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बैकुंठपुर/कोरिया@ कोरिया सीईओ का रिकॉर्ड कार्यकाल,लेकिन सुर्खियों में उपन्यास

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  • तीन साल पूरे…विकास नहीं-‘यक्षिणी’ बनी चर्चा का केंद्र…
  • कार्यकाल की किताब नहीं,उपन्यास का विमोचन—सीईओ पर सवाल
  • रिकॉर्ड कार्यकाल के बीच ‘यक्षिणी’ लॉन्च,विकास पर बहस तेज
  • सीईओ का साहित्यिक अंदाज़,प्रशासनिक काम पर उठे सवाल
  • तीन साल की कहानी अनकही, ‘यक्षिणी’ का कवर हुआ जारी
  • उपन्यास विमोचन ने बढ़ाई चर्चा,कार्यकाल की उपलब्धियां गायब
  • 3 साल का कार्यकाल पूरा, ‘यक्षिणी’ का विमोचन—
  • उपलब्धियों से ज्यादा चर्चा में लेखक सीईओ की
  • कोरिया जिला पंचायत सीईओ आशुतोष चतुर्वेदी की साहित्यिक
  • पहचान बनी सुर्खी, प्रशासनिक कार्यकाल पर उठे सवाल


-राजन पाण्डेय-
बैकुंठपुर/कोरिया,26 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
जिला कोरिया में इन दिनों प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच एक नाम चर्चा के केंद्र में है जिला पंचायत सीईओ आशुतोष चतुर्वेदी, वजह सिर्फ उनका तीन साल का कार्यकाल पूरा होना नहीं है, बल्कि इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके द्वारा अपने उपन्यास ‘यक्षिणी’ के कवर पेज का विमोचन करना है, जहां एक ओर इस उपलब्धि को उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा और साहित्यिक रुचि के रूप में सराहा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि क्या इस मौके पर उनके तीन साल के प्रशासनिक कार्यकाल की उपलब्धियों को भी सामने आना चाहिए था?
तीन साल का कार्यकालः एक रिकॉर्ड,एक चर्चा
25 अप्रैल 2023 को कोरिया जिले में जिला पंचायत सीईओ के रूप में पदस्थापना के बाद आशुतोष चतुर्वेदी ने लगातार तीन वर्षों तक इस पद पर कार्य किया, यह अपने आप में एक उल्लेखनीय तथ्य है, क्योंकि जिले के इतिहास में इससे पहले कोई भी सीईओ इतना लंबा कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया था, इससे पहले लंबे कार्यकाल को लेकर तुलिका प्रजापति का नाम चर्चा में रहा, लेकिन अब यह उपलब्धि आशुतोष चतुर्वेदी के नाम दर्ज हो गई है, हालांकि, प्रशासनिक सेवा में केवल कार्यकाल की अवधि ही नहीं, बल्कि उस दौरान किए गए कार्यों और उनके प्रभाव को भी समान महत्व दिया जाता है, यही कारण है कि अब यह चर्चा उठ रही है कि इस लंबे कार्यकाल के दौरान जिले को क्या मिला?
‘यक्षिणी’ का विमोचनः साहित्यिक पहचान का प्रदर्शन
23 अप्रैल 2026 को जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में एक निजी संस्थान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आशुतोष चतुर्वेदी ने अपने उपन्यास ‘यक्षिणी’ के कवर पेज का विमोचन किया, इस कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और साहित्यकारों की उपस्थिति रही, सोशल मीडिया पर भी उन्होंने अपने इस साहित्यिक कार्य को साझा किया, जिससे यह कार्यक्रम चर्चा का विषय बन गया, यह तथ्य निर्विवाद है कि आशुतोष चतुर्वेदी एक अच्छे लेखक हैं और उन्हें लेखन का शौक है, ‘यक्षिणी’ उनका एक रचनात्मक प्रयास है, जिसे साहित्य जगत में सकारात्मक नजरिए से देखा जा रहा है।
कार्यकाल की उपलब्धियां कहां हैं?
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा सवाल उभर कर सामने आया है क्या तीन साल के कार्यकाल के बाद प्रशासनिक उपलब्धियों का कोई दस्तावेज या रिपोर्ट भी सामने आनी चाहिए थी? स्थानीय लोगों और कुछ जानकारों का मानना है कि तीन साल का कार्यकाल किसी भी अधिकारी के लिए एक महत्वपूर्ण समय होता है, इस दौरान किए गए विकास कार्यों, योजनाओं और सुधारों का लेखा-जोखा सार्वजनिक होना चाहिए, यदि इस मौके पर ‘उपलब्धि रिपोर्ट’ या ‘विकास पुस्तिका’ जारी होती, तो उसका प्रभाव ज्यादा व्यापक होता।
जमीनी हकीकतः विकास बनाम अपेक्षाएं
कोरिया जिला मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्र है, जहां पंचायत स्तर पर विकास की जिम्मेदारी काफी हद तक जिला पंचायत प्रशासन पर निर्भर करती है, तीन साल के इस कार्यकाल में कुछ योजनाएं जरूर लागू हुईं, कुछ क्षेत्रों में सुधार भी देखने को मिला, लेकिन अपेक्षित स्तर पर व्यापक बदलाव नहीं दिखा कई पंचायतों में अब भी बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं, सड़क, पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार के अवसर, पंचायतों की कार्यप्रणाली, इन मुद्दों पर लोगों की अपेक्षाएं पूरी तरह पूरी नहीं हो पाईं—ऐसा स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय रहा।
‘आरामदायक कार्यकाल’ की चर्चा
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि आशुतोष चतुर्वेदी का यह कार्यकाल अपेक्षाकृत ‘स्थिर और आरामदायक’ रहा, प्रशासनिक हलकों में यह धारणा भी प्रचलित है कि कोरिया जिले में लंबे समय तक टिके रहना आसान नहीं होता, क्योंकि इसे एक चुनौतीपूर्ण या ‘दंडात्मक पोस्टिंग’ के रूप में भी देखा जाता है, ऐसे में तीन साल तक लगातार पदस्थ रहना कई सवाल खड़े करता है क्या यह उनकी कार्यशैली का परिणाम था? या फिर इसके पीछे अन्य प्रशासनिक कारण थे?
गायब सूची का रहस्य
सूत्रों के अनुसार,जिला पंचायत सीईओ के कार्यकाल से जुड़ी सुचना पटल कार्यालय से गायब होने की चर्चा भी सामने आई है,यह सुचना पटल सूची क्यों गायब हुई? कहां गई? क्या इसमें कोई महत्वपूर्ण जानकारी थी? ये सभी सवाल फिलहाल अनुत्तरित हैं और आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि भी नहीं हुई है,लेकिन यह मुद्दा चर्चा में बना हुआ है।
इनसाइड और आउटसाइड इमेज
आशुतोष चतुर्वेदी की छवि दो अलग-अलग पहलुओं में देखी जा रही हैः

