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लेख@ बदन की नहीं,बुद्धि की बनाओ पहचान बहनों

अश्लीलता की रील संस्कृति पर एक सवालहम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ स्क्रीन पर दिखना असल में जीने से ज़्यादा जरूरी हो गया है। जहां जç¸ंदगी कैमरे के फ्रेम में सिमट गई है, और इंसान का मूल्य उसके लाइक, फॉलोवर और व्यूज़ से तय होता है। इसी डिजिटल होड़ में स्ति्रयों की अभिव्यक्ति भी एक अजीब मोड़ …

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लेख@ परीक्षा प्रणाली या सामाजिक भ्रमजाल?

शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला कहा गया है। यह व्यक्ति के ज्ञान, विवेक, सृजनात्मकता और व्यक्तित्व विकास का माध्यम रही है। लेकिन आज की तारीख में यह उद्देश्य कहीं पीछे छूट गया है। शिक्षा अब एक अंक-उद्योग में तब्दील हो चुकी है, जहां ज्ञान की बजाय नंबर ही सफलता का पर्याय बन गए हैं। अब यह न तो चरित्र …

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लेख@ अभिव्यक्ति की पीठ पर खड़ी पत्रकारिता और प्रतिष्ठा के मौन में थरथराता न्याय

जब पत्रकार अपने शब्दों से सत्ता की चुप्पियों को तोड़ता है, तो वह केवल सूचनाएँ नहीं बाँटता, वह सत्य की संभावनाएँ खोलता है। पर यही पत्रकार,जब डिजिटल माध्यम के अनियंत्रित तूफ़ान में खड़ा होता है, तो उसके शब्द तलवार बन सकते हैं—जिसका एक छोर जनहित की रक्षा करता है,और दूसरा अनजाने में किसी की प्रतिष्ठा को लहूलुहान कर सकता है। …

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