Breaking News

सूरजपुर@संघर्ष के पहियों पर सवार होकर संजय ने रचा सफलता का इतिहास…

Share

  • छोटे किसान के बेटे संजय ने राष्ट्रीय परीक्षा में हासिल की 158वीं रैंक
  • समोसा बेचकर पढ़ाई,रोज 50 किलोमीटर साइकिल से सफर… अब राष्ट्रीय परीक्षा में 158 वीं रैंक…
  • छोटे किसान के बेटे संजय की संघर्षगाथा,एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद नहीं छोड़ी पढ़ाई…
  • एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद पांच साल तक रोज 50 किलोमीटर साइकिल चलाकर की पढ़ाई,खेत में काम करने के साथ बाजार में बेचा समोसा…


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,22 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। शासकीय आर.आर.एम.स्नातकोत्तर महाविद्यालय,सूरजपुर के रसायन शास्त्र विभाग के पूर्व विद्यार्थी संजय कुमार ने अपनी मेहनत, संघर्ष और आत्मविश्वास के दम पर वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद- विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति परीक्षा में 158 वीं रैंक हासिल की है,छोटे से गांव और किसान परिवार से आने वाले संजय कुमार की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है,क्योंकि उन्होंने सीमित आर्थिक संसाधनों,शारीरिक कठिनाइयों और लंबे दैनिक सफर के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखी और आज उच्च शिक्षा एवं शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। संजय कुमार वर्तमान में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय,बिलासपुर में पीएच.डी. शोध कर रहे हैं,वे अपने शोध की निवास अवधि पूरी कर चुके हैं और इसके साथ ही शासकीय महाविद्यालय सिलफिली,सूरजपुर में रसायन शास्त्र के अतिथि व्याख्याता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं,उनकी इस उपलब्धि से शासकीय आर.आर.एम. स्नातकोत्तर महा विद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग में खुशी का माहौल है,महाविद्यालय के प्राचार्य सहित समस्त प्राध्यापकों ने संजय कुमार को उनकी सफलता पर बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और सफल शोध यात्रा की शुभकामनाएं दी हैं।
छोटे किसान परिवार से निकले संजय-संजय कुमार ग्राम करकोली नया के रहने वाले हैं, वे छोटे किसान बच्चू लाल सोनी के पुत्र हैं,किसान परिवार में जन्मे संजय के लिए उच्च शिक्षा हासिल करने का रास्ता आसान नहीं था,दसवीं,बारहवीं,स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई के दौरान उन्हें लगातार आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा,परिवार की आर्थिक स्थिति सीमित होने के कारण पढ़ाई के साथ उन्हें परिवार की जिम्मेदारियों में भी हाथ बंटाना पड़ता था, लेकिन इन परिस्थितियों ने उनके भीतर पढ़ाई के प्रति लगन को कम नहीं किया,संजय ने कठिन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय उन्हें अपनी ताकत बनाया और शिक्षा की राह पर लगातार आगे बढ़ते रहे।
कोचिंग का सहारा नहीं लिया, स्वयं अध्ययन को बनाया आधार-संजय कुमार की सफलता की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए किसी कोचिंग संस्थान का सहारा नहीं लिया, उन्होंने स्वयं अध्ययन को अपनी तैयारी का आधार बनाया। जरूरत पड़ने पर उन्होंने यूट्यूब के माध्यम से भी अध्ययन सामग्री का लाभ लिया, सीमित संसाधनों में अपनी तैयारी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने रसायन शास्त्र से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं में सफलता हासिल की, संजय कुमार ने वीआरईटी, गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय,छत्तीसगढ़ राज्य पात्रता परीक्षा,स्नातकोत्तर अभियांत्रिकी अभिरुचि परीक्षा,वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा एवं कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति तथा छत्तीसगढ़ शिक्षक पात्रता परीक्षा के द्वितीय प्रश्नपत्र को उत्तीर्ण किया है,इन सफलताओं के बाद अब वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति परीक्षा में 158 वीं रैंक हासिल करना उनकी शैक्षणिक यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि बन गया है।