  1. एक लेखक के रूप मेंः
    संवेदनशील और रचनात्मक व्यक्तित्व
    साहित्य में रुचि और योगदान
    ‘यक्षिणी’ जैसे उपन्यास का सृजन
  2. एक प्रशासक के रूप मेंः
    लंबा कार्यकाल
    मिश्रित प्रतिक्रिया
    उपलब्धियों पर सवाल
    यही द्वंद्व इस पूरे मामले को और रोचक बनाता है।
    व्यक्तिगत जीवन की झलक
    अपने कार्यकाल के दौरान आशुतोष चतुर्वेदी ने अपने निजी जीवन में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया, वे विवाह बंधन में बंधे और उनका रिश्ता कोरिया जिले के ही एक परिवार से जुड़ा, इससे उनका स्थानीय जुड़ाव और भी मजबूत हुआ, जिसे कई लोग सकारात्मक रूप में देखते हैं।
    ‘यक्षिणी’ को लेकर जिज्ञासा
    उपन्यास ‘यक्षिणी’ को लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई है, क्या यह पौराणिक कथा पर आधारित है? या यह सामाजिक-यथार्थ को दर्शाने वाला उपन्यास है? क्या इसमें प्रशासनिक अनुभवों की झलक मिलेगी? फिलहाल केवल कवर पेज लॉन्च हुआ है, पूरी पुस्तक के विमोचन का इंतजार किया जा रहा है।
    क्या छूट गया इस मौके पर?

    इस पूरे घटनाक्रम में जो बात सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह यह है कि यदि इसी मंच से तीन साल के कार्यकाल की उपलब्धियों का भी प्रस्तुतीकरण होता, तो यह कार्यक्रम और प्रभावशाली हो सकता था, संभावनाएं थीं किः एक ‘डॉक्यूमेंट्री रिपोर्ट’ जारी होती, पंचायतों के विकास कार्यों का विवरण सामने आता, भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा रखी जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह बहस और तेज हो गई।
    जिले के लिए संदेश क्या?
    यह पूरा मामला केवल एक व्यक्ति या एक उपन्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े करता है, क्या एक अधिकारी को अपने कार्यकाल के अंत में अपनी उपलब्धियों को सामने रखना चाहिए? या अपनी व्यक्तिगत रुचियों को प्राथमिकता देना गलत नहीं है? यह बहस अब जिले में खुलकर हो रही है।
    उपलब्धि बनाम प्राथमिकता-
    आशुतोष चतुर्वेदी का ‘यक्षिणी’ उपन्यास उनकी रचनात्मक क्षमता का प्रमाण है और इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन जिस समय यह विमोचन हुआ,उसी समय उनके तीन साल के कार्यकाल की समीक्षा भी स्वाभाविक रूप से चर्चा में आ गई, एक ओर लेखक की सफलता है, तो दूसरी ओर प्रशासक की जवाबदेही, अब देखना यह होगा कि क्या उनके कार्यकाल की उपलब्धियों को भी आधिकारिक रूप से प्रस्तुत किया जाएगा? क्या ‘यक्षिणी’ के साथ-साथ उनके प्रशासनिक अनुभवों की कहानी भी सामने आएगी? फिलहाल, कोरिया जिले में यह मुद्दा चर्चा, बहस और विश्लेषण का केंद्र बना हुआ है—जहां एक उपन्यास ने प्रशासनिक कार्यकाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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