

- नहर में बहते पानी पर विभाग की सफाई से बढ़ा विवाद
- ‘तकनीकी प्रक्रिया’ या पानी की बर्बादी? विभाग की सफाई के बाद भी सवाल बरकरार
- जीर्णोद्धार कार्य के बीच नहर में जल प्रवाह पर विभाग ने दी सफाई…
- एलबीसी नहर में बहते पानी पर विभाग का बयान,कहा…सामान्य डिस्चार्ज
- किसानों की शिकायतों के बाद विभाग का जवाब,पानी बहाव को बताया तकनीकी जरूरत
- भांडी-जनकपुर नहर मामला में खबर के बाद विभाग ने जारी किया विस्तृत स्पष्टीकरण
- ‘फ्लशिंग और क्यूरिंग का हिस्सा है पानी’ विभाग ने खारिज किए वेस्टेज के आरोप
- नहर में पानी बहने पर मचा था हंगामा,अब विभाग ने दी सफाई
- 5 करोड़ के जीर्णोद्धार के बीच पानी
- बहाव पर विभाग का पक्ष सामने आया
- आधी-अधूरी जानकारी का आरोप,विभाग ने
- बताया—नहर का जल प्रवाह तकनीकी प्रक्रिया
- नहर में बहते पानी पर विभाग का स्पष्टीकरण,
- पुराने समाचार के बाद जारी हुआ स्पष्टीकरण
-राजन पाण्डेय-
कोरिया,28 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। भांडी-जनकपुर क्षेत्र की नहर में बहते पानी को लेकर प्रकाशित खबर के बाद जल संसाधन विभाग द्वारा जारी स्पष्टीकरण ने विवाद को शांत करने के बजाय और अधिक सवाल खड़े कर दिए हैं,विभाग ने इसे ‘तकनीकी प्रक्रिया’ और ‘सामान्य डिस्चार्ज’ बताया है, लेकिन जमीनी हकीकत, स्थानीय किसानों की शिकायतें और दृश्य साक्ष्य इस दावे पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं। भांडी-जनकपुर क्षेत्र की नहर में पानी बहने को लेकर हाल ही में प्रकाशित समाचार के बाद जल संसाधन विभाग, बैकुंठपुर द्वारा विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया गया है,पूर्व में प्रकाशित खबर में नहर में बहते पानी को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष और सवाल सामने आए थे,किसानों और ग्रामीणों ने इसे पानी की बर्बादी बताते हुए विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाए थे,अब विभाग ने पूरे मामले को स्पष्ट करते हुए इसे तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और कहा है कि नहर में बहता पानी अनावश्यक वेस्टेज नहीं, बल्कि निर्धारित इंजीनियरिंग व्यवस्था के तहत किया जा रहा सामान्य डिस्चार्ज है, नहर में बहते पानी को लेकर उठे विवाद पर जल संसाधन विभाग ने स्पष्टीकरण देते हुए इसे तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा बताया है, विभाग का दावा है कि यह व्यवस्था अस्थायी है और जीर्णोद्धार कार्य पूर्ण होने के बाद जल आपूर्ति में सुधार होगा, फिलहाल यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, तकनीकी प्रक्रियाओं की समझ और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन का उदाहरण बनकर सामने आया है, आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि विभाग के दावे कितने प्रभावी साबित होते हैं और क्षेत्र के किसानों को इसका कितना लाभ मिलता है।
क्यों उठा था मामला…
भांडी-जनकपुर क्षेत्र में नहर के माध्यम से सिंचाई व्यवस्था संचालित होती है,रबी फसल के दौरान कई किसानों ने पानी नहीं मिलने की शिकायत की थी, इसी बीच नहरों में लगातार पानी बहने के दृश्य सामने आए, जिससे यह सवाल उठा कि जब खेतों तक पानी नहीं पहुंच रहा, तो नहरों में पानी क्यों बहाया जा रहा है, पूर्व में प्रकाशित समाचार में इस स्थिति को ‘इंजीनियरिंग फेल्योर’ बताते हुए विभागीय लापरवाही की ओर संकेत किया गया था, इसके बाद यह मामला चर्चा में आया और विभाग पर स्पष्ट जानकारी देने का दबाव बना।
जमीनी हकीकत ये है की किसान अब भी परेशान
स्थानीय किसानों का कहना है कि रबी फसल के समय पानी नहीं मिला, नहर के पास पानी बहता दिखा,लेकिन खेत सूखे रहे,सूचना पहले दी गई, लेकिन विकल्प नहीं दिए गए,यह स्थिति विभाग के ‘60′ आपूर्ति सामान्य’ वाले दावे को कमजोर करती है, बजट और काम की प्रगति पर भी सवाल करीब 5 करोड़ रुपये की परियोजना में अब तक केवल 88 लाख खर्च होना यह संकेत देता है कि कार्य धीमी गति से चल रहा है, प्राथमिकताओं का सही निर्धारण नहीं हुआ, मॉनिटरिंग की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न है?