रसायन शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विकेश कुमार झा के मार्गदर्शन को दिया श्रेय-संजय कुमार ने अपनी सफलता का श्रेय शासकीय आर.आर.एम.स्नातकोत्तर महा विद्यालय के रसायन शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. विकेश कुमार झा के निरंतर मार्गदर्शन, सहयोग और समय-समय पर मिले प्रोत्साहन को दिया है,संजय के अनुसार डॉ. विकेश कुमार झा के मार्गदर्शन ने उनकी शैक्षणिक यात्रा के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई,उन्होंने कहा कि विभागाध्यक्ष का मार्गदर्शन उन्हें लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा,पढ़ाई के दौरान मिली सलाह और प्रोत्साहन से उन्हें अपने लक्ष्य को लेकर आत्मविश्वास मिला,संजय ने कहा कि इसी मार्गदर्शन के कारण वे रसायन शास्त्र से जुड़ी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने में सफल हो सके।
संघर्ष के बीच लगातार आगे बढ़ते रहे-संजय कुमार की उपलब्धि को केवल परीक्षा में हासिल की गई रैंक के रूप में देखना उनकी पूरी यात्रा को अधूरा समझना होगा, एक छोटे किसान के घर से निकलकर उच्च शिक्षा तक पहुंचना,आर्थिक कठिनाइयों के बीच पढ़ाई जारी रखना, एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद रोजाना 50 किलोमीटर साइकिल चलाना, परिवार के साथ खेत में काम करना और जरूरत पड़ने पर बाजार में समोसा बेचना—इन सबके बीच उन्होंने अपने अध्ययन को लगातार जारी रखा, कई बार परिस्थितियां उन्हें पढ़ाई से दूर कर सकती थीं,लेकिन उन्होंने हर बार वापस अपनी किताबों की ओर लौटने का रास्ता चुना, उनकी सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि उन्होंने आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों को अपनी शिक्षा के सामने निर्णायक बाधा नहीं बनने दिया।
देर से सही,लेकिन मंजिल की ओर बढ़ते रहे-संजय कुमार की यात्रा यह भी दिखाती है कि सफलता हमेशा एक ही गति से नहीं आती, कई बार परिस्थितियों के कारण विद्यार्थी को आगे बढ़ने में अधिक समय लगता है, संजय भी अपनी पढ़ाई के दौरान अनेक कठिनाइयों से गुजरे। लेकिन उन्होंने अपनी गति को अपनी मंजिल के बीच नहीं आने दिया, धीरे-धीरे उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की,प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं, शोध के क्षेत्र में कदम रखा और अब कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति परीक्षा में 158वीं रैंक हासिल कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि अपने नाम की है, आज वे पीएच.डी. शोध के साथ अध्यापन भी कर रहे हैं और रसायन शास्त्र के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं।
रसायन शास्त्र विभाग के कई पूर्व विद्यार्थियों ने भी हासिल की सफलता-
शासकीय आर.आर.एम. स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग के लिए संजय कुमार की सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विभाग के अनेक पूर्व विद्यार्थी विभिन्न राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल कर चुके हैं,विभाग के अनुसार अनेक पूर्व विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा,स्नातकोत्तर अभियांत्रिकी अभिरुचि परीक्षा और राज्य पात्रता परीक्षा जैसी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की है,विभागाध्यक्ष डॉ. विकेश कुमार झा के मार्गदर्शन एवं सहयोग से विद्यार्थियों में उच्च शिक्षा, शोध और प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति रुचि बढ़ने की बात कही गई है,संजय कुमार की सफलता इसी शैक्षणिक वातावरण की एक और उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है।
महाविद्यालय में खुशी का माहौल- संजय कुमार के वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति परीक्षा में 158वीं रैंक हासिल करने पर महाविद्यालय में खुशी का माहौल है, महाविद्यालय के प्राचार्य एवं समस्त प्राध्यापकों ने संजय कुमार को उनकी शानदार सफलता पर बधाई दी। उनके उज्ज्वल भविष्य और शोध यात्रा की सफलता के लिए शुभकामनाएं भी दी गईं,रसायन शास्त्र विभाग ने संजय कुमार की उपलब्धि पर गर्व व्यक्त करते हुए उनके आगे भी इसी तरह सफलता हासिल करने की कामना की है।
