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कविता @ बाल श्रमिक…

आज एक नए युग,भारत का उदय हो रहा।देश में बहुत से, बालयुवा अंधेरों में जी रहा।अपने जिंदगी तंग आकर, होटलढाबा कारखाना में काम कर रहा।हालात और गरीबी से मजबूर,श्रमिकों के समक्ष गहरा रहा।जिनके हाथों में कलम किताब,वो मजदूरी दिहाड़ी कर रहा।बच्चे देश का निर्माण भविष्य,भारत का संविधान भी कह रहा।गरीबी की खातिर पेट के लिए,दो वक्त रोटी कमाने निकल रहा।पढ़ने …

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लेख @ पृथ्वी की उष्णता और जटिल समाधान, भविष्य ऑक्सीजन के बगैर ?

आजादी हमें मिली है यानी कि मानव को परंतु प्रकृति आजादी से अछूती रही है। अमूमन हमारी जरूरत रोटी, कपड़ा, मकान और जल की थी कि हमको उद्योग धंधे का विकास तीव्र गति से करना पड़ा। मशीनें जितनी बड़ी से बड़ी होती गई आदमी उतना ही बौना होता गया। जब हम अपने विकास का इतिहास देखते हैं तो ब्रिटिश सत्ता …

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लेख @ अब यही मेरी दुनिया है: एक स्त्री की चुपचाप क्रांति

कुछ औरतें मायके के बिना जीना सीख जाती हैं-न माँ की गोद,न भाई का कंधा, फिर भी हर रिश्ता निभाती हैं। दुख पी जाती हैं, आँसू अपने आँचल से पोंछ लेती हैं। कोई नहीं कहता बेटी थक गई होगी, पर वह खुद को समझा लेती है कि यही अब उसकी दुनिया है। यह कोई हार नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की चुपचाप …

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