



- कलेक्टर बदले,गाड़ी बदली,सवाल नहीं बदले! एमसीबी में सुशासन का नया मॉडल,पहले इनोवा,फिर इम्तिहान
- ब्रेजा से इनोवा तक का सफर,सरकारी खर्च बढ़ा या प्रशासनिक गरिमा?
- एक कलेक्टर सादगी से पहचान बना गया,दूसरे दौर में गाड़ी चर्चा बन गई…
- पूर्व कलेक्टर राहुल वेंकट की सादगी और वर्तमान व्यवस्था की लग्जरी गाड़ी के बीच जनता कर रही तुलना,सरकारी खर्च और प्राथमिकताओं पर उठ रहे सवाल
- सादगी की मिसाल से सुविधा के कमाल
- तक,एमसीबी में बदलती प्रशासनिक तस्वीर
- ब्रेजा में चलता था सुशासन,इनोवा में चल रहे हैं सवाल!
- जनता के लिए मितव्ययिता,अफसरों के लिए लग्जरी व्यवस्था?
- एक तरफ पूर्व कलेक्टर राहुल वेंकट की सादगी की मिसाल, दूसरी तरफ नई कलेक्टर संतान देवी जांगड़े के लिए लग्जरी इनोवा की चर्चा
- नियुक्ति विवाद, सरकारी खर्च और वीआईपी संस्कृति
- पर फिर उठे सवाल,जनता पूछ रही—क्या सुशासन
- का रास्ता अब इनोवा से होकर गुजरता है?
-रवि सिंह-
एमसीबी,11 जून 2026 (घटती-घटना)। एमसीबी जिले में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा एक गाड़ी की हो रही है, यह कोई सामान्य गाड़ी नहीं है, बल्कि वह गाड़ी है जिसने जिले के प्रशासनिक गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक बहस छेड़ दी है, बहस केवल इनोवा की नहीं है, बहस उस सोच की है जो सरकारी पद,सरकारी धन और सरकारी सादगी के बीच कहीं रास्ता भटकती नजर आ रही है। विडंबना देखिए, यह वही एमसीबी जिला है जहां कुछ माह पहले तक तत्कालीन कलेक्टर राहुल वेंकट को उनकी सादगी के लिए पूरे प्रदेश में उदाहरण के रूप में पेश किया जाता था, अखबारों में उनकी तस्वीरें छपती थीं, खबरें लिखी जाती थीं कि जिले का कलेक्टर साधारण गाड़ी में चलता है,गाड़ी के आगे कोई नेमप्लेट नहीं लगाता,किसी तरह का रुतबा नहीं दिखाता और सरकारी संसाधनों का उपयोग उतना ही करता है जितनी आवश्यकता हो,उस समय लोग कहा करते थे कि यदि प्रशासनिक सेवा का कोई वास्तविक चेहरा है तो वह ऐसा होना चाहिए, जहां पद बड़ा हो,लेकिन व्यवहार सामान्य हो, जहां अधिकार हों, लेकिन अहंकार न हो, जहां सरकारी खजाना निजी सुविधा का साधन न बने,लेकिन समय बदला, कलेक्टर बदले और चर्चा का विषय भी बदल गया,आज जिले में नई कलेक्टर संतान देवी जांगड़े के कार्यकाल की शुरुआत के साथ एक नई बहस शुरू हो गई है,बहस उनके प्रशासनिक दौरों की नहीं, बल्कि उनके लिए उपलब्ध कराई गई लग्जरी इनोवा की है,वही जिला,वही सरकारी व्यवस्था और वही जनता, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी थी जिसने साधारण ब्रेजा को किनारे कर इनोवा को प्रशासनिक आवश्यकता बना दिया?
