33 पंचायतों के 100 मरीज रोजाना प्रभावित, गर्भवती महिलाओं को बिना जांच किया रेफर-कलेक्टर की फटकार के बाद भी हालात जस के तस
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां, 25 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले का पोड़ी बचरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इन दिनों ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई बयां कर रहा है, कागजों में जहां यह केंद्र रोजाना सैकड़ों मरीजों को इलाज देने का दावा करता है, वहीं जमीनी हकीकत में यह ‘इलाज केंद्र’ कम और ‘रेफर सेंटर’ ज्यादा नजर आ रहा है। डॉक्टरों की अनुपस्थिति, लापरवाही और अव्यवस्था के चलते मरीजों को या तो बिना इलाज लौटना पड़ रहा है या सीधे जिला अस्पताल की राह पकड़नी पड़ रही है।
पोड़ी बचरा स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि सिर्फ भवन और नियुक्तियां काफी नहीं होतीं—जरूरत होती है जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की, जब तक सिस्टम जमीन पर नहीं उतरेगा, तब तक मरीजों की परेशानी कम नहीं होगी, अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में कब और कितना प्रभावी कदम उठाता है।
33 पंचायतों की जिम्मेदारी, पर व्यवस्था लाचार
पोड़ी बचरा स्वास्थ्य केंद्र पर 33 ग्राम पंचायतों के करीब 100 मरीज रोजाना निर्भर रहते हैं, लेकिन यहां डॉक्टरों और स्टाफ की नियमित उपस्थिति का कोई ठोस सिस्टम नहीं है, कभी डॉक्टर मिल जाते हैं, तो कभी अस्पताल केवल ‘खुला भवन’ बनकर रह जाता है, ऐसे में मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ता है।
जहरीले कीड़े के काटने पर भी असमंजस- उसी रात एक युवक जहरीले कीड़े के काटने से तड़पता हुआ अस्पताल पहुंचा, लेकिन डॉक्टर यह तक नहीं पहचान सके कि उसे किस प्रकार के कीड़े ने काटा है, प्राथमिक उपचार के बाद उसे भी जिला अस्पताल भेज दिया गया, इससे साफ होता है कि आपातकालीन चिकित्सा में भी अस्पताल की तैयारी अधूरी है।
जमीन पर इलाजः संवेदनहीनता की हद- सबसे चौंकाने वाली घटना एक मासूम बच्चे के साथ हुई, बेड खाली होने के बावजूद बच्चे को जमीन पर लिटाकर इलाज किया गया, यह दृश्य न केवल अमानवीय है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
कभी था मॉडल अस्पताल, अब बना रेफर सेंटर- विडंबना यह है कि यही स्वास्थ्य केंद्र पहले अपनी बेहतर सेवाओं के लिए जाना जाता था, पूर्व बीएमओ डॉ. दीपेंद्र सिकरवार के कार्यकाल में यहां हर महीने 40-50 प्रसव होते थे और केवल जटिल मामलों को ही रेफर किया जाता था, लेकिन अब एमबीबीएस डॉक्टरों की नियुक्ति के बावजूद हालात बदतर हो गए हैं और अस्पताल सिर्फ रेफर सेंटर बनकर रह गया है।
कलेक्टर की फटकार भी बेअसर- 25 मार्च को कलेक्टर कोरिया ने औचक निरीक्षण किया था, जिसमें डॉक्टर सहित कई कर्मचारी अनुपस्थित पाए गए थे, अस्पताल परिसर में गंदगी को लेकर कलेक्टर ने कड़ी नाराजगी जताई थी और कारण बताओ नोटिस जारी कर वेतन रोकने के निर्देश भी दिए थे, लेकिन इसके बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
रात में सबसे ज्यादा संकट
दिन के मुकाबले रात के समय हालात और भी भयावह हो जाते हैं, आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को अक्सर डॉक्टर नहीं मिलते, गंभीर मामलों में परिजन मजबूरी में मरीजों को निजी साधनों से जिला अस्पताल ले जाने को विवश हो जाते हैं।
गर्भवती महिलाओं को बिना जांच किया रेफर
गुरुवार रात की घटना ने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी, प्रसव पीड़ा से कराहती दो गर्भवती महिलाएं अस्पताल पहुंचीं, लेकिन वहां पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं था, केवल एक डॉक्टर और एक एएनएम के भरोसे पूरा अस्पताल चल रहा था, स्थिति ऐसी बनी कि बिना समुचित जांच के ही दोनों महिलाओं को जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया, यह लापरवाही न केवल खतरनाक है, बल्कि मातृ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी है।
ग्रामीणों में आक्रोश
लगातार हो रही लापरवाही से ग्रामीणों में गहरी नाराजगी है, उनका कहना है कि जब अस्पताल में डॉक्टर ही मौजूद नहीं रहेंगे, तो गरीब मरीज कहां जाएंगे? सरकारी अस्पताल ही उनके लिए एकमात्र सहारा है, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है।
बड़ा सवालः क्या कागजों में ही चल रही स्वास्थ्य व्यवस्था?
यह पूरा मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है-क्या ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ कागजों में ही चल रही है? अगर हालात ऐसे ही रहे, तो यह न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।
कार्रवाई की मांग…
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि लापरवाह डॉक्टरों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, साथ ही स्वास्थ्य केंद्र में नियमित और जिम्मेदार डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित की जाए,ताकि मरीजों को समय पर और सही इलाज मिल सके।
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