



सुशासन तिहार में जनता ने सरकार को दिया हाई स्पिरिट वाला सुझाव- जब सुशासन शिविर बना ‘जनता का स्टैंड-अप कॉमेडी मंच’
- एसी पर सब्सिडी और शराब की बोतल पर सीएम की तस्वीर,ग्रामीणों की मांगों ने उड़ाए अफसरों के होश
- पोस्टर से निकलकर अब बोतल तक पहुँची राजनीति! सुशासन शिविर में गूंजी अनोखी मांग
- साहब! गर्मी में जनता पिघल रही है…ग्रामीणों ने मांगी एसी-कूलर पर सरकारी छूट
- जब जनता ने व्यंग्य में सुनाया सिस्टम का सच…लटमा शिविर बना चर्चा का केंद्र
- सरकारी दफ्तर में पसीना नहीं,ठंडी हवा चाहिए,ग्रामीणों ने प्रशासन को दिया ‘कूल’ सुझाव
-रवि सिंह-
कोरिया,29 मई 2026 (घटती-घटना)। लटमा में लगा सुशासन तिहार शिविर इस बार सरकारी योजनाओं से ज्यादा जनता की कल्पनाशक्ति और व्यंग्यात्मक मांगों के कारण चर्चा में आ गया, आमतौर पर ऐसे शिविरों में राशन कार्ड,सड़क, बिजली, पानी और पेंशन की शिकायतें सुनाई देती हैं,लेकिन इस बार ग्रामीणों ने ऐसा रचनात्मक लोकतंत्र दिखाया कि अधिकारी भी फाइल से ज्यादा चेहरों को पढ़ते नजर आए,यह शिविर सरकारी प्रशासन कम और जनता का खुला मंच ज्यादा दिखाई दिया, जहां ग्रामीणों ने व्यवस्था पर अपनी नाराजगी भी जताई और हास्य के जरिए सिस्टम को आईना भी दिखा दिया।
जब हर योजना पर फोटो है,तो शराब की बोतल क्यों पीछे?
शिविर की सबसे चर्चित मांग वह रही जिसने पूरे माहौल को हंसी और व्यंग्य से भर दिया,एक आवेदन में मांग की गई कि शराब की बोतलों पर मुख्यमंत्री और आबकारी मंत्री की तस्वीर छापी जाए, अब यह मांग सुनकर कुछ अधिकारी मुस्कुराए,कुछ ने सिर झुका लिया और कुछ ने शायद मन ही मन सोचा जनता अब बहुत समझदार हो गई है,ग्रामीणों का तर्क भी कमाल का था,उनका कहना था कि जब सरकार की हर योजना,पोस्टर, दीवार,राशन दुकान,पाइपलाइन और शौचालय तक पर नेताओं की तस्वीर लग सकती है, तो फिर शराब विभाग की पहचान बोतल पर क्यों नहीं होनी चाहिए? एक ग्रामीण ने मजाकिया अंदाज में कहा सरकार अगर हर चीज का श्रेय लेती है, तो फिर शाम की खुशी में भी जनता को पता होना चाहिए कि आशीर्वाद किसका है,यह मांग सिर्फ हास्य नहीं थी,बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर तीखा व्यंग्य भी थी जिसमें प्रचार कभी-कभी काम से बड़ा दिखाई देने लगता है।
गरीब पसीने में पिघल रहा,अमीर एसी में खिल रहा…
गर्मी ने इस बार लोगों का धैर्य भी पिघला दिया,इसलिए ग्रामीणों ने सीधे सरकार से कूलिंग पैकेज मांग लिया। आवेदन में कहा गया कि बीपीएल परिवारों को एसी और कूलर खरीदने पर भारी सब्सिडी दी जाए,ग्रामीणों का कहना था कि सरकार गैस सिलेंडर,राशन और मकान में सहायता देती है,तो फिर इस जानलेवा गर्मी से राहत देने के लिए एसी-कूलर पर सहायता क्यों नहीं? व्यंग्यात्मक अंदाज में एक बुजुर्ग ने कहा गरीब आदमी दिन में मजदूरी करे,रात में गर्मी से तड़पे और फिर सुबह वोट भी दे? थोड़ा ठंडा रहने का अधिकार तो मिलना चाहिए, इस मांग ने यह भी दिखाया कि अब ग्रामीण सिर्फ बुनियादी सुविधाओं तक सीमित नहीं रहना चाहते, वे भी आराम की जिंदगी को अपना अधिकार मानने लगे हैं।
