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लेख @ पत्रकार बनने के लिए क्या सचमुच पत्रकारिता की डिग्री चाहिए!

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आपका मूल मैटर कई महत्वपूर्ण बिंदुओं के साथ था…जिनमें कुछ उदाहरण और आपकी व्यक्तिगत टिप्पणी भी थी…जो पिछले संपादन में संक्षिप्त हो गए…नीचे उसी विचार को संपादकीय पृष्ठ की साहित्यिक शैली में… बिना मूल भाव छोड़े…पूर्ण रूप से प्रस्तुत किया गया है…
पिछले कुछ समय से एक नया तर्क गढ़ा जा रहा है कि जिसने जर्नलिज्म की पढ़ाई नहीं की,वह पत्रकार नहीं है। सुनने में यह तर्क आकर्षक लग सकता है, लेकिन भारत के कानून,संविधान और पत्रकारिता के इतिहास—तीनों की कसौटी पर यह पूरी तरह टिक नहीं पाता।
सबसे पहले कानून की बात
भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की डिग्री को अनिवार्य बनाता हो। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ड्ड) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसी संवैधानिक अधिकार की नींव पर भारतीय पत्रकारिता का विकास हुआ है। न तो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के किसी नियम में और न ही किसी केंद्रीय कानून में यह लिखा है कि बिना पत्रकारिता की डिग्री वाला व्यक्ति पत्रकार नहीं कहलाएगा।
अब इतिहास की बात
यदि पत्रकारिता की डिग्री ही पत्रकार होने की अनिवार्य शर्त होती,तो भारतीय पत्रकारिता के अनेक महान नाम इस कसौटी पर पत्रकार ही नहीं माने जाते।
अरुण शौरी ने पत्रकारिता नहीं,बल्कि अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। वे विश्व बैंक में अर्थशास्त्री रहे और बाद में अपनी निर्भीक खोजी पत्रकारिता के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किया। प्रणय रॉय ने चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई की और अर्थशास्त्र में पीएचडी की। पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री उनके पास भी नहीं थी,फिर भी उन्होंने भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता को नई दिशा दी।
राजदीप सरदेसाई ने अर्थशास्त्र और कानून की पढ़ाई की। अरुण पुरी इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि से आए और देश का सबसे प्रभावशाली मीडिया समूह खड़ा किया। एम. जे. अकबर ने अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया। विनोद मेहता और शेखर गुप्ता के पास भी पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री नहीं थी, लेकिन उनकी लेखनी, संपादन, खोजी रिपोर्टिंग और विश्लेषण ने भारतीय पत्रकारिता को नई पहचान दी।
क्या कोई इन सभी की पत्रकारिता पर केवल इसलिए प्रश्नचिह्न लगा सकता है कि उनके पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं थी?
दरअसल,इन लोगों को उनकी डिग्री ने नहीं,बल्कि उनके साहस, तथ्यों की पड़ताल,निष्पक्षता,विश्वसनीयता और जनहित के प्रति समर्पण ने पत्रकार बनाया।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पत्रकारिता की पढ़ाई का कोई महत्व नहीं है। मैं स्वयं पत्रकारिता में स्नातक हूँ और मानता हूँ कि यह एक उत्कृष्ट शैक्षणिक विषय है। यह भाषा,शोध, तथ्य-जांच,मीडिया कानून,नैतिकता और पेशेवर कौशल को मजबूत बनाता है। लेकिन डिग्री पत्रकारिता की योग्यता हो सकती है, पत्रकार होने की अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं।
पत्रकार की पहचान उसके नाम के आगे लिखी डिग्री से नहीं होती…उसकी पहचान उसके सवालों से होती है। उसके
तथ्यों से होती है…उसकी विश्वसनीयता से होती है…और सबसे बढ़कर,सत्ता से सच बोलने के साहस से होती है…

आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता का मूल्यांकन प्रमाणपत्रों से नहीं,बल्कि उसकी विश्वसनीयता, जनपक्षधरता और नैतिक प्रतिबद्धता से किया जाए। लोकतंत्र में पत्रकारिता कोई लाइसेंस प्राप्त व्यवसाय नहीं,बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है। इसलिए पत्रकार का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र जनता का विश्वास होता है।
इसलिए अगली बार यदि कोई यह कहे कि जर्नलिज्म की डिग्री नहीं है, इसलिए वह पत्रकार नहीं है,तो उससे विनम्रता से केवल एक प्रश्न पूछिए… कृपया वह कानून,वह अधिनियम या वह नियम दिखा दीजिए,जिसमें यह लिखा हो। क्योंकि लोकतंत्र में पत्रकारिता का वास्तविक प्रमाण-पत्र कोई विश्व विद्यालय नहीं देता,उसे सत्य के प्रति प्रतिबद्धता, निर्भीकता,जनविश्वास और समाज के प्रति उत्तरदायित्व प्रदान करता है।
आशीष वर्मा,
,अंबिकापुर


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