स्पष्टीकरण से ज्यादा ‘बचाव’ क्यों लग रहा है बयान?
विभाग का पूरा बयान तकनीकी शब्दों— ‘क्यूरिंग ‘,‘फ्लशिंग ‘, ‘डिस्चार्ज ‘—से भरा हुआ है, लेकिन आम जनता के मूल सवालों का सीधा जवाब नहीं देता पानी बह क्यों रहा था? किसानों को क्यों नहीं मिला? खराबी को समय पर ठीक क्यों नहीं किया गया?
जवाब से ज्यादा जवाबदेही की जरूरत
यह मामला केवल एक नहर या पानी के बहाव का नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और संसाधनों के प्रबंधन का सवाल है, यदि पानी वास्तव में ‘तकनीकी प्रक्रिया’ का हिस्सा था, तो इसकी स्पष्ट जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई? और यदि यह लापरवाही थी, तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही? फिलहाल, विभाग का स्पष्टीकरण विवाद को शांत करने के बजाय यह संकेत दे रहा है कि कहीं न कहीं ‘इंजीनियरिंग फेल्योर’ को शब्दों की आड़ में छिपाने की कोशिश हो रही है, अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में पारदर्शिता लाता है या यह भी एक फाइल में दबकर रह जाता है।
विभाग का पक्ष तकनीकी कारणों से हो रहा जल प्रवाह
जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ने स्पष्ट किया है कि एलबीसी (लेफ्ट बैंक कैनाल) मुख्य नहर का मेन गेट खराब हो गया है, जिसके कारण पानी को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, इस तकनीकी समस्या के चलते पानी का एक निश्चित बहाव बनाए रखना आवश्यक हो गया है, इसके अलावा नहर के आरडी 6,945 मीटर से 14,700 मीटर तक जीर्णोद्धार कार्य जनवरी 2026 से जारी है, इस कार्य के अंतर्गत नहर की संरचना को मजबूत करने, रिसाव रोकने और जल वितरण प्रणाली को बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, विभाग ने बताया कि मरम्मत कार्य के दौरान पानी के प्रवाह को संतुलित रखने के लिए अस्थायी एस्केप (निकासी मार्ग) का निर्माण किया गया है,यह व्यवस्था पूरी तरह अस्थायी है और कार्य पूर्ण होने के बाद इसे बंद कर दिया जाएगा,अधिकारी के अनुसार यदि नहर में पानी का बहाव पूरी तरह रोक दिया जाए,तो इससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और नहर की संरचना को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है,विभाग ने आगे कहा कि नहर में बहता पानी कई तकनीकी प्रक्रियाओं का हिस्सा है, जिनमें प्रमुख रूप से फ्लशिंग (नहर की सफाई),सिल्ट नियंत्रण (गाद को हटाना),क्यूरिंग (निर्माण कार्य को मजबूत बनाना) शामिल हैं,इन प्रक्रियाओं के दौरान पानी का बहाव आवश्यक होता है,ताकि नहर की संरचना टिकाऊ बन सके और भविष्य में जल आपूर्ति बेहतर तरीके से की जा सके।
टेल-एंड क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई गई योजना
विभाग के अनुसार यह पूरी व्यवस्था केवल वर्तमान स्थिति के लिए नहीं,बल्कि भविष्य की जल आपूर्ति को ध्यान में रखकर बनाई गई है, नहर के टेल-एंड (अंतिम छोर) क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने के लिए फ्लो मैनेजमेंट जरूरी है,यदि इस दौरान पानी का प्रवाह पूरी तरह रोक दिया जाता,तो आगे चलकर जल वितरण असंतुलित हो सकता था,इसलिए तकनीकी मानकों के अनुसार पानी का डिस्चार्ज बनाए रखा गया है।
जल आपूर्ति की वर्तमान स्थिति
विभाग ने दावा किया है कि वर्तमान में कमांड एरिया के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से में जल आपूर्ति सामान्य रूप से हो रही है,हालांकि शेष 40 प्रतिशत क्षेत्र में जीर्णोद्धार कार्य के कारण पानी की आपूर्ति प्रभावित है,विभाग के अनुसार इन क्षेत्रों में कार्य पूर्ण होने के बाद जल आपूर्ति नियमित कर दी जाएगी,साथ ही संबंधित पंचायतों को पहले ही रबी सीजन के दौरान पानी उपलब्ध नहीं होने की सूचना दी जा चुकी थी।
किसानों की स्थिति और विभाग का रुख
