांच सेवाओं का संचालन कर रहे हैं,उनका कहना है कि यदि प्रशासन चाहे तो संबंधित दस्तावेजों एवं अभिलेखों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है, हालांकि इस दावे की अभी तक किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, इसकी पुष्टि केवल विभागीय अथवा प्रशासनिक जांच के बाद ही हो सकेगी।
डॉ. डी.के. विश्वकर्मा ने सभी आरोपों को किया खारिज-पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामानुजनगर में पदस्थ एमबीबीएस चिकित्सक डॉ. डी.के. विश्वकर्मा ने कहा कि उनके विरुद्ध लगाए गए सभी आरोप तथ्यहीन एवं निराधार हैं,उन्होंने कहा मेरे ऊपर लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं, मुझे आपके माध्यम से ही इन आरोपों की जानकारी मिली है,जहां तक एक्स-रे सेवा का प्रश्न है, रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण पिछले लगभग चार माह से एक्स-रे मशीन बंद है। वहीं सोनोग्राफी मशीन भी पिछले लगभग एक वर्ष से बंद है और उससे कोई जांच नहीं की जा रही है,जिस क्लीनिक के संचालन की बात कही जा रही है,वह नर्सिंग होम अधिनियम के तहत विधिवत पंजीकृत है,विभागीय जांच के संबंध में मुझे अब तक कोई आधिकारिक जानकारी प्राप्त नहीं हुई है,यदि विभाग द्वारा जांच की जा रही है, तो मैं उसमें पूरा सहयोग करूंगा।
अब प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण-इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता और संबंधित चिकित्सक के दावे एक-दूसरे से भिन्न हैं, ऐसे में वास्तविक स्थिति केवल सक्षम प्रशासनिक एवं विभागीय जांच से ही स्पष्ट हो सकती है,यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच होती है तो यह भी स्पष्ट होगा कि क्या संबंधित चिकित्सक द्वारा निजी क्लीनिक का संचालन सेवा नियमों के अनुरूप था? एक्स-रे एवं सोनोग्राफी सेवाओं की वास्तविक स्थिति क्या थी? संबंधित क्लीनिक एवं चिकित्सा सेवाओं के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमतियां उपलब्ध थीं या नहीं? शिकायत मिलने के बाद प्रशासनिक स्तर पर क्या कार्रवाई की गई?
पारदर्शी जांच से ही दूर होगा संशय
यह मामला केवल एक चिकित्सक या एक शिकायत तक सीमित नहीं है,बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और शिकायतों के समयबद्ध निराकरण से भी जुड़ा हुआ है, यदि जांच निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से पूरी की जाती है तो इससे न केवल शिकायतकर्ता और संबंधित चिकित्सक के बीच उठे विवाद का समाधान होगा,बल्कि आम नागरिकों का प्रशासनिक व्यवस्था पर विश्वास भी मजबूत होगा,फिलहाल पूरे मामले में अंतिम निष्कर्ष विभागीय जांच के बाद ही सामने आएगा,जांच पूरी होने तक लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं मानी जा सकती और संबंधित चिकित्सक ने आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार किया है।
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