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अंबिकापुर@गाय-बैलों को हडिय़ा और घुघरी खिलाकर मनाया सोहराई पर्व, जूठा प्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं परिवार के लोग

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दीपावली के दूसरे दिन निभाई जाती है सदियों पुरानी परंपरा, पशुधन की पूजा से होती है पर्व की शुरुआत; सरगुजा की आदिवासी संस्कृति में खास महत्व

  • संवाददाता –
    अंबिकापुर, 07 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)। दीपावली पर जहां देशभर में लोग मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं, वहीं सरगुजा संभाग के आदिवासी समाज में इस पर्व को मनाने की परंपरा कुछ अलग है। यहां दीपावली के दूसरे दिन गाय-बैलों की पूजा कर उन्हें पारंपरिक पेय हडिय़ा और घुघरी खिलाई जाती है। खास बात यह है कि पशुओं को खिलाने के बाद बची हुई घुघरी और हडिय़ा को परिवार के सदस्य व मेहमान प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। आदिवासी समाज में इसे पशुधन के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने की परंपरा के रूप में देखा जाता है।
    उदय पंडो ने बताया कि पूर्वजों से चली आ रही इस परंपरा में सबसे पहले मुर्गी की पूजा कर लक्ष्मी पूजा की शुरुआत की जाती है। इसके बाद गाय-बैलों को घुघरी खिलाई जाती है। पशुओं को भोजन कराने के बाद परिवार के लोग उनके जूठे को आशीर्वाद स्वरूप ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि पशुधन की कृपा और आशीर्वाद से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसके बाद पिछले आठ दिनों से तैयार किए जा रहे पारंपरिक पेय हडिय़ा को गाय-बैलों को चखाया जाता है। पशुओं को खिलाने-पिलाने के बाद बचा हुआ हडिय़ा और घुघरी घर के सदस्यों के साथ मेहमानों को भी परोसा जाता है।
    पटाखों के बजाय परंपराओं के साथ मनाते हैं पर्व
    इस पर्व की एक और खासियत यह है कि इसमें पटाखे फोडऩे और आतिशबाजी की जगह पारंपरिक रीति-रिवाजों को महत्व दिया जाता है। कंदमूल और कोहड़ा (कद्दू) अर्पित कर पूजा-अर्चना की जाती है। कुछ क्षेत्रों में गुरु-शिष्य परंपरा का भी निर्वहन होता है। शिष्य अपने गुरु को कोहड़ा भेंट कर सम्मान प्रकट करते हैं। सरगुजा संभाग में आदिवासी समाज की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, पशुधन और पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। बदलते समय के बावजूद ग्रामीण अंचलों में लोग अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। सोहराई पर्व के जरिए नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों, लोक मान्यताओं और पारंपरिक जीवनशैली से जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है।
    पशुधन को समर्पित है यह पर्व
    आदिवासी समाज की जीवनशैली में गाय-बैलों का विशेष महत्व है। खेती-किसानी से लेकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पशुधन की अहम भूमिका रही है। ऐसे में सोहराई के माध्यम से समाज पशुओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है। इस दिन सुबह गोशाला और पशुओं को साफ किया जाता है। गाय-बैलों को नहलाकर उनके शरीर पर तेल व घी लगाया जाता है और पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की जाती है। कई स्थानों पर घरों के आंगन और दरवाजों पर गाय के खुरों के निशान भी बनाए जाते हैं। इन्हें शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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