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बैकुंठपुर/कोरिया@ कोरिया का “गुप्त दरबार” और प्रभारी अधीक्षकों की रहस्यमयी पदस्थापना

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  • आदेश ऐसे बांटे गए मानो सरकारी नियुक्ति नहीं, कोई अंडरग्राउंड मिशन चल रहा हो!
  • सहायक आयुक्त कार्यालय का “सीक्रेट पोस्टिंग मॉडल” उजागर!
  • प्रभारी अधीक्षक बनने के लिए नियम नहीं, “व्यवस्था” जरूरी?
  • गुपचुप आदेश, फुसफुसाहट में पदस्थापना और वायरल न करने की हिदायत
  • आखिर प्रभारी अधीक्षक नियुक्ति थी या कोई अंडरग्राउंड ऑपरेशन?
  • दूरस्थ शिक्षकों पर मेहरबानी, स्थानीय शिक्षक देखते रह गए रास्ता


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,12 मई 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिले का सहायक आयुक्त कार्यालय एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार चर्चा किसी विकास योजना, छात्र हित या शिक्षा सुधार को लेकर नहीं,बल्कि गुपचुप पदस्थापना महाअभियान को लेकर हो रही है, जिले के आश्रम-छात्रावासों में प्रभारी अधीक्षकों की नियुक्ति ऐसी गोपनीयता के साथ की गई कि मानो कोई प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि किसी फिल्म की सीक्रेट एजेंसी ऑपरेशन चल रहा हो।
सूत्र बताते हैं कि आदेश इतने संवेदनशील थे कि उन्हें खुलेआम जारी करने की बजाय चुनिंदा लोगों तक फुसफुसाकर पहुंचाया गया, जिन शिक्षकों को प्रभारी अधीक्षक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उन्हें आदेश के साथ एक अनौपचारिक सलाह भी दी गई भाई साहब,इसे ज्यादा वायरल मत करिएगा,अब सवाल यह उठता है कि यदि सबकुछ नियमों के तहत हुआ, तो फिर यह डर किस बात का था? आखिर सरकारी आदेश को सोशल मीडिया से इतना भय क्यों?
शासन का नियम एक तरफ, व्यवस्था दूसरी तरफ-शासन का साफ निर्देश है कि आश्रम-छात्रावासों में निकटस्थ स्कूलों में पदस्थ शिक्षकों को प्रभारी बनाया जाए, ताकि छात्रावास संचालन में सुविधा बनी रहे, लेकिन कोरिया जिले में शायद नियम किताबों तक सीमित रह गए और व्यवस्था जमीन पर उतर आई,बताया जा रहा है कि कई ऐसे शिक्षकों को प्रभारी बना दिया गया जो संबंधित छात्रावास से काफी दूर पदस्थ हैं,वहीं कई स्थानीय शिक्षक, जो वर्षों से इस उम्मीद में बैठे थे कि कभी उन्हें भी मौका मिलेगा, पूरी प्रक्रिया की भनक तक नहीं लगने दी गई, उन्हें तब जानकारी मिली जब भाग्यशाली शिक्षक आदेश लेकर कार्यभार संभालने निकल पड़े, अब जिले में यह चर्चा आम है कि यहां दूरी किलोमीटर से नहीं, संपर्क और सहमति से मापी गई, जो जितना समझदार निकला, उसका रास्ता उतना ही आसान होता चला गया।
नवीन जिम्मेदारी उन्हें ही जो हैं पहले के पहुंचे फकीर
