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खड़गवां@ जांच या शिकायतकर्ता से जवाब-तलब? एफएमडी टीकाकरण जांच पर उठे नए सवाल

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रायपुर से आई जांच समिति के रवैये पर शिकायतकर्ता ने लगाए गंभीर आरोप,फोन पर दबाव बनाने और कार्यालय नहीं बुलाने का दावा
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,02 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
पशु विभाग के बहुचर्चित एफएमडी (फुट एंड माउथ डिजीज) टीकाकरण अभियान में कथित अनियमितताओं की जांच अब स्वयं सवालों के घेरे में आ गई है,शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जांच के लिए गठित टीम का रवैया निष्पक्ष जांच करने के बजाय शिकायतकर्ता से ही जवाब-तलब करने जैसा रहा, उनका दावा है कि रायपुर से गठित जांच समिति के अध्यक्ष एवं अपर संचालक ने उन्हें फोन कर कार्यालय नहीं आने की बात कही और कई सवाल पूछते हुए दबाव बनाने का प्रयास किया। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं,तो मामला केवल कथित टीकाकरण अनियमितताओं तक सीमित न रहकर जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।
पत्र में बुलाया… फोन पर आने से रोका?
शिकायतकर्ता के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य पशुधन विकास अभिकरण,रायपुर द्वारा जारी पत्र क्रमांक 281/जांच/कोरिया-खड़गवां/2026-27,दिनांक 27 जुलाई 2026 में स्पष्ट उल्लेख था कि 30 जुलाई 2026 को गठित जांच समिति कोरिया जिले में पहुंचकर जांच करेगी तथा शिकायतकर्ता को आवश्यक दस्तावेजों सहित उपस्थित होने का आग्रह किया गया था,लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि पत्र के विपरीत जांच समिति के अध्यक्ष एवं अपर संचालक ने स्वयं फोन कर उन्हें कार्यालय नहीं आने के लिए कहा और उसी दौरान कई सवाल पूछे।
फोन पर पूछे गए सवालों पर उठे विवाद
शिकायतकर्ता का दावा है कि फोन पर उनसे कहा गया की जब तुम्हारे यहां टीकाकरण करने गए थे,वह कौन-सी तारीख थी? तुमने टीकाकरण क्यों नहीं कराया? टीकाकरण कराना तुम्हारी जिम्मेदारी है, पूरे क्षेत्र में 60 हजार पशु हैं, क्या सिर्फ तुम्हारे ही पशु देखें? शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने जवाब दिया कि यदि विभाग की टीम गांव में टीकाकरण करने ही नहीं पहुंची, तो पशुपालक स्वयं विभाग के पीछे-पीछे घूमकर टीकाकरण कैसे कराएंगे,उनके अनुसार टीकाकरण कराना विभाग की जिम्मेदारी है,न कि पशुपालकों की।
जांच से पहले शिकायतकर्ता पर ही सवाल क्यों?-इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई सवाल उठने लगे हैं,यदि जांच समिति का गठन समाचारों में प्रकाशित आरोपों, विभागीय अभिलेखों और जमीनी स्थिति का सत्यापन करने के लिए किया गया था, तो शिकायतकर्ता से फोन पर इस प्रकार पूछताछ क्यों की गई? यदि पत्र में शिकायतकर्ता को उपस्थित होने का आग्रह किया गया था,तो बाद में फोन पर कार्यालय नहीं आने की बात क्यों कही गई? दोनों स्थितियों के बीच दिखाई देने वाला यह विरोधाभास जांच प्रक्रिया को लेकर नई शंकाएं पैदा कर रहा है।
जांच नहीं,दबाव बनाने की कोशिश का आरोप- शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जांच समिति का व्यवहार ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसका उद्देश्य तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना नहीं,बल्कि शिकायतकर्ता को मानसिक रूप से दबाव में लाना था, शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया है कि जांच समिति के अध्यक्ष एवं अपर संचालक के साथ हुई पूरी टेलीफोन वार्ता की रिकॉर्डिंग उनके पास सुरक्षित है,उनका कहना है कि आवश्यकता पड़ने पर यह रिकॉर्डिंग सक्षम अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी, हालांकि,इस रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और इसकी सत्यता का निर्धारण सक्षम जांच अथवा विधिक प्रक्रिया के बाद ही संभव होगा।
जांच प्रक्रिया पर उठ रहे प्रमुख सवाल- विभागीय पत्र में शिकायतकर्ता को उपस्थित होने का आग्रह किया गया था, तो फोन पर कार्यालय नहीं आने की बात क्यों कही गई? क्या जांच समिति का उद्देश्य शिकायत की निष्पक्ष जांच करना था या शिकायतकर्ता से ही जवाब-तलब करना? यदि कई क्षेत्रों में वास्तविक टीकाकरण नहीं हुआ,तो ऑनलाइन पोर्टल पर 100 प्रतिशत उपलब्धि कैसे दर्ज हुई? क्या जांच के दौरान विभागीय रिकॉर्ड,अपलोड किए गए फोटो, पशुपालकों के बयान और जमीनी स्थिति का समुचित सत्यापन किया गया? यदि शिकायतकर्ता के पास मौजूद रिकॉर्डिंग प्रमाणित होती है,तो क्या जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी अलग से जांच होगी?
पक्ष जानने का प्रयास- इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य पशुधन विकास अभिकरण की मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. लक्ष्मी अजगले का पक्ष जानने के लिए समाचार प्रकाशित होने से पूर्व उपलब्ध मोबाइल नंबर 8516875725 पर कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
नजर अब जांच रिपोर्ट पर…
एफएमडी टीकाकरण अभियान में कथित अनियमितताओं को लेकर पहले ही शासन स्तर पर जांच के आदेश दिए जा चुके हैं, अब शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए नए आरोपों ने जांच प्रक्रिया को भी बहस के केंद्र में ला दिया है,यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो मामला केवल टीकाकरण अभियान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिकायतकर्ताओं के साथ प्रशासनिक व्यवहार और जांच की निष्पक्षता पर भी व्यापक सवाल खड़े करेगा,वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं,तो यह भी जांच रिपोर्ट के माध्यम से स्पष्ट होना आवश्यक होगा,ऐसी स्थिति में सभी पक्षों की बात सामने आने और आधिकारिक जांच रिपोर्ट का इंतजार महत्वपूर्ण होगा।


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