
- समस्याओं का वनवास,सोनहत में मंच चमके, जनता अंधेरे में!
- नेटवर्क गायब,बिजली अधूरी, स्ट्रीट लाइट बंद,पुलिया टूटी और आदिवासी प्रमाण पत्र के लिए भटकते रहे—फिर भी सफल रहा सुशासन तिहार!
- सुशासन तिहार का शोर,समस्याओं का सन्नाटा, सोनहत आज भी अंधेरे, प्यास और इंतजार में
- मंच पर सुशासन, जमीन पर बदहाली, सोनहत की जनता पूछ रही—समाधान कहां है?
- भाषणों में विकास, हकीकत में अंधकार, सोनहत में सुशासन के दावों की खुली पोल
- दो सुशासन तिहार बीते, तीन साल गुजर गए… बिजली आज भी रास्ते में है!
- डिजिटल इंडिया के पोस्टर में सोनहत, हकीकत में नेटवर्क खोजता रामगढ़
- आवेदन लिए गए, आश्वासन दिए गए… लेकिन सोनहत को मिला क्या?
- सुशासन तिहार का जश्न खत्म, अब जनता पूछ रही है—बिजली, पानी, सड़क और नेटवर्क कब मिलेगा?
-राजन पाण्डेय-
कोरिया,12 जून 2026(घटती-घटना)। सोनहत में एक बार फिर सुशासन तिहार का मेला लगा, मंच सजे, कुर्सियां लगीं,माइक गरजे, अधिकारी मुस्कुराए,नेताओं ने जनता को विकास का नया सपना दिखाया और सरकारी अमले ने उपलब्धियों की ऐसी लंबी सूची पढ़ी कि सुनने वालों को लगा मानो सोनहत अब सीधे स्मार्ट सिटी बनने की कतार में खड़ा हो गया हो।
मंच से बताया गया कि शासन जनता के द्वार पहुंच रहा है, समस्याओं का समाधान हो रहा है, विकास की गंगा बह रही है, सुशासन घर-घर दस्तक दे रहा है, लेकिन जैसे ही कार्यक्रम खत्म हुआ,मंच उखड़ा और अधिकारी वाहनों में बैठकर लौटे, वैसे ही सोनहत की जनता फिर उसी पुरानी हकीकत के सामने खड़ी दिखाई दी—अंधेरी सड़कें,बंद नेटवर्क,अधूरी बिजली,टूटी पुलिया, सूखे नल और दफ्तरों के चक्कर काटते आदिवासी, ऐसा लगने लगा है कि सोनहत में सुशासन अब समस्या समाधान का कार्यक्रम कम और सरकारी उपलब्धियों का सांस्कृतिक उत्सव ज्यादा बनता जा रहा है।
पानी के लिए त्राहि-त्राहि,नहरें दम तोड़ रहीं…
गर्मी की शुरुआत के साथ ही पेयजल संकट ने दस्तक दे दी है,कई गांवों में महिलाएं दूर-दूर से पानी लाने को मजबूर हैं,हैंडपंप जवाब दे रहे हैं,जल स्रोत सिकुड़ रहे हैं, दूसरी ओर सिंचाई व्यवस्था की हालत भी चिंताजनक है, बांध और नहरें रखरखाव के अभाव में दम तोड़ रही हैं,किसान पूछ रहे हैं कि यदि पानी ही नहीं मिलेगा तो खेती कैसे होगी? लेकिन इन सवालों का जवाब किसी मंच से सुनाई नहीं देता।
सेमरिया की पुलियाः प्रशासन हादसे का इंतजार कर रहा है?
सेमरिया की टूटी पुलिया पिछले एक साल से ग्रामीणों के लिए खतरा बनी हुई है, हर दिन स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और आम नागरिक जान जोखिम में डालकर यहां से गुजरते हैं, लेकिन मरम्मत की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं दिखाई देती,ऐसा लगता है मानो जिम्मेदार विभाग किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा हो ताकि उसके बाद संवेदनाओं की प्रेस विज्ञप्ति जारी की जा सके।
सुशासन या सिर्फ आयोजन?
