शताब्दियो से हमारा समाज पुरुष प्रधान रहा है। घर के अंदर और घर के बाहर सभी फैसले पुरुषों द्वारा ही लिए जाते हैं। घोड़ी पर बैठकर पुरुष महिला के साथ विवाह करके घर लाता है। जहां वह अपने ससुराल वालों की सेवा करती है, बच्चे पैदा करती है और अगर कोई औरत बेटा पैदा करने के बदले में बेटियां पैदा करती है इसे अप शकुन माना जाता है। एक पुरुष तो घर में दूसरी पत्नी ला सकता है परंतु एक औरत अपने घर में दूसरा पति नहीं ला सकती। लड़की को उसके घर वाले विवाह से पहले ही यह शिक्षा देते हैं कि जहां उसकी डोली जा रही है वहीं से उसकी अर्थी निकलनी चाहिए और बेचारी लड़की ससुराल वालों के ताने,मारपीट और गालियां सहती है। सदियों से पुरुष के द्वारा पैसा कमा कर लाने तथा स्त्री के द्वारा घर गृहस्ती संभालने की परंपरा रही है। क्योंकि आर्थिक तौर पर वह पति तथा ससुराल वालों पर निर्भर करती रही है इसलिए वह उनकी गुलामी सहती रही है। विवाह से पहले उसके अपने मां-बाप भी उसके भाई के मुकाबले में उसके साथ पढ़ाई,खाना पीना तथा आजादी देने को लेकर भेदभाव करते रहे हैं। उसे अपने ही घर में पराई अमानत समझकर समय काटना पड़ता है।

लेकिन अब जमाना बदल गया है। महिलाओं को पढ़ाना,लिखाना,नौकरी करवाना,सेना,पुलिस प्रशासन,व्यापार तकनीकी शिक्षा,अंतरिक्ष में इस तरह भेजा जाने लगा है जैसे कि पहले यह काम पुरुष किया करते थे। आज की महिला पढ़ लिखकर घर की चौखट से बाहर आ चुकी है। विश्व में महिलाओं ने अब अपनी धाक जमा रखी है। श्रीमती भंडार नायके श्रीलंका की प्रधानमंत्री बनने वाली पहली महिला थी,उसके बाद इंग्लैंड में श्रीमती मार ग्रेट थैचर,भारत में श्रीमती इंदिरा गांधी,इटली में जॉर्जिया मेलोनी तथा जापान में सुश्री सनाए तत्काइची प्रधानमंत्री बनी। भारत में श्रीमती प्रतिभा पाटिल, सुश्री द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति का पद संभालने वाली महिला रही है। महिलाएं लोकसभा की अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट की जज,गवर्नर तथा मंत्री बनती रही है। महिला सशक्तिकरण को लेकर महिला आयोग स्थापित किया गया है,घरेलू हिंसा,दहेज प्रताड़ना,महिलाओं के यौन शोषण को रोकने के लिए कई कानून पास किए गए हैं। अगर किसी महिला के साथ उसके ससुराल वाले दुर्व्यवहार कर रहे हैं तो वह कोर्ट कचहरी जा सकती है,तलाक ले सकती है। आज महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कहींभी पीछे नहीं है। परीक्षाओं में वह लड़कों को पछाड़ रही हैं,अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में वह पुरुषों के मुकाबले में ज्यादा मैडल लाकर देश का नाम रोशन कर रही है,स्थानीय प्रशासन में महिलाओं को आरक्षण मिला हुआ है, महिलाएं पंच तथा सरपंच बनती है। महिलाएं डॉक्टर,वकील,इंजीनियर, व्यापारी,बहुराष्ट्र्रीय कंपनियों की सीईओ बनती है। सरकार ने महिलाओं को संसद तथा विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का कानून पहले ही पास कर रखा है। इसी प्रकार का आरक्षण देने तथा परिसीमन का कानून सरकार पास करवाना चाहती थी परंतु संसद में दो तिहाई बहुमत न होने के कारण ऐसा नहीं करवा सकी। महिलाओं के कल्याण के लिए सरकार ने बहुत सारी योजनाएं लागू कर रखी हैं जैसे बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ,महिलाओं के खाते में हर मास धनराशि जमा करवाना आदि बातें सरकार के द्वारा उठाए गए महिला सशक्तिकरण के कारण ही हो रही है।