सूत्रों की माने तो नवीन जिम्मेदारी उन्हें ही दी गई है जो पहले के पहुंचे फकीर हैं,ऐसा इसलिए भी किया गया है क्योंकि उन्हें विभाग का हर झोलझाल मालूम है और वह विभाग के लिए विश्वासपात्र माने जाते हैं,वह गोपनीयता बरकरार रखने वाले माने जाते हैं,ऐसे लोग लेनदेन में भी तत्काल तैयार रहते हैं,ज्यादातर ऐसे ही लोगों की पदस्थापना की गई है।
कार्यालय के कई मामलों की यदि जांच हो जाए,खुल जाएंगे कई बड़े भ्रष्टाचार के राज
सूत्र सूत्रों का कहना है कि यदि कार्यालय के कई मामलों की जांच की जाए तो कई बड़े भ्रष्टाचार के राज खुल जाएंगे,कार्यालय में खरीदी मामले में बड़ा भ्रष्टाचार लगातार होता है,ऐसा बताया जाता है कि यह ऐसा भ्रष्टाचार है जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है।
कुछ अधीक्षक ही अब खोल रहे हैं पोल,जिन्हें मिली पुनः जिम्मेदारी वह हैं मौन
हाल ही में प्रभारी अधीक्षकों की नियुक्ति को लेकर बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार किया गया है ऐसी बातें सामने आ रही हैं,यह बातें वह अधीक्षक कर रहे हैं जो जुगाड़ लगा पाने में अपने लिए असफल रहे,अधीक्षकों के आरोपों की सच्चाई की तो पुष्टि हम नहीं करते लेकिन यदि यह सच है तो यह उन आदिवासी बच्चों के हित मामले में बड़ा खेल है जिनके लिए शासन ने छात्रावास सुविधा उपलब्ध कराई है,वैसे अधीक्षकों के ठाठ बाट को लेकर कई बार यह बातें सामने आती रही है कि यह ठाठ बाट छात्र सुविधाओं में से कटौती करके आई है,लेकिन इसकी पुष्टि और जांच नहीं हुई है।
आदेश कम,खुफिया दस्तावेज ज्यादा लगे
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे दिलचस्प बात रही आदेश वितरण की शैली, सामान्यतः सरकारी आदेश कार्यालय की वेबसाइट,सूचना पटल या विभागीय समूहों में सार्वजनिक होते हैं,लेकिन यहां मामला बिल्कुल अलग दिखाई दिया,आदेश ऐसे बांटे गए मानो कोई परीक्षा का पेपर लीक होने से बचाया जा रहा हो,सूत्रों की मानें तो कई शिक्षकों को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर आदेश थमाए गए,कुछ को मोबाइल पर जानकारी दी गई,तो कुछ को यह समझाया गया कि ज्यादा चर्चा ठीक नहीं, अब सवाल यह है कि यदि प्रक्रिया पारदर्शी थी तो इतनी गोपनीयता की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?
प्रभारी बनने का नया गणित
जिले में अब यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रभारी अधीक्षक बनने के लिए अनुभव,योग्यता या नजदीकी स्कूल में पदस्थापना से ज्यादा जरूरी व्यवहारिक समझ थी, सूत्र दावा कर रहे हैं कि कई पदस्थापनाओं के पीछे भारी लेनदेन हुआ है,कहा जा रहा है कि एक-एक प्रभार के लिए लाखों रुपये तक की वसूली हुई, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन जिस तरीके से पूरी प्रक्रिया को पर्दे के पीछे अंजाम दिया गया,उसने सवालों को और मजबूत कर दिया है,जिले में लोग अब मजाक में कहने लगे हैं कि छात्रावास प्रभारी बनने के लिए अब आवेदन नहीं, व्यवस्था चाहिए।
शिक्षा विभाग भी बना दर्शक?