संघर्ष से निकली सफलता की कहानी-संजय कुमार की कहानी उस विद्यार्थी की कहानी है जिसने परिस्थितियों को अपने सपनों से बड़ा नहीं होने दिया,छोटे किसान का बेटा,गांव का विद्यार्थी,एक पैर से दिव्यांग,रोज 50 किलोमीटर साइकिल का सफर,चार घंटे आने-जाने में खर्च,खेत में परिवार का हाथ,बाजार में समोसा बेचकर पढ़ाई का खर्च और बिना किसी कोचिंग के स्वयं अध्ययन…इन तमाम परिस्थितियों के बीच आज वही संजय कुमार राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित परीक्षा में 158वीं रैंक हासिल कर चुके हैं,उनकी यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार और महाविद्यालय के लिए गौरव का विषय है,बल्कि उन विद्यार्थियों के लिए भी उम्मीद की कहानी है जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को छोटा समझने लगते हैं,संजय कुमार ने यह साबित किया है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए रास्ता हमेशा आसान होना जरूरी नहीं है,जरूरी यह है कि कठिन रास्ते पर भी कदम रुकें नहीं, आज खेत और बाजार से पढ़ाई तक का उनका संघर्ष शोध और अध्यापन की नई मंजिल तक पहुंच चुका है,कनिष्ठ अनुसंधान वृत्ति में 158वीं रैंक उनकी इसी लंबी मेहनत का परिणाम है और उनकी आगे की शोध यात्रा की एक नई शुरुआत भी।
पांच साल तक रोज 50 किलोमीटर साइकिल से सफर
संजय कुमार के संघर्ष की सबसे बड़ी तस्वीर उनके विद्यार्थी जीवन के उस दौर में दिखाई देती है,जब वे रोजाना करीब 50 किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज पहुंचते और वापस घर लौटते थे,लगभग पांच वर्षों तक उन्होंने यह दिनचर्या जारी रखी,घर से महाविद्यालय आने-जाने में उन्हें करीब चार घंटे का समय लग जाता था,एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने साइकिल से यह लंबा सफर तय किया,रोजाना घंटों का सफर,कॉलेज की पढ़ाई और उसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां—इन सबके बीच उन्होंने कभी अपनी पढ़ाई को बीच में नहीं छोड़ा,उनके लिए महाविद्यालय तक पहुंचना ही एक चुनौती थी,लेकिन उन्होंने इस चुनौती को अपनी शिक्षा के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया।
खेत में परिवार का हाथ बंटाया,बाजार में समोसा भी बेचा
संजय कुमार की संघर्ष की कहानी केवल साइकिल से 50 किलोमीटर रोजाना सफर करने तक सीमित नहीं है, पढ़ाई के खर्च को पूरा करने और परिवार की आर्थिक मदद के लिए उन्होंने अपने परिवार के साथ कृषि कार्य में भी हाथ बंटाया,इसके अलावा वे अपने पिता के साथ बाजार में समोसा बेचने का काम भी करते थे,कई बार ऐसा होता था कि संजय कॉलेज की आधी छुट्टी लेकर बाजार चले जाते थे,वहां वे अपने पिता के साथ समोसे की दुकान लगाने में सहयोग करते थे। इसके बाद वापस पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों में जुट जाते थे,एक तरफ पढ़ाई,दूसरी तरफ परिवार के साथ कृषि कार्य और तीसरी तरफ बाजार में समोसा बेचकर परिवार की मदद—इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा,उनका मानना रहा कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों,पढ़ाई को जारी रखना जरूरी है।
विश्वविद्यालय में शोध के दौरान भी मिला सहयोग
संजय कुमार वर्तमान में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय,बिलासपुर में पीएच.डी. शोध कर रहे हैं,शोध के दौरान उन्हें अपने शोध निर्देशक डॉ. नीरज सिंह, प्रोफेसर जी.के. पात्रा, विभागाध्यक्ष प्रोफेसर के.सी. देवांगन तथा विभाग के सभी प्राध्यापकों का निरंतर मार्गदर्शन और सहयोग प्राप्त हो रहा है,उन्होंने शोध प्रयोगशाला में साथ काम करने वाले अपने सभी साथियों के सहयोग के लिए भी आभार व्यक्त किया। विशेष रूप से उन्होंने देवानंद साहू के सहयोग का उल्लेख किया,संजय का कहना है कि शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने के दौरान मिलने वाला मार्गदर्शन और सहयोग उनके लिए महत्वपूर्ण रहा है।
अध्यापन के साथ शोध का सफर
संजय कुमार की वर्तमान यात्रा केवल शोध तक सीमित नहीं है,वे शासकीय महाविद्यालय सिलफिली,सूरजपुर में रसायन शास्त्र के अतिथि व्याख्याता के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ा भी रहे हैं,एक ओर वे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पीएच.डी. शोध कर रहे हैं,तो दूसरी ओर महाविद्यालय में अध्यापन के माध्यम से विद्यार्थियों के साथ अपने ज्ञान और अनुभव को साझा कर रहे हैं,इस प्रकार विद्यार्थी के रूप में शुरू हुआ उनका सफर अब शोधकर्ता और शिक्षक की भूमिका तक पहुंच चुका है।


Share

Check Also

सूरजपुर@सेवा संकल्प अभियान की गतिविधियों को लेकर सख्त निर्देश

Share सभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शत-प्रतिशत उपलब्धि सुनिश्चित करने के निर्देश : डॉ. प्रशांत सिंह …

Leave a Reply