किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि कानून अपराधी से अधिक शक्तिशाली दिखाई दे। लेकिन जब किसी बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास का सजायाफ्ता दोषी वर्षों तक दूसरे राज्य के एक शहर में कथित रूप से रह सके और उसकी तलाश में आई पुलिस के सामने भी फरार हो जाए,तो सवाल केवल एक आरोपी पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर खड़े होते हैं।
झारखंड के चर्चित वासेपुर दोहरे हत्याकांड के सजायाफ्ता दोषी साबिर आलम की अंबिकापुर में कथित मौजूदगी और उसके बाद हुए घटनाक्रम ने कई ऐसे प्रश्न छोड़ दिए हैं, जिनका उत्तर केवल पुलिस जांच ही दे सकती है। फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी,लेकिन इतना निश्चित है कि इस घटना ने अंतरराज्यीय पुलिस समन्वय,स्थानीय खुफिया तंत्र,फरार अपराधियों की निगरानी और कानून-व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि आरोपी भाग गया, बल्कि यह है कि यदि वह वास्तव में लंबे समय से अंबिकापुर में रह रहा था तो क्या उसकी पहचान,गतिविधियां और संपर्क किसी भी एजेंसी की नजर में नहीं आए? यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल स्थानीय पुलिस ही नहीं,बल्कि पूरे सूचना तंत्र की समीक्षा का विषय है।
घटना का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू झारखंड और सरगुजा पुलिस के बीच समन्वय का है। एक पक्ष का कहना है कि ऑपरेशन की गोपनीयता आवश्यक थी,जबकि दूसरा पक्ष पहले से सूचना न मिलने की बात कह रहा है। दोनों तर्क अपने-अपने स्थान पर उचित हो सकते हैं,लेकिन अंततः उद्देश्य एक ही होना चाहिए था—सजायाफ्ता अपराधी की गिरफ्तारी। यदि समन्वय की कमी से आरोपी फरार हुआ है तो भविष्य के लिए यह गंभीर सबक है।
घटनाक्रम के बाद स्थानीय स्तर पर अनेक प्रकार की चर्चाएं और आरोप भी सामने आए हैं। कुछ लोगों ने कथित संरक्षण,स्थानीय सहयोग,परिवहन नेटवर्क और पुलिस कार्रवाई में बाधा पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। किंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप और साक्ष्य दोनों अलग-अलग विषय हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी ने वास्तव में फरार अपराधी को शरण दी, गिरफ्तारी में बाधा पहुंचाई अथवा कानून से बचाने का प्रयास किया है, तो उसकी पुष्टि निष्पक्ष जांच और ठोस साक्ष्यों से ही होनी चाहिए।
यह घटना एक और बड़ी वास्तविकता की ओर संकेत करती है। आज अपराध की सीमाएं राज्यों की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई हैं। गंभीर अपराधों में वांछित आरोपी अक्सर दूसरे राज्यों में नई पहचान बनाकर रहने का प्रयास करते हैं। ऐसे में राज्यों के बीच सूचना का त्वरित आदान-प्रदान, साझा डाटाबेस, तकनीकी निगरानी और संयुक्त अभियान समय की आवश्यकता बन चुके हैं।
अंबिकापुर जैसे शांत शहर का नाम यदि किसी ऐसे प्रकरण में सामने आता है तो स्वाभाविक रूप से आम नागरिकों की चिंता बढ़ती है। लोगों की अपेक्षा केवल इतनी है कि क्षेत्र में रहने वाले बाहरी व्यक्तियों का नियमानुसार सत्यापन हो, संदिग्ध गतिविधियों पर सतर्क निगरानी रखी जाए और कानून के पालन में किसी प्रकार का पक्षपात दिखाई न दे।
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी जांच एजेंसियों की है। जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। यदि स्थानीय सहयोग, पुलिस कार्रवाई में बाधा या किसी प्रकार के संरक्षण के प्रमाण मिलते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि लगाए गए आरोप निराधार सिद्ध होते हैं तो यह भी उतनी ही स्पष्टता से सामने आना चाहिए।
अंततः यह मामला केवल एक फरार अपराधी की तलाश का नहीं है। यह कानून के प्रति समाज के विश्वास,पुलिस व्यवस्था की विश्वसनीयता और न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता की परीक्षा है। जनता को आरोप नहीं,सत्य चाहिए; अटकलें नहीं,प्रमाण चाहिए;और सबसे बढ़कर यह भरोसा चाहिए कि कानून का हाथ चाहे जितनी देर से पहुंचे,लेकिन किसी भी अपराधी तक अवश्य पहुंचे। यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।
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