सरकारी दफ्तरों के लिए भी ‘ठंडी-ठंडी, कूल-कूल’ योजना
ग्रामीणों ने केवल अपने घरों के लिए एसी नहीं मांगा,बल्कि सरकारी दफ्तरों के लिए भी कूलर और एसी की मांग रख दी। उनका तर्क बेहद व्यावहारिक था,लोगों ने कहा कि सरकारी दफ्तरों में घंटों लाइन में खड़े रहना पड़ता है,गर्मी में बुजुर्ग,महिलाएं और बच्चे बेहाल हो जाते हैं। अगर दफ्तरों में ठंडी हवा चलेगी तो जनता भी खुश रहेगी और बाबू लोग भी कम गुस्से में रहेंगे,एक युवक ने चुटकी लेते हुए कहा जब साहब का मूड ठंडा रहेगा, तभी फाइल जल्दी चलेगी,यह बयान सुनकर वहां मौजूद कुछ कर्मचारी मुस्कुरा दिए,क्योंकि उन्हें भी शायद इस बात में सच्चाई नजर आई।
बैंक के लिए भी गुहार,पैसा अपना,चक्कर भी अपना?
मजेदार मांगों के बीच कुछ बेहद गंभीर मुद्दे भी उठे। ग्रामीणों ने सोनहत क्षेत्र में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की शाखा खोलने की मांग की,लोगों का कहना था कि पैसे जमा करने और निकालने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता है,कई बार पूरा दिन सिर्फ बैंक के चक्कर में निकल जाता है,एक किसान ने व्यंग्य करते हुए कहा सरकार कहती है डिजिटल बनो,लेकिन नेटवर्क गायब रहता है और बैंक कई किलोमीटर दूर।
साहब गांव में रहेंगे तो खेती भी सुधरेगी…
ग्रामीणों ने कृषि विस्तार अधिकारी के लिए शासकीय आवास बनाने की मांग भी रखी, उनका कहना था कि अधिकारी गांव में ही रहेंगे तो किसानों को समय पर सलाह और योजनाओं की जानकारी मिल सकेगी, किसानों की सोच साफ थी अगर अधिकारी शहर में रहेंगे और किसान खेत में, तो खेती का विकास फाइल में ही होगा।
स्पीड ब्रेकर की मांग,विकास की रफ्तार ठीक है,मौत की नहीं…
ग्रामीणों ने सड़क सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई,स्कूलों,बाजार और दुर्घटना संभावित स्थानों पर स्पीड ब्रेकर बनाने की मांग की गई, लोगों का कहना था कि सड़कें चाहे टूटी हों,लेकिन गाडि़यों की रफ्तार नहीं टूटती। ऐसे में हादसों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
सुशासन का असली आईना
लटमा का यह सुशासन शिविर एक बात साफ कर गया अब ग्रामीण सिर्फ चुपचाप आवेदन देने वाले लोग नहीं रहे, वे व्यवस्था को समझते हैं,राजनीति को पहचानते हैं और व्यंग्य के जरिए अपनी बात रखने का हुनर भी सीख चुके हैं,इन मांगों में हास्य जरूर था,लेकिन उनके पीछे छिपी नाराजगी और व्यवस्था पर कटाक्ष भी उतना ही गहरा था,कहीं यह प्रचार की राजनीति पर सवाल था,कहीं बढ़ती गर्मी और असमान जीवनशैली पर चिंता,तो कहीं सरकारी दफ्तरों की सुस्त व्यवस्था पर जनता की चुटकी,अब देखना यह है कि सरकार इन मांगों को मजाक समझकर फाइल में दबा देती है या फिर इन्हें जनता के बदलते सोच और बढ़ती जागरूकता का संकेत मानती है, फिलहाल लटमा का यह शिविर बता गया कि गांव की जनता अब सिर्फ समस्याएं नहीं गिनातीज्वह व्यंग्य में भी पूरी राजनीति समझा देती है।
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