निषेध है या नहीं,यह अंतरात्मा की बात
नई दिल्ली,12 मई 2026। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौखिक रूप से कहा कि सबरीमला मंदिर में मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं को प्रवेश से रोकना निषेध’ है या नहीं, आखिरकार यह अंतरात्मा की बात है। शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि अगर लोग, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिये,मिलकर यह तय करते हैं कि इस प्रथा में सामाजिक सुधार की जरूरत है,तो कोर्ट शायद ऐसे सुधार को मान लेगा। सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ केरल के सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और दाऊदी बोहरा समेत कई धर्मों की धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और क्षेत्र से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। इस मामले में कुछ पक्षों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने सबरीमला मंदिर के बारे में कहा कि महिलाओं को मंदिर में जाने से रोकने का पूरा कारण उनके पीरियड्स की उम्र है। हंसारिया ने कहा, मुझे 10 साल की लड़की समझिए। मैं परिवार के साथ (मंदिर) जा रही हूं। पीरियड्स के बारे में, यह एक निषेध है जस्टिस नागरत्ना ने कहा, अगर आप इसे निषेध मानते हैं तो यह निषेध है और अगर आप इसे निषेध नहीं मानते (तो यह नहीं है) सवाल यह है कि आप इसे कैसे देखते हैं।
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