सबसे हैरानी की बात यह है कि पूरी प्रक्रिया में शिक्षा विभाग को भी कथित रूप से विश्वास में नहीं लिया गया,जबकि शिक्षकों से जुड़ी पदस्थापनाओं में विभागीय समन्वय आवश्यक माना जाता है। लेकिन यहां ऐसा प्रतीत हुआ मानो पूरा मामला विशेष अधिकार क्षेत्र में संचालित किया गया हो, कई शिक्षक अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि यदि प्रक्रिया सार्वजनिक होती तो वे भी अपनी दावेदारी पेश कर सकते थे, कुछ शिक्षकों का कहना है कि उन्हें बाद में पता चला कि पदस्थापनाएं हो चुकी हैं और सूची लगभग फाइनल भी हो गई।
पुराने किस्से फिर ताजा
वैसे यह पहला मौका नहीं है जब सहायक आयुक्त कार्यालय सुर्खियों में आया हो, पिछले वर्ष छात्रावास अधीक्षकों के प्रमोशन के दौरान भी जमकर विवाद हुआ था,उस समय भी लेनदेन और मनमानी के आरोप लगे थे,मामला इतना बढ़ गया था कि दोबारा काउंसलिंग कराने तक की नौबत आ गई थी, अब उसी कहानी का नया अध्याय सामने आया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार प्रमोशन की जगह प्रभार ने ले ली है, जिले में लोग तंज कस रहे हैं कि यहां हर साल कोई न कोई शैक्षणिक सीजन आता है कभी प्रमोशन सीजन,कभी पदस्थापना सीजन।
वर्षों से वही चेहरे,वही व्यवस्था
जिले के छात्रावासों में वर्षों से कुछ चुनिंदा लोगों का ही दबदबा बना हुआ है,आरोप है कि पुराने प्रभारियों को ही अंदरखाने फिर से जिम्मेदारी दे दी गई,इससे उन शिक्षकों में नाराजगी है जो लंबे समय से मौका मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे,कई शिक्षकों का कहना है कि यदि चयन प्रक्रिया खुली और निष्पक्ष होती तो योग्य और इच्छुक लोग सामने आते, लेकिन यहां तो पूरी प्रक्रिया इतनी सीक्रेट रही कि अधिकांश लोग दर्शक बनकर रह गए।
खरीदी में भी उठते रहे सवाल
सहायक आयुक्त कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल सिर्फ पदस्थापना तक सीमित नहीं हैं, छात्रावासों के लिए खरीदी जाने वाली सामग्रियों को लेकर भी लंबे समय से शिकायतें उठती रही हैं,पंखे,गद्दे,कंबल,चूल्हा और बर्तन जैसी सामग्रियों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं,सूत्रों के अनुसार कई सामग्रियां ऐसी खरीदी जाती हैं जिन पर कंपनी का नाम तक नहीं होता, वार्षिक गारंटी का तो सवाल ही नहीं, हालत यह रहती है कि सामान सालभर के भीतर ही जवाब दे देता है, अब लोग व्यंग्य में कहते हैं कि सामान ऐसा खरीदा जाता है ताकि अगले साल फिर खरीदने का मौका बना रहे।
सवाल बहुत हैं,जवाब कम
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सबकुछ नियमों के तहत हुआ तो आदेश छिपाने की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर किन परिस्थितियों में कुछ शिक्षकों को प्राथमिकता मिली और बाकी को जानकारी तक नहीं दी गई? क्या शासन के निर्देशों का पालन हुआ या फिर व्यवस्था ने नियमों को पीछे छोड़ दिया? जिले में अब यह मांग उठने लगी है कि पूरी पदस्थापना प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए, यह स्पष्ट किया जाए कि किन मानकों के आधार पर प्रभारी अधीक्षकों का चयन हुआ और क्यों कई दूरस्थ शिक्षकों को जिम्मेदारी दी गई। साथ ही लेनदेन के आरोपों की निष्पक्ष जांच भी कराई जाए।
गोपनीय प्रशासन की नई मिसाल?
कोरिया जिले का सहायक आयुक्त कार्यालय अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है,सरकारी कार्यालयों में सामान्यतः पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद की जाती है, लेकिन यहां जो तस्वीर सामने आ रही है वह बिल्कुल अलग है,आदेशों की गोपनीयता, चयन प्रक्रिया पर सवाल, लेनदेन के आरोप और विभागीय समन्वय की कमी—इन सबने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है,अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन सवालों पर क्या रुख अपनाता है, क्योंकि फिलहाल जिले में यही चर्चा है कि कोरिया का यह गुप्त दरबार केवल पदस्थापना नहीं कर रहा,बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं को रहस्य और फुसफुसाहट के नए मॉडल में बदल रहा है।


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