मेरठ,22 मार्च 2026। वरिष्ठ राजनेता किशन चंद (केसी) त्यागी रालोद में शामिल हो गए हैं। दिल्ली में आयोजित कार्यकत में पार्टी अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह ने उन्हें रालोद की सदस्यता दिलाई। नौवीं लोकसभा में हापुड़-गाजियाबाद के सांसद रह चुके केसी त्यागी पिछले 26 वर्षों से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का हिस्सा थे। उनके रालोद में आने से वेस्ट यूपी की कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सांसद केसी त्यागी ने नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली जाने के निर्णय के बाद जदयू को अलविदा कहने का फैसला किया। उनका मानना है कि बिहार तक सीमित जदयू में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेता के लिए भविष्य में कोई विशेष भूमिका नहीं रह जाती। अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और आपातकाल के समय जॉर्ज फर्नांडिस, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे दिग्गजों के साथ काम करने के अनुभव के साथ केसी त्यागी ने पिछले 26 वर्षों में केंद्रीय राजनीति में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। नीतीश कुमार के राजनीतिक भविष्य को देखते हुए उनका रालोद में शामिल होना न केवल उन्हें सक्रिय राजनीति में बनाए रखने का एक प्रयास है, बल्कि यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी एक और पारी खेलने का संकेत भी देता है। केसी त्यागी के रालोद में शामिल होने से पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निश्चित रूप से लाभ मिलने की उम्मीद है। वर्तमान में रालोद भाजपा के गठबंधन में शामिल है और जयंत चौधरी मोदी सरकार में मंत्री भी हैं। आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में रालोद और भाजपा के मिलकर चुनाव लड़ने की पूरी संभावना है, ऐसे में केसी त्यागी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
इन सीटों पर पड़ सकता है असर : मोदीनगर, मुरादनगर और सिवालखास जैसी सीटों पर, जहां भाजपा के साथ गठबंधन में रालोद का दावा कई वर्तमान विधायकों और भावी प्रत्याशियों का समीकरण बिगाड़ सकता है। यह माना जा रहा है कि केसी त्यागी इन सीटों पर अपने करीबी लोगों को टिकट दिलाने के लिए जोर लगा सकते हैं।
रालोद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य
रालोद,जो पारंपरिक रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित एक क्षेत्रीय दल रहा है,को चुनाव जीतने के लिए अकसर अन्य दलों के सहारे की आवश्यकता पड़ती है। चौधरी चरण सिंह के बाद, उनके पुत्र चौधरी अजित सिंह और अब पौत्र जयंत चौधरी,जाट समुदाय के बीच वह मजबूत पकड़ बनाए रखने में संघर्ष कर रहे हैं, जो चौधरी चरण सिंह के समय थी। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के टिकैत बंधुओं जैसे नेताओं ने भी इस विरासत में सेंध लगाई है।
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