लेकिन अगर महिला सशक्तिकरण के दूसरे पहलू को देखें तो पता चलेगा की तस्वीर का दूसरा हिस्सा वैसा नहीं है जैसा कि दिखाया जा रहा है या जैसे कि होना चाहिए। चाहे सरकार महिला सशक्तिकरण का कितना भी ढोल पीट ले, पुरुष कभी भी महिलाओं को अपने बराबर अधिकार,स्वतंत्रता तथा छूट नहीं देगा जितना कि इसके बारे में प्रौपेगंडा किया जा रहा है। महिला सशक्तिकरण के बहाने सरकार उनके ऊपर वोटो की राजनीति कर रही है और कुछ नहीं। महिलाओं के कल्याण के बहाने सरकार उनके वोट ही लेना चाहती है। यह बात पिछले विधानसभा चुनावों में साबित हो चुकी है। संसद तथा विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या महिला सशक्ति करण की पोल खोल देती है। अभी तक किसी राजनीतिक दल ने इलेक्शन लड़ने के लिए महिलाओं को 33 प्रतिशत टिकटें नहीं दी है।
महिला सशक्तिकरण के लिए बनाए गए कानूनों का महिलाएं ही दुरुपयोग करने लगी हैं। विवाहित लड़कियां अपने ससुराल में बस तो पाती नहीं क्योंकि घर वालों ने उन्हें अच्छे संस्कार नहीं दिए, हां यह जरूर कह रखा है कि अगर उसे ससुराल में कोई दिक्कत हो तो वह उसका साथ देंगे। इसी कारण से बहुत सारी लड़कियों का दिमाग खराब हो जाता है और कोई ना कोई बहाना लगाकर वह अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ पुलिस में झूठीरिपोर्ट दर्ज करवा लेती हैं या मुकदमा दर्ज करवा देती हैं क्योंकि कानून महिलाओं के पक्ष में है। पति तथा ससुराल वालों को जेल में बंद कर दिया जाता है। जब तक यह बेचारे लोग अपनी बेगुनाही साबित करते हैं तब तक उनकी इज्जत आबरू,नेक नामी मिट्टी में मिल चुकी होती है,वह किसी को मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं रहते। अगर ऐसा ही होना है तो महिला सशक्तिकरण किस काम का। घर औरत की समझदारी,सहनशीलता,ममता,दूर दर्शिता तथा संस्कारो से चलता है। पति-पत्नी में छोटे-मोटे झगड़े तो होते रहते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि घर गृहस्ती को इस तरह उजाड़ दिया जाए। इतना ही नहीं महिला सशक्तिकरण के नाम पर औरतों को जो आजादी मिली है उसका वह दुरुपयोग करने लगी हैं। कामवासना की कैदी कुछ महिलाएं अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति को मरवाने लगी हैं, कितना घोर कलयुग है कि कुछ सासें अपने दामाद के साथ ही घर से भागने लगी हैं। कुछ समय पहले महाराष्ट्र में महिला आयोग की एक अध्यक्षा, रूपाली एक ज्योतिषी के साथ रंगरलियां मनाती हुई पकड़ी गई थी,बाद में उसने सफाई देते हुए कहा कि अगर उसने अपने गुरु को अपने आप को अर्पित कर दिया है तो इसमें हर्ज क्या है। क्या यही महिला सशक्तिकरण है। हमारे राजनेता एक तरफ महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, दूसरी तरफ उनकी इज्जत आबरू के साथ खिलवाड़ करते हैं। बहुत सारी महिलाएं तो मंत्रियों तथा उच्च अधिकारियों के द्वारा यौन शोषण की बात शर्म के मारे किसी को बताती ही नहीं,अगर महिला सशक्तिकरण के नाम पर वोटो की राजनीति की जानी है, अगर महिला सशक्तिकरण के नाम पर यौन शोषण होना है,अगर महिला सशक्ति करण के नाम पर महिलाओं ने अपने पति को प्रेमी के साथ मिलकर मरवाना है,अगर महिला सशक्तिकरण के नाम पर पति तथा ससुराल वालों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करवाए जाने हैं,अगर महिला सशक्तिकरण के नाम पर मदिरापान, धूम्रपान या अश्लीलता को प्रदर्शित करने वाले न्यूनतम वस्त्र पहनने है तो इसका मतलब यह है महिला सशक्तिकरण अपने उद्देश्य से भटक गया है। हमारे देश में महिला से शक्ति करण की आवश्यकता तो है लेकिन इसके नाम पर कोई खेल खेलना मान्य नहीं है।
प्रो.शामलाल कौशल
रोहतक,हरियाणा
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur