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अंबिकापुर@15 के बाद 11 फिर फरार…

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  • आखिर किसकी निगरानी में चल रहा संप्रेक्षण गृह?
  • दो फरारी कांड, एक ही अधिकारी का कार्यकाल…आखिर कब तय होगी जवाबदेही?
  • संप्रेक्षण गृह या फरारगृह? चार महीने में दूसरी बार सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त
  • चार महीने में दूसरी बड़ी फरारी,बाल संरक्षण विभाग की सुरक्षा व्यवस्था फिर बेनकाब
  • बाल संरक्षण विभाग की बड़ी चूक! संप्रेक्षण गृह से फिर 11 अपचारी बालक फरार
  • संप्रेक्षण गृह में सुरक्षा भगवान भरोसे! 11 अपचारी बालक फरार…विभाग फिर कठघरे में
  • खिड़की टूटी या पूरी व्यवस्था? संप्रेक्षण गृह से फरारी ने खोली बाल संरक्षण तंत्र की पोल
  • सुरक्षा के दावे कागजों में,अपचारी बालक सड़कों पर… आखिर जिम्मेदार कौन?
  • फरवरी में 15, जून में 11 अपचारी बालक भागे, अब तक 4 लौटे,7 की तलाश जारीआखिर कब जागेगा बाल संरक्षण विभाग?
  • जिला कार्यक्रम अधिकारी जगदेव राम प्रधान के कार्यकाल में दो बार फरारी, सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल
  • वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद, फिर भी मीडिया के सामने भेजा गया हाउस फादर, पूरे तंत्र की जवाबदेही पर उठा प्रश्न


-संवाददाता-
अंबिकापुर,25 जून 2026 (घटती-घटना)।
अंबिकापुर स्थित संप्रेक्षण गृह से 11 अपचारी बालकों के फरार होने की घटना ने एक बार फिर महिला एवं बाल विकास विभाग और बाल संरक्षण व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है,यह घटना इसलिए और भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि महज चार महीने पहले फरवरी 2026 में भी प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 अपचारी बालक फरार हो गए थे,उस समय विभाग ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने, समीक्षा करने और आवश्यक सुधार के बड़े-बड़े दावे किए थे,लेकिन अब फिर 11 बालकों का एक साथ फरार हो जाना उन सभी दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है। जानकारी के अनुसार घटना के समय संप्रेक्षण गृह में कुल 31 अपचारी बालक मौजूद थे,इनमें से 11 बालक खिड़की के रास्ते निकलकर फरार हो गए, ताजा जानकारी के अनुसार अब तक चार बालक वापस आ चुके हैं, जिनमें से एक को उसका परिवार स्वयं लेकर आया है,जबकि सात अन्य बालकों की तलाश पुलिस और प्रशासन द्वारा की जा रही है,लगातार दूसरी बार हुई इस घटना ने केवल सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, सबसे अधिक सवाल महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी जगदेव राम प्रधान के कार्यकाल पर उठ रहे हैं, क्योंकि चार महीने के भीतर दो बार इतनी बड़ी सुरक्षा चूक होना सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही माना जा रहा है।
लगातार विवादों में रहे जिला कार्यक्रम अधिकारी, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?
महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी जगदेव राम प्रधान का नाम केवल संप्रेक्षण गृह की सुरक्षा व्यवस्था में सामने आई चूकों तक सीमित नहीं है, उनके कार्यकाल में पूर्व में भी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर विवाद सामने आते रहे हैं,उपलब्ध शिकायतों और अभिलेखों के अनुसार अंबिकापुर और मनेन्द्रगढ़—दोनों स्थानों पर भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए कई शिकायतें विभाग और शासन स्तर तक भेजी गई थीं,शिकायतकर्ताओं ने भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और जांच की मांग की थी, अब जब उनके कार्यकाल में महज चार महीने के भीतर दो बार अपचारी बालकों के फरार होने जैसी गंभीर घटनाएं सामने आई हैं, तो यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या विभाग ने कभी उनके कार्य निष्पादन और प्रशासनिक निर्णयों का समग्र मूल्यांकन किया?
सवाल स्थानीय मंत्री से भी…
महिला एवं बाल विकास विभाग के मंत्री स्वयं क्षेत्र के वरिष्ठ जनप्रतिनिधि हैं, ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब एक ही अधिकारी को लेकर बार-बार शिकायतें,भर्ती विवाद और अब सुरक्षा व्यवस्था में लगातार विफलता जैसे मुद्दे सामने आ रहे हैं,तो विभागीय स्तर पर क्या समीक्षा की गई? यदि शिकायतें निराधार थीं, तो उनका सार्वजनिक रूप से निराकरण क्यों नहीं किया गया? यदि शिकायतें प्रथम दृष्टया गंभीर थीं, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई? और यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो क्या इसे प्रशासनिक उदासीनता माना जाए?