जब सादगी खबर बनती थी…
जनवरी 2025 में प्रकाशित समाचारों में राहुल वेंकट की कार्यशैली को लेकर विस्तार से लिखा गया था, कहा गया कि सरगुजा संभाग के अधिकांश कलेक्टर जहां इनोवा जैसी बड़ी गाडि़यों में चलते हैं, वहीं एमसीबी कलेक्टर साधारण वाहन में सफर करते हैं, उनकी गाड़ी पर कोई बड़ा बोर्ड नहीं होता था, कई बार लोग पहचान भी नहीं पाते थे कि जिले का कलेक्टर इसी वाहन में बैठा है, यह उस दौर की बात थी जब प्रशासनिक सादगी को उपलब्धि माना जाता था,उनके अधीनस्थ कई अधिकारी उनसे अधिक महंगी गाडि़यों में कार्यालय पहुंचते थे,कुछ अधिकारियों की गाडि़यों पर इतने बड़े-बड़े पदनाम लिखे होते थे कि दूर से देखने वाला समझ जाए कि कोई बड़ा अफसर गुजर रहा है,लेकिन जिले का मुखिया इन सबसे दूर रहता था,उस समय यह संदेश गया था कि सरकारी सेवा दिखावे का मंच नहीं बल्कि जिम्मेदारी का पद है।
नियुक्ति विवाद की परछाई भी पीछा नहीं छोड़ रही-गाड़ी की चर्चा केवल इसलिए बड़ी नहीं हुई क्योंकि वह इनोवा है, चर्चा इसलिए भी बढ़ी क्योंकि इसके साथ नियुक्ति विवाद की पुरानी छाया जुड़ गई, छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित 2003 पीएससी चयन विवाद आज भी राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं का हिस्सा बना हुआ है, वर्षों तक अदालतों में चले इस मामले ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे, आलोचकों का आरोप है कि जिन नियुक्तियों पर प्रश्न उठे,उनमें शामिल कई अधिकारी आज भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं,यहीं से जनता का सवाल शुरू होता है,यदि किसी सामान्य कर्मचारी पर विभागीय जांच बैठ जाए तो उसका प्रमोशन रुक जाता है, यदि किसी शिक्षक पर आरोप लग जाए तो उसे निलंबित कर दिया जाता है,यदि किसी पटवारी पर शिकायत आ जाए तो जांच शुरू हो जाती है,लेकिन जब सवाल बड़े अधिकारियों पर हो तो नियमों की रफ्तार अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर जनता वर्षों से खोज रही है।
सुशासन का पोस्टर और जमीन की हकीकत-नई कलेक्टर लगातार क्षेत्रीय दौरे कर रही हैं, गांवों तक पहुंच रही हैं, योजनाओं की समीक्षा कर रही हैं,अधिकारियों की बैठकें ले रही हैं,इन सब गतिविधियों को प्रशासनिक सक्रियता कहा जा सकता है, लेकिन लोकतंत्र में केवल सक्रियता पर्याप्त नहीं होती, जनता यह भी देखती है कि जो अधिकारी पारदर्शिता की बात कर रहा है, क्या उसके अपने निर्णय भी पारदर्शी हैं? जो अधिकारी मितव्ययिता का संदेश देता है,क्या वह स्वयं उसका पालन कर रहा है? जो अधिकारी जवाबदेही की बात करता है,क्या वह स्वयं सवालों का उत्तर देने को तैयार है? यही वह कसौटी है जिस पर किसी भी प्रशासनिक नेतृत्व का मूल्यांकन होता है।
ब्रेजा बनाम इनोवा,केवल गाड़ी नहीं,दो विचारधाराएं-आज एमसीबी में असल मुकाबला दो गाडि़यों का नहीं है,यह मुकाबला दो प्रशासनिक सोच का है,एक सोच कहती है कि सरकारी पद का मतलब जिम्मेदारी है, दूसरी सोच पर सवाल उठ रहे हैं कि कहीं सरकारी पद सुविधाओं का विस्तार तो नहीं बनता जा रहा,ब्रेजा और इनोवा यहां प्रतीक मात्र हैं,एक प्रतीक सादगी का, दूसरा प्रतीक सुविधा का,जनता अब इन दोनों प्रतीकों के बीच तुलना कर रही है।
छोटे अधिकारी बड़े साहब और बड़े साहब छोटे अधिकारी- राहुल वेंकट के समय एक बात अक्सर कही जाती थी कि जिले के कई छोटे अधिकारी उनसे ज्यादा रुतबा दिखाते थे,किसी की गाड़ी पर विशाल नेमप्लेट,किसी के आगे-पीछे दर्जनों परिचय पत्र, किसी की गाड़ी देखकर लगता था मानो पूरा विभाग उसी के भरोसे चल रहा हो, लेकिन जिले का कलेक्टर साधारण वाहन में चलता था,आज वही लोग तंज कस रहे हैं कि शायद सादगी की वह परंपरा भी विदा हो गई,अब प्रशासनिक व्यवस्था फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौटती दिखाई दे रही है जहां गाड़ी का मॉडल कभी-कभी कार्यशैली से ज्यादा चर्चा बटोर लेता है।
जनता का सबसे बड़ा सवाल- जनता किसी अधिकारी से यह अपेक्षा नहीं करती कि वह कठिन परिस्थितियों में रहे, न ही कोई यह कहता है कि कलेक्टर को साइकिल से चलना चाहिए,सवाल केवल इतना है कि जब सरकारी संसाधन पहले से उपलब्ध हैं तो अतिरिक्त खर्च क्यों? जब जनता से मितव्ययिता की अपेक्षा की जाती है तो प्रशासन स्वयं उसका उदाहरण क्यों नहीं बनता? और जब किसी अधिकारी का अतीत पहले से विवादों में रहा हो तो क्या उसे सार्वजनिक जीवन में और अधिक सावधानी नहीं बरतनी चाहिए?
