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कविता @ हवाओं से ख्वाहिशें…

हवाओं की तरह होती है ख्वाहिशेना एक जगह टिकती हैना एक जगह रूकती हैबहती रहती है निरंतरउड़ाती रहती है परों पर अपनेनित नई ख्वाहिशों के परहवा की तरह इन ख्वाहिशों का भीकोई आशियाना नही होतारंग ,रूप और आकार नही होता ।बस फैली रहती है ये मन के संसार मेंइन ख्वाहिशों का कोई मजहब नही होता ।

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लेख @ आधुनिकता से बिखरते परिवार और त्रासदी झेलते बच्चे और बुजुर्ग

भारत मूलतः परंपरावादी वैदिक तथा सनातनी देश है पर आधुनिकता ने देश के संयुक्त परिवारों को खंडित कर दिया है। अधिकांश परिवार अब एकल परिवार में परिवर्तित हो गए हैं ऐसे में बुजुर्ग तथा बच्चे सबसे ज्यादा इस त्रासदी के शिकार हुए हैं। आधुनिक जीवन शैली ने माता पिता को नन्हे बच्चों से दूर कर दिया है इसी तरह बुजुर्गों …

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लेख @ सोचा आज तकलीफ को तकलीफ का एहसास करा दूं मैं…

सोचा आज तकलीफ को तकलीफ का एहसास करा दू-मैं उफ्फ़ कितना दर्द है इन लिखी पंक्तियों मे। एक लेखक की इन पंक्तियों को पढ़ जैसे कलेजा ही फटने लगा ऐसा लगा भीतर ही भीतर एक दर्द भरी चीख दब के रह गई है जो चीख-चीख कर कहना तो बहुत कुछ चाहती पर कह नहीं पा रही अपने अंतर्मन की वेदना …

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