


- ग्राम पंचायत एजेंसी,लेकिन निर्माण करा रहे कथित रूप से विधायक के करीबी,
- इंजीनियर और जनपद को जानकारी नहीं होने का दावा
- 12 फीट सड़क पर दोनों ओर नाली निर्माण से ग्रामीणों में नाराजगी,
- पानी निकासी की व्यवस्था नहीं,गुणवत्ता और तकनीकी स्वीकृति पर उठे गंभीर सवाल
- जनता पूछ रही है…
- ग्राम पंचायत एजेंसी है तो काम कौन करा रहा है?
- इंजीनियर को जानकारी नहीं थी तो निर्माण किसके आदेश पर शुरू हुआ?
- पांच लाख रुपये की लागत का निर्धारण किस आधार पर किया गया?
- पहले से बनी नाली की सफाई क्यों नहीं हुई?
- 12 फीट सड़क पर दोनों ओर नाली बनाने की तकनीकी आवश्यकता क्या थी?
- नाली का पानी आखिर जाएगा कहां?
- क्या किसानों की सहमति ली गई?
- क्या विधायक निधि के उपयोग में सभी नियमों का पालन किया जा रहा है?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,25 जून 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर जिले के भैयाथान जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत डबरीपारा में विधायक निधि से स्वीकृत लगभग पांच लाख रुपये की लागत से हो रहे नाली निर्माण कार्य को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं,जिस कार्य का क्रियान्वयन ग्राम पंचायत के माध्यम से होना है, उस कार्य को लेकर ग्रामीणों का आरोप है कि मौके पर पंचायत की बजाय विधायक के करीबी लोगों द्वारा निर्माण कराया जा रहा है,इससे भी बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि संबंधित तकनीकी अमला और जनपद पंचायत के अधिकारियों को भी कथित रूप से निर्माण शुरू होने की जानकारी नहीं थी, यदि यह दावा सही है तो आखिर सरकारी निर्माण कार्य किसकी अनुमति और किस तकनीकी स्वीकृति से प्रारंभ हुआ?
ग्रामीणों का कहना है कि लगभग 300 मीटर लंबी नाली का निर्माण कराया जा रहा है,जबकि इस कार्य के लिए लगभग पांच लाख रुपये की स्वीकृति मिली है,निर्माण स्थल पर न तो किसी प्रकार का सूचना बोर्ड लगाया गया है और न ही तकनीकी जानकारी सार्वजनिक की गई है, इससे लोगों में यह संशय बढ़ रहा है कि कहीं सरकारी राशि का उपयोग बिना निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए तो नहीं किया जा रहा।
निर्माण एजेंसी ग्राम पंचायत, फिर काम कौन करा रहा है?
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार विधायक निधि से स्वीकृत इस निर्माण कार्य की एजेंसी ग्राम पंचायत है,सामान्यतः ऐसे कार्यों की निगरानी पंचायत, तकनीकी विभाग और जनपद पंचायत के माध्यम से होती है,लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि मौके पर पंचायत के प्रतिनिधियों की भूमिका गौण है और निर्माण कार्य कथित रूप से विधायक के करीबी लोगों द्वारा कराया जा रहा है, यदि यह आरोप सही है तो कई प्रश्न खड़े होते हैं निर्माण सामग्री कौन खरीद रहा है? मजदूरों का भुगतान कौन कर रहा है? गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा? माप पुस्तिका (एमबी) कौन भरेगा? निर्माण पूर्ण होने का प्रमाणपत्र कौन देगा? यदि एजेंसी ग्राम पंचायत है तो पंचायत की भूमिका आखिर कहां दिखाई दे रही है?
इंजीनियर को जानकारी नहीं, फिर तकनीकी स्वीकृति किसने दी?
स्थानीय लोगों का दावा है कि संबंधित उप अभियंता (इंजीनियर) को भी कार्य प्रारंभ होने की जानकारी नहीं थी,यदि ऐसा है तो यह अत्यंत गंभीर विषय है, सरकारी निर्माण कार्य बिना तकनीकी स्वीकृति और ले-आउट के प्रारंभ नहीं किए जा सकते,ऐसे में सवाल उठ रहे हैं क्या निर्माण स्थल का तकनीकी निरीक्षण हुआ? क्या ले-आउट जारी किया गया? क्या ड्राइंग के अनुसार कार्य हो रहा है? क्या कार्य प्रारंभ करने की अनुमति संबंधित इंजीनियर ने दी? यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ तो निर्माण की गुणवत्ता और भुगतान दोनों सवालों के घेरे में आ सकते हैं।
बिना सहमति के निर्माण का आरोप
स्थानीय ग्रामीणों और किसानों का आरोप है कि नाली निर्माण से पहले उनसे कोई सहमति नहीं ली गई,न तो ग्राम सभा में व्यापक चर्चा हुई और न ही प्रभावित लोगों की राय ली गई,यदि यह आरोप सही है तो पंचायत राज अधिनियम की भावना पर भी प्रश्न उठते हैं,ग्राम पंचायत के विकास कार्यों में स्थानीय लोगों की सहभागिता और सहमति महत्वपूर्ण मानी जाती है।
नाली बनेगी…लेकिन पानी जाएगा कहां?
