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कोरिया@ पशु टीकाकरण अभियान के नाम पर करोड़ों का खेल?

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कोरिया जिले में वर्षों से कागजों में दौड़ रहा टीकाकरण अभियान, फर्जीवाड़े के आरोपों ने खड़े किए गंभीर सवाल
किसान के पास 2 पशु, रिकॉर्ड में 20!” आखिर किसके संरक्षण में चल रहा यह खेल?
-रवि सिंह-
कोरिया,11 जून 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिले के पशुधन विकास विभाग में संचालित पशु टीकाकरण अभियान को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं,आरोप है कि पिछले कई वर्षों से पशु टीकाकरण,पशुधन संरक्षण और विभागीय योजनाओं के नाम पर कागजी उपलब्धियों का ऐसा ताना-बाना बुना जा रहा है,जिसमें आंकड़े तो चमक रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत कहीं दिखाई नहीं दे रही, ग्रामीण क्षेत्रों से मिल रही शिकायतों और सूत्रों के दावों ने पूरे अभियान की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
आरोपों के अनुसार जिले के विभिन्न विकासखंडों,विशेषकर पोड़ी-बचरा सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं का वास्तविक टीकाकरण किए बिना ही ऑनलाइन पोर्टल में शत-प्रतिशत लक्ष्य पूरा दर्शाया जा रहा है, विभागीय रिकॉर्ड में सफलता की कहानी लिखी जा रही है,जबकि कई पशुपालक दावा कर रहे हैं कि उनके पशुओं तक टीकाकरण दल कभी पहुंचा ही नहीं।
जवाब मांग रहे किसान…
अब जिले के किसान और पशुपालक कुछ सीधे सवालों के जवाब चाहते हैं क्या कोरिया जिले में वर्षों से कागजों में ही पशु टीकाकरण अभियान चल रहा है? क्या वास्तविक पशु संख्या से अधिक आंकड़े दर्ज किए गए हैं? क्या जियो टैगिंग और ओटीपी सत्यापन के बिना ही रिकॉर्ड पूर्ण कर दिए गए? क्या विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से यह कथित खेल चल रहा है? यदि जांच होती है तो क्या बड़े खुलासे सामने आएंगे?
कागजों में दौड़ते पशु,गांवों में नहीं पहुंची टीमें…
पशु टीकाकरण अभियान का उद्देश्य पशुओं को संक्रामक बीमारियों से बचाना है, इसके लिए विभागीय टीमों को घर-घर जाकर पशुओं का टीकाकरण करना होता है, प्रत्येक पशु का जियो टैगिंग, पशुपालक का मोबाइल नंबर, ओटीपी सत्यापन और ऑनलाइन एंट्री जैसी प्रक्रियाएं निर्धारित की गई हैं, लेकिन आरोप है कि कई स्थानों पर इन प्रक्रियाओं का पालन किए बिना ही रिकॉर्ड तैयार कर दिए गए, ग्रामीणों का कहना है कि न तो किसी ने ओटीपी मांगा, न जियो टैगिंग हुई और न ही कई पशुओं का टीकाकरण किया गया, फिर भी रिकॉर्ड में अभियान पूरा दर्शा दिया गया।
दो पशु वाले किसान के नाम पर बीस पशुओं का टीकाकरण?
सबसे चौंकाने वाला आरोप पशुओं की संख्या को लेकर सामने आया है, ग्रामीणों का दावा है कि जिन किसानों के पास दो या तीन पशु हैं, उनके नाम पर रिकॉर्ड में 15 से 20 पशुओं का टीकाकरण दर्शाया गया है, यदि यह आरोप सही हैं तो सवाल उठता है कि आखिर यह अतिरिक्त पशु आए कहां से? क्या केवल लक्ष्य पूरा दिखाने के लिए आंकड़ों का खेल खेला गया? क्या शासन को वास्तविक स्थिति से अलग जानकारी भेजी गई? यही प्रश्न अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बन चुके हैं।
मिलीभगत की आशंका ने बढ़ाई गंभीरता
सूत्रों का दावा है कि यह केवल लापरवाही का मामला नहीं बल्कि एक सुनियोजित तंत्र का हिस्सा हो सकता है, आरोप लगाए जा रहे हैं कि राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी आंकड़े तैयार कर पोर्टल में अपलोड किए जा रहे हैं, यदि ऐसा है तो मामला केवल विभागीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि यह शासन को गुमराह करने,सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में फर्जीवाड़ा करने और सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग का गंभीर विषय बन सकता है।
पशुओं की सेहत से खिलवाड़ का आरोप…
पशुपालकों का कहना है कि टीकाकरण नहीं होने से पशुओं में खुरपका-मुंहपका, गलघोंटू और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है और ऐसे में यदि केवल कागजों में टीकाकरण दिखाकर अभियान पूरा घोषित कर दिया गया है तो इसका सीधा असर किसानों की आजीविका पर पड़ सकता है, ग्रामीणों का कहना है कि यदि भविष्य में किसी बीमारी का प्रकोप फैलता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
उच्चस्तरीय जांच की उठी मांग…
किसानों और पशुपालकों ने मांग की है कि पिछले कई वर्षों के टीकाकरण रिकॉर्ड, ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज आंकड़ों, जियो टैगिंग डेटा,ओटीपी सत्यापन रिकॉर्ड और वास्तविक पशु संख्या का भौतिक सत्यापन कराया जाए,साथ ही पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि रिकॉर्ड और वास्तविकता में कितना अंतर है तथा यदि किसी स्तर पर फर्जीवाड़ा हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है।
उप संचालक से नहीं हो सका संपर्क…
इस पूरे मामले में विभाग का पक्ष जानने के लिए उप संचालक पशु चिकित्सा सेवाएं कोरिया, विभा सिंह बघेल से उनके उपलब्ध मोबाइल नंबरों पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनसे संपर्क नहीं हो सका,अब निगाहें शासन और प्रशासन पर टिकी हैं, यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह कोरिया जिले के पशुधन विकास विभाग से जुड़ा एक बड़ा मामला साबित हो सकता है,वहीं यदि आरोप गलत हैं तो विभाग के लिए भी आवश्यक होगा कि वह सार्वजनिक रूप से तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करे,फिलहाल किसानों का सवाल बरकरार है—उनके पशुओं के नाम पर दर्ज टीकाकरण का लाभ आखिर गया कहां?


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