किसानों की शिकायतों को लेकर विभाग ने कहा है कि जल वितरण की योजना पहले से तय होती है और कार्य के दौरान कुछ असुविधाएं स्वाभाविक हैं,विभाग का कहना है कि जिन क्षेत्रों में पानी नहीं दिया जा सका,वहां पूर्व सूचना दी गई थी, ताकि किसान वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें,हालांकि स्थानीय स्तर पर कई किसान इस दावे से सहमत नहीं हैं और उनका कहना है कि उन्हें समय पर पर्याप्त जानकारी नहीं मिली।
परियोजना की लागत और व्यय
नहर के जीर्णोद्धार कार्य के लिए कुल 496.99 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई है,विभाग के अनुसार अब तक इस परियोजना में लगभग 88 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं,शेष कार्य चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है और इसके लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है,विभाग ने कहा है कि कार्य की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।मॉनिटरिंग और प्रशासनिक समन्वय
विभाग ने बताया कि इस परियोजना की निगरानी जिला प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर की जा रही है,नियमित रूप से टैंक गेज रिपोर्ट और लॉगबुक के आधार पर नहर के जल स्तर और प्रवाह की समीक्षा की जा रही है,इसके अलावा उच्च अधिकारियों द्वारा समय-समय पर निरीक्षण भी किया जा रहा है,ताकि कार्य निर्धारित समय सीमा में पूरा हो सके।
अस्थायी व्यवस्थाएं होंगी समाप्त
विभाग ने स्पष्ट किया है कि जैसे ही जीर्णोद्धार कार्य पूरा होगा,सभी अस्थायी एस्केप और कटाव को बंद कर दिया जाएगा, इसके बाद नहर का संचालन पूरी तरह नियंत्रित तरीके से किया जाएगा और पानी की अनावश्यक निकासी नहीं होगी,विभाग का कहना है कि वर्तमान में जो व्यवस्था दिखाई दे रही है,वह केवल निर्माण कार्य के दौरान की अस्थायी स्थिति है।
पूर्व प्रकाशित समाचार पर प्रतिक्रिया
विभाग ने यह भी कहा है कि कुछ समाचारों में अधूरी जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए थे,जिससे भ्रम की स्थिति बनी, विभाग के अनुसार वास्तविक स्थिति को समझे बिना पानी के बहाव को बर्बादी के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है,विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह जल प्रवाह पूरी तरह तकनीकी प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है और इसका उद्देश्य भविष्य में बेहतर जल आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
जमीनी स्तर पर स्थिति पर नजर
हालांकि विभाग ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति पर नजर बनाए रखने की जरूरत बनी हुई है,किसानों और स्थानीय लोगों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कार्य समय पर पूरा होता है या नहीं और जल आपूर्ति में वास्तविक सुधार आता है या नहीं।
लेकिन सवाल यहीं से शुरू होते हैं…
विभाग के इस स्पष्टीकरण को लेकर कई बुनियादी प्रश्न उठ रहे हैं…
‘मेन गेट खराब’ तो जिम्मेदारी किसकी?
यदि मुख्य गेट पहले से खराब था, तो उसकी मरम्मत प्राथमिकता क्यों नहीं बनी? क्या इतनी बड़ी परियोजना में यह लापरवाही नहीं मानी जाएगी? तकनीकी प्रक्रिया या पानी की बर्बादी? जिसे विभाग ‘फ्लशिंग’ और ‘डिस्चार्ज’ बता रहा है, वही पानी खेतों तक नहीं पहुंच पा रहा, किसानों का कहना है कि उन्हें सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला, जबकि नहरों में पानी बहता दिख रहा है।
अस्थायी एस्केप या स्थायी लापरवाही?
एस्केप निर्माण को अस्थायी बताया गया है, लेकिन सवाल है की क्या इस व्यवस्था की पहले से कोई योजना थी या यह खराब प्रबंधन का तात्कालिक समाधान है?
आधी-अधूरी जानकारी किसकी?
विभाग ने मीडिया रिपोर्ट्स को ‘तथ्य से परे’ बताया,लेकिन क्या विभाग ने पहले कभी पारदर्शी तरीके से यह जानकारी सार्वजनिक की थी?
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