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लेख@जनता की बात नहीं सुनते संपादक,फिर किसके लिए हैं अखबार?

महाराजा संपादक जब चौपाल बंद हो जाए और दरबार लगने लगेजनता की बात नहीं सुनते संपादक, फिर किसके लिए हैं अखबार?जब लोकतंत्र का प्रहरी—संपादक—जनता से संवाद बंद कर दे और सत्ता का दरबारी बन जाए,तब पत्रकारिता दम तोड़ने लगती है। आज बड़े संपादक आम आदमी से कट चुके हैं,गाँव-कस्बों की आवाज़ें अखबारों में गुम हैं। संवाद की जगह प्रचार ने …

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लेख@ जब बच्चों की शिक्षा पर भारी पड़ता है पाखंड

भारत में बच्चों की शिक्षा को लेकर सबसे बड़ा संकट केवल गरीबी या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि धार्मिक पाखंड है। कुछ स्वयंभू बाबाओं द्वारा शिक्षा को अपवित्र,स्ति्रयों के लिए अनुपयुक्त और समाज विरोधी बताकर बच्चों को स्कूल से दूर रखा जाता है। यह प्रवृत्ति न केवल संविधान के विरुद्ध है,बल्कि समाज की जड़ों को खोखला कर रही है। लेख …

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लेख@ डिंपल की तौहीन पर अखिलेश की चुप्पी की मजबूरी

उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की छवि एक प्रखर नेता के रूप में होती है। अखिलेश खुलकर अपनी बात कहते हैं। यूपी में बीजेपी को समाजवादी पार्टी टक्कर देती रही है,लेकिन अखिलेश की राजनीति का यह एक ही पक्ष है दूसरा पक्ष इसके बिल्कुल उलट है। दरअसल,बात जब अल्पसंख्यकों से जुड़ी होती है तो …

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