अब जवाबदेही तय करने का समय
चार महीने में दो बार बालकों का फरार होना केवल संयोग नहीं माना जा सकता,यदि पहले भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठे,फिर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर घटनाएं सामने आईं,तो सरकार और विभाग दोनों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि पूरे कार्यकाल की निष्पक्ष समीक्षा कराई जाए,जनता अब यह जानना चाहती है कि क्या लगातार शिकायतों के बावजूद अधिकारी को संरक्षण मिलता रहा? क्या विभाग ने शिकायतों की जांच पूरी की? क्या भर्ती संबंधी शिकायतों और वर्तमान प्रशासनिक विफलताओं के बीच कोई व्यापक प्रशासनिक समीक्षा होगी? क्या जवाबदेही केवल अधीनस्थ कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या शीर्ष अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय होगी? यदि शासन पारदर्शिता का दावा करता है, तो इन प्रश्नों के उत्तर भी सार्वजनिक होने चाहिए,इससे न केवल विभाग की विश्वसनीयता बढ़ेगी,बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में भी मदद मिलेगी।
वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे,फिर मीडिया के सामने क्यों भेजा गया हाउस फादर?
घटना के बाद कलेक्टर,एसडीएम,जिला कार्यक्रम अधिकारी,प्रभारी जिला बाल संरक्षण अधिकारी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी संप्रेक्षण गृह पहुंचे,निरीक्षण हुआ,बैठक हुई, समीक्षा हुई, लेकिन जब मीडिया ने सवाल पूछे तो सामने कौन आया? हाउस फादर,यह बात कई पत्रकारों और लोगों को हैरान कर गई,जब विभाग के जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद थे तो उन्होंने स्वयं मीडिया के सामने आकर घटना की जानकारी क्यों नहीं दी? क्या विभाग घटना को लेकर असहज था? क्या जिम्मेदारी तय होने की आशंका के कारण वरिष्ठ अधिकारी सामने आने से बचते रहे? या फिर विभाग निचले कर्मचारियों को आगे कर अपनी जवाबदेही से बचना चाहता था?
पुरानी खिड़की का तर्क…लेकिन जिम्मेदारी किसकी?
घटना के बाद विभाग की ओर से कहा गया कि जिस खिड़की से बालक भागे वह पुरानी थी, लेकिन यह तर्क अपने साथ कई नए प्रश्न भी लेकर आता है, यदि खिड़की पुरानी थी तो क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी? क्या नियमित निरीक्षण नहीं होता था? क्या किसी अधिकारी ने इसे बदलने या मजबूत करने की अनुशंसा नहीं की? जब वहां अपचारी बालक रखे जाते हैं तो क्या मजबूत ग्रिल और सुरक्षित संरचना प्राथमिक आवश्यकता नहीं होनी चाहिए? यदि खिड़की कमजोर थी तो यह केवल निर्माण संबंधी समस्या नहीं बल्कि नियमित रखरखाव और प्रशासनिक निगरानी की भी विफलता है।
अनुभवी काउंसलर को जिला कार्यालय, अनुभवहीन को संप्रेक्षण गृह… आखिर क्यों?-सूत्रों के अनुसार जिले के अनुभवी काउंसलर को जिला कार्यालय में अटैच कर दिया गया,जबकि संप्रेक्षण गृह जैसे संवेदनशील संस्थान में अपेक्षाकृत अनुभवहीन व्यक्ति को बालकों की काउंसलिंग का दायित्व सौंपा गया, यदि यह तथ्य सही है तो यह भी जांच का विषय है, अपचारी बालकों के पुनर्वास में काउंसलिंग सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, ऐसे में अनुभवी व्यक्ति को हटाकर कम अनुभव वाले कर्मचारी को जिम्मेदारी देने का आधार क्या था? क्या इस निर्णय का प्रभाव संस्थान के अनुशासन और सुरक्षा पर पड़ा?
अंदर जाने की अनुमति केवल दो-तीन कर्मचारियों को…आखिर क्यों?- सूत्रों के अनुसार संप्रेक्षण गृह के अंदर नियमित रूप से केवल दो-तीन कर्मचारियों को ही प्रवेश की अनुमति थी, यदि ऐसा है तो इसका कारण क्या है? क्या यह विभागीय नियम है? या फिर किसी विशेष व्यवस्था के तहत ऐसा किया जा रहा था? यदि अधिकांश कर्मचारियों को अंदर जाने की अनुमति नहीं थी तो निगरानी व्यवस्था कैसे संचालित हो रही थी? इस विषय पर विभाग को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
प्रभारी जिला बाल संरक्षण अधिकारी ने क्या कहा?-प्रभारी जिला बाल संरक्षण अधिकारी विक्रमांक सिंह के अनुसार अब तक चार अपचारी बालक वापस आ चुके हैं,इनमें से एक बालक को उसका परिवार स्वयं लेकर आया,बाकी सात बालकों की तलाश लगातार जारी है,उन्होंने यह भी बताया कि प्रशासन और पुलिस की संयुक्त टीम लगातार खोजबीन कर रही है।
लाखों का बजट… लेकिन सुरक्षा भगवान भरोसे?
