


- एक तरफ कलेक्टर सहेज रही हैं बूंद-बूंद पानी इधर जल संसाधन बहा रहा गेज की मर्यादा….
- भांडी-जनकपुर में ‘जल-तांडव’ः घरों के पीछे बह रहा भ्रष्टाचार का नाला,नही हुआ मरम्मत तो बढ़ेगी परेशानी
- नहरें बनीं मुसीबत का सबब,भांडी-जनकपुर की जनता बोली… ‘हमें सिंचाई का हक दो’…तबाही का नाला नहीं…
राजन पाण्डेय
बैकुंठपुर/कोरिया,25 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में जल संरक्षण के दावों और धरातल की हकीकत के बीच एक ऐसी खाई पैदा हो गई है,जो अब तबाही का रूप ले रही है, एक ओर जिले की मुखिया, कलेक्टर महोदया,‘जल शक्ति’ और ‘संरक्षण’ के जरिए भविष्य को सुरक्षित करने की मुहिम चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर जल संसाधन विभाग के बेपरवाह अधिकारियों ने इस नेक पहल के खिलाफ एक तरह का ‘अघोषित जल-विद्रोह’ छेड़ दिया है, विभाग की चरम लापरवाही का आलम यह है कि गेज बांध का बहुमूल्य पानी खेतों की प्यास बुझाने के बजाय रिहायशी इलाकों में बर्बादी का सबब बन गया है।
नहरें या भ्रष्टाचार की खुली गवाही?
मिली जानकारी के अनुसार, गेज बांध से निकलने वाली नहरें अब नहरें कम और विभाग के भ्रष्टाचार का ‘स्मारक’ ज्यादा नजर आती हैं, ग्राम आनी से भांडी के बीच नहरों की स्थिति इतनी जर्जर हो चुकी है कि पानी का प्रवाह नियंत्रित करने की क्षमता विभाग खो चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नहरों की सफाई और मरम्मत के नाम पर हर साल लाखों का वारा-न्यारा किया जाता है, लेकिन धरातल पर ईंट तक नहीं रखी गई। नतीजा यह है कि नहरों से पानी रिसकर लोगों के बाडि़यों में घुस रहा है, जिससे करोड़ों की सरकारी संपत्ति और प्राकृतिक संसाधन का ‘जल-सत्यानाश’ हो रहा है।
भांडी-जनकपुर में ‘जल-तांडव’ः घरों के पीछे बन गया नाला
खबर की सबसे भयावह तस्वीर भांडी और जनकपुर इलाके से सामने आ रही है, यहाँ नहरों के टूटने और ओवरफ्लो होने के कारण पानी ने बस्तियों के बीच अपना नया रास्ता बना लिया है, आलम यह है कि लोगों के घरों के पीछे से ‘अघोषित नाले’ बह रहे हैं।
खतरे की संभावनाः जल्द मरम्मत नही हुई तो बरसात में इस पानी से ज्यादा नुकसान हो सकता है।
बर्बाद होती फसलेंः गर्मी में एक तरफ किसान पानी के लिए तरसते है वहीं दूसरी तरफ जल के फिजूल बहाव नाले का रूप ले रहा है
क्या कलेक्टर के विजन को अधिकारी दे रहे चुनौती?- यह पूरा मामला सीधे तौर पर जिले के प्रशासनिक तालमेल पर सवाल उठाता है, जब जिले की कलेक्टर जल संरक्षण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए उन्होंने जन भागीदारी के साथ पूरी ताकत झोंक रखी है तब जल संसाधन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कुंभकर्णी नींद में क्यों सोए हैं? क्या विभाग ने मान लिया है कि वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं? पानी की यह बर्बादी केवल एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुशासनहीनता का चरम है, जो सीधे तौर पर शासन की छवि को धूमिल कर रहा है।
हो सकता है बड़ा आंदोलन
इस कुप्रबंधन से त्रस्त ग्रामीणों और किसानों का आक्रोश अब सातवें आसमान पर है, क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अगले कुछ दिनों के भीतर नहरों का वैज्ञानिक तरीके से सुधार नहीं किया गया और पानी की इस बर्बादी को नहीं रोका गया, तो वे जल संसाधन विभाग के कार्यालय का घेराव करेंगे, ग्रामीणों का कहना है कि अब केवल कागजी आश्वासन से काम नहीं चलेगा, उन्हें धरातल पर पानी का सही प्रबंधन चाहिए।
बड़ा सवाल : कहाँ गया मेंटेनेस का बजट?
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर और जांच का विषय यह है कि हर साल सिंचाई सत्र से पूर्व नहरों की साफ-सफाई और मरम्मत के नाम पर जो लाखों-करोड़ों का बजट जारी होता है,वह आखिर गया कहाँ? आनी से भांडी के बीच नहरों की बदहाली चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि धरातल पर एक ढेला तक काम नहीं हुआ है,ऐसा प्रतीत होता है कि विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने मरम्मत के नाम पर आए सरकारी खजाने को कागजों में ही ‘खपा’ दिया है, यदि वाकई में नहरों का सुदृढ़ीकरण किया गया होता,तो आज गेज बांध का पानी किसानों के लिए वरदान बनने के बजाय ग्रामीणों के लिए ‘अभिशाप’ नहीं बनता, कागजों पर दौड़ती ‘मरम्मत की फाइलें’ और जमीन पर बहता ‘बर्बादी का सैलाब’ विभाग के भीतर चल रहे बड़े खेल की ओर इशारा कर रहा है, जिसकी उच्च स्तरीय जांच अब अनिवार्य हो गई है।
अजीब विडंबना : कहीं सैलाब,तो कहीं सूखा
एक तरफ भांडी-जनकपुर में विभाग की लापरवाही से पानी का अघोषित नाला बन रहा है, वहीं इसी नहर के अंतिम छोर पर बसे दर्जनों किसान बूंद-बूंद पानी के लिए आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, विभाग के कुप्रबंधन ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि ‘ऊपर वाले पानी से परेशान हो रहे हैं और नीचे वाले प्यासे मर रहे हैं’, क्या विभाग का काम सिर्फ बांध के गेट खोल देना है? पानी का अंतिम खेत तक न्यायोचित वितरण सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है?
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