गाड़ी बदलने से ज्यादा संदेश बदल गया- एमसीबी में असली बहस इनोवा की कीमत नहीं है, बहस उस संदेश की है जो जनता तक पहुंच रहा है,एक समय यही जिला सादगी की मिसाल देकर पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना था,आज वही जिला लग्जरी वाहन और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर चर्चा में है,हो सकता है नई कलेक्टर आने वाले समय में अपने काम से सभी आलोचनाओं को पीछे छोड़ दें,हो सकता है उनके प्रशासनिक निर्णय जिले को नई दिशा दें। लेकिन फिलहाल जनता की नजर काम से पहले उस प्रतीक पर टिक गई है जो प्रशासन की मानसिकता का आईना माना जाता है, और यही कारण है कि एमसीबी की चौपालों, बाजारों और दफ्तरों में एक वाक्य बार-बार सुनाई दे रहा है पहले कलेक्टर की पहचान उनके काम और सादगी से होती थी, अब चर्चा गाड़ी से शुरू हो रही है, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सब देखती है, वह सड़क भी देखती है, फाइल भी देखती है, फैसला भी देखती है और गाड़ी भी, और जब जनता सवाल पूछने लगती है, तब समझ लेना चाहिए कि चर्चा केवल वाहन की नहीं, व्यवस्था की हो रही है।
अस्वीकरण : नियुक्ति संबंधी उल्लेख सार्वजनिक रूप से चर्चित न्यायिक मामलों एवं आरोपों के संदर्भ में हैं, किसी सक्षम न्यायालय का अंतिम निर्णय आने तक किसी भी व्यक्ति को दोषी मानना उचित नहीं है।
और अब चर्चा में है इनोवा-
आज स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई देती है, नई कलेक्टर के आने के बाद जिले में चर्चा इस बात की है कि उनके लिए लग्जरी इनोवा की व्यवस्था की गई है, लोगों का कहना है कि पहले जो वाहन पर्याप्त था, वह अचानक अनुपयुक्त कैसे हो गया? क्या जिले की सड़कें इतनी खराब हो गईं कि ब्रेजा चलना बंद हो गई? क्या प्रशासनिक जिम्मेदारियां इतनी बढ़ गईं कि साधारण वाहन उन्हें संभाल नहीं सकता? या फिर सरकारी व्यवस्था में सुविधा का स्तर बदल गया? यही सवाल अब गांवों से लेकर शहर तक सुनाई दे रहा है।
सरकार मितव्ययिता सिखाए और अफसर विलासिता अपनाएं?-
देश में जब भी वित्तीय संकट, बजट नियंत्रण या खर्च कम करने की बात होती है तो सबसे पहले कर्मचारियों और विभागों को निर्देश जारी होते हैं, बिजली बचाओ, पानी बचाओ, डीजल बचाओ, अनावश्यक खर्च रोकिए, लेकिन जब जनता प्रशासन के शीर्ष पदों की ओर देखती है तो उसे अक्सर अलग तस्वीर दिखाई देती है, एमसीबी में भी लोग यही पूछ रहे हैं कि यदि सरकार पहले से वाहन उपलब्ध करा चुकी थी तो दूसरी गाड़ी की आवश्यकता क्यों पड़ी? सरकारी धन आखिर किसलिए खर्च किया जा रहा है? यदि अतिरिक्त वाहन अधिग्रहित किया गया है तो उसका भुगतान कौन करेगा? और यदि वाहन निजी है तो उसकी वैधानिक स्थिति क्या है? इन सवालों का जवाब आज तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
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