निर्माण कार्य को लेकर सबसे बड़ा सवाल जल निकासी को लेकर उठ रहा है, लगभग 300 मीटर लंबी नाली बनाई जा रही है, लेकिन उसके बाद पानी किस दिशा में छोड़ा जाएगा? क्या किसी नाले से इसे जोड़ा जाएगा? क्या किसी किसान के खेत में पानी छोड़ा जाएगा? यदि ऐसा होगा तो संबंधित भूमि स्वामी की सहमति ली गई है या नहीं? ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक जल निकासी की कोई समुचित व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही है, ऐसे में आशंका है कि बरसात के समय यह नाली स्वयं विवाद का कारण बन सकती है।
गुणवत्ता कौन देखेगा?
निर्माण कार्य में तकनीकी अधिकारी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है, यदि इंजीनियर की जानकारी के बिना निर्माण प्रारंभ हुआ है, जैसा कि ग्रामीण दावा कर रहे हैं, तो गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा? क्या निर्माण सामग्री मानक के अनुरूप है? क्या सीमेंट, गिट्टी और रेत का अनुपात सही रखा जा रहा है? क्या नाली की गहराई और चौड़ाई स्वीकृत डिजाइन के अनुसार है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर तकनीकी विभाग को देना होगा।
12 फीट सड़क पर दोनों ओर नाली, आवागमन कैसे होगा?
जिस सड़क पर नाली बनाई जा रही है उसकी चौड़ाई लगभग 12 फीट बताई जा रही है,यदि दोनों ओर नाली बन जाती है तो सड़क की उपयोगी चौड़ाई और कम हो जाएगी, ग्रामीणों का कहना है कि पहले ही गांव में पार्किंग की व्यवस्था नहीं है,ऐसी स्थिति में दो चारपहिया वाहन एक साथ नहीं निकल पाएंगे, आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या अग्निशमन वाहन के आवागमन में भी कठिनाई हो सकती है, क्या इस पहलू पर किसी तकनीकी अधिकारी ने विचार किया?
पहले से एक नाली मौजूद, फिर दूसरी बनाने की जरूरत क्यों?
ग्रामीणों के अनुसार सड़क के एक ओर पहले से नाली बनी हुई है,हालांकि वह वर्षों से सफाई नहीं होने के कारण मिट्टी और कचरे से पट चुकी है,ऐसे में ग्रामीण पूछ रहे हैं कि पहले पुरानी नाली की सफाई और मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? नई नाली बनाने की आवश्यकता किस आधार पर तय की गई? क्या किसी तकनीकी सर्वे के बाद यह निर्णय लिया गया? या केवल विधायक निधि खर्च करने के उद्देश्य से नया निर्माण शुरू कर दिया गया?
क्या विधायक निधि का उपयोग नियमों के अनुसार हो रहा है?
विधायक निधि का उद्देश्य जनहित के विकास कार्य कराना है,लेकिन यदि निर्माण कार्य नियमों के विपरीत,बिना तकनीकी स्वीकृति या बिना समुचित निगरानी के कराया जाता है तो इससे निधि के उपयोग पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है,यह भी जांच का विषय है कि क्या कार्य प्रारंभ करने से पहले सभी प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृतियां प्राप्त की गई थीं? क्या निर्माण एजेंसी की भूमिका का पालन हो रहा है? क्या भुगतान नियमानुसार होगा?
ग्राम पंचायत की हो रही किरकिरी…
इस पूरे मामले में सबसे अधिक सवाल ग्राम पंचायत की कार्यप्रणाली पर उठ रहे हैं,सरकारी रिकॉर्ड में एजेंसी पंचायत है,लेकिन यदि निर्माण कार्य का संचालन कोई अन्य कर रहा है तो भविष्य में किसी भी तकनीकी या वित्तीय अनियमितता की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी? पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका स्पष्ट होना आवश्यक है।
ग्रामीणों की मांग…पहले जांच…फिर निर्माण…
स्थानीय ग्रामीणों और किसानों ने मांग की है कि जब तक पूरे मामले की तकनीकी जांच नहीं हो जाती, तब तक निर्माण कार्य रोका जाए, उनका कहना है कि यदि बाद में डिजाइन या जल निकासी में त्रुटि सामने आती है तो सरकारी धन भी व्यर्थ जाएगा और ग्रामीणों को भी परेशानी होगी।
जांच से ही दूर होंगे संदेह…
डबरीपारा का यह मामला केवल नाली निर्माण का नहीं है,बल्कि सरकारी धन के उपयोग,पंचायत की जवाबदेही,तकनीकी स्वीकृति और विकास कार्यों में पारदर्शिता से जुड़ा मामला बन गया है, यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय है,वहीं यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित विभाग को भी तथ्य सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए,अब जिला प्रशासन,जनपद पंचायत और तकनीकी विभाग की जिम्मेदारी है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करें कि निर्माण कार्य सभी नियमों के अनुरूप हो रहा है या नहीं,यदि कहीं भी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाए, ताकि विधायक निधि जैसी जनहित की योजनाओं की विश्वसनीयता बनी रहे।
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