बाल संरक्षण संस्थानों के संचालन,भोजन, सुरक्षा,काउंसलिंग, निगरानी और रखरखाव पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं,लेकिन यदि चार महीने में दो बार बालक फरार हो जाएं, सीसीटीवी अधूरे हों,कमजोर खिड़कियां बनी रहें,सुरक्षा व्यवस्था विफल हो जाए, वरिष्ठ अधिकारी जवाब देने से बचें, तो जनता यह पूछने को मजबूर है कि आखिर सरकारी धन खर्च कहां हो रहा है?
चार महीने… दो बड़ी फरारी… आखिर जिम्मेदार कौन?
फरवरी 2026 में प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 अपचारी बालकों के भागने की घटना सामने आई थी,उस समय विभागीय अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा, सुरक्षा ऑडिट,अतिरिक्त निगरानी और आवश्यक सुधार के दावे किए थे,अधिकारियों ने आश्वस्त किया था कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी,लेकिन चार महीने बाद जून में फिर 11 अपचारी बालकों का फरार हो जाना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर फरवरी की घटना से विभाग ने सीखा क्या? क्या सुरक्षा ऑडिट केवल कागजों तक सीमित रहा? क्या कमजोर स्थानों की पहचान नहीं की गई? क्या सुरक्षा व्यवस्था में सुधार केवल फाइलों में दर्ज होकर रह गया? यदि सुधार हुआ था तो उसका परिणाम कहां दिखाई देता है? लगातार दूसरी घटना यह संकेत देती है कि पहली घटना के बाद उठाए गए कदम या तो पर्याप्त नहीं थे या फिर उनका प्रभावी क्रियान्वयन ही नहीं हुआ।
जिला कार्यक्रम अधिकारी के कार्यकाल में दो बार फरारी,क्या जवाबदेही तय होगी?
महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी जगदेव राम प्रधान के कार्यकाल में चार महीने के भीतर यह दूसरी बड़ी फरारी की घटना है,पहली बार 15 बालक भागे,दूसरी बार 11 बालक भाग गए, यानी कुल 26 अपचारी बालक सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर बाहर निकलने में सफल रहे, ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग केवल अधीनस्थ कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करेगा या शीर्ष स्तर पर भी जवाबदेही सुनिश्चित होगी? जब किसी विभाग में लगातार एक जैसी गंभीर घटनाएं होती हैं तो प्रशासनिक जिम्मेदारी केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहती, यदि सुरक्षा व्यवस्था का दावा किया जा रहा था तो फिर यह व्यवस्था धरातल पर क्यों नहीं दिखाई दी?
जनता पूछ रही है…
फरवरी में 15 और जून में 11 बालक कैसे भाग गए?
जिला कार्यक्रम अधिकारी के कार्यकाल में लगातार सुरक्षा चूक क्यों हो रही है?
पहली घटना में किस अधिकारी पर कार्रवाई हुई?
पुरानी खिड़की को समय रहते बदला क्यों नहीं गया?
पूरे परिसर में सीसीटीवी क्यों नहीं लगाए गए?
अनुभवी काउंसलर को जिला कार्यालय क्यों भेजा गया?
केवल दो-तीन कर्मचारियों को ही अंदर जाने की अनुमति क्यों?
क्या इस बार भी केवल जांच समिति बनाकर मामला समाप्त कर दिया जाएगा?

यह केवल फरारी नहीं…पूरे बाल संरक्षण तंत्र की परीक्षा है…
अंबिकापुर की यह घटना केवल 11 अपचारी बालकों के फरार होने का मामला नहीं है, यह उस व्यवस्था की परीक्षा है,जो कानून के संरक्षण में रह रहे बच्चों की सुरक्षा, निगरानी और पुनर्वास की जिम्मेदारी निभाती है,यदि चार महीने में दो बार इतनी बड़ी घटनाएं हो जाती हैं और उसके बाद भी जिम्मेदारी तय नहीं होती,तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी विषय बन जाता है, अब देखना यह होगा कि इस बार भी मामला केवल जांच समिति, निरीक्षण और बैठकों तक सीमित रहता है या फिर वास्तव में उन अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है जिनके कार्यकाल में लगातार ऐसी घटनाएं सामने आई हैं,जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और व्यवस्था में वास्तविक सुधार देखना चाहती है।


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