कोरिया जन सहयोग समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अधिवक्ता जयचंद सोनपाकर का सवाल पूरे क्षेत्र की भावना को व्यक्त करता है, यदि समाधान शिविरों के बाद भी समस्याएं जस की तस हैं…यदि मुख्यालय अंधेरे में है…यदि नेटवर्क गायब है…यदि आदिवासी प्रमाण पत्र के लिए भटक रहे हैं…यदि गांव बिजली से वंचित हैं…यदि पुलिया टूटी है…तो फिर सुशासन आखिर कहां है? क्या वह केवल मंच पर था? क्या वह केवल भाषणों में था? या फिर वह फाइलों के किसी ऐसे पन्ने में बंद है जिसे जनता कभी देख ही नहीं सकती? सोनहत की जनता अब आश्वासनों से आगे बढ़कर परिणाम चाहती है,क्योंकि सुशासन का अर्थ तालियों की गूंज नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान होता है, और जब समस्याएं वर्षों तक जस की तस खड़ी रहें,तब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर यह सुशासन है या केवल उसका उत्सव? सोनहत आज भी जवाब का इंतजार कर रहा है।
ब्लॉक मुख्यालय में ही अंधेरा,फिर गांवों का क्या होगा?-
सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जिस ब्लॉक मुख्यालय से पूरे क्षेत्र के विकास की दिशा तय होती है, वहीं शाम होते ही अंधेरा राज करने लगता है, सोनहत की स्ट्रीट लाइटें वर्षों से बंद पड़ी हैं, कई खंभे ऐसे खड़े हैं जैसे विकास की समाधि पर पहरा दे रहे हों, दिन में वे सरकारी योजनाओं की सफलता के प्रतीक लगते हैं और रात में प्रशासनिक लापरवाही की गवाही देते हैं, सुशासन तिहार में करोड़ों की योजनाओं के दावे सुनने को मिले,लेकिन मुख्यालय की सड़कें रोशन करने के लिए कोई घोषणा नहीं हुई,लगता है अंधेरे को भी अब सरकारी संरक्षण प्राप्त हो चुका है, स्थानीय लोग तंज कसते हैं कि शायद स्ट्रीट लाइटें भी किसी अगले सुशासन तिहार का इंतजार कर रही हैं।
डिजिटल इंडिया के पोस्टर में रामगढ़,लेकिन नेटवर्क में गायब
देश चांद पर पहुंच चुका है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चर्चा हो रही है,डिजिटल इंडिया के विज्ञापन हर तरफ दिखाई देते हैं, लेकिन सोनहत के रामगढ़ क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क आज भी लुकाछिपी का खेल खेल रहा है,टावर खड़े हैं, लेकिन सिग्नल नहीं,खंभे दिखाई देते हैं, लेकिन बातचीत नहीं, नेटवर्क चालू बताया जाता है,लेकिन जनता कहती है कि यह चालू होकर भी बंद के बराबर है,स्थिति ऐसी है कि कई गांवों में लोगों को फोन करने के लिए पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है,इंटरनेट चलाने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है, ऑनलाइन पढ़ाई,डिजिटल भुगतान और ई-गवर्नेंस जैसी बातें यहां मजाक जैसी लगती हैं,डिजिटल इंडिया का सपना यहां नेटवर्क खोजते-खोजते दम तोड़ता नजर आता है।
राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र,लेकिन प्रमाण-पत्र के लिए बेबस
पंडो जनजाति को विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त है,सरकारी दस्तावेजों और भाषणों में इनके उत्थान की बातें खूब होती हैं,लेकिन सोनहत की हकीकत कुछ और कहानी कहती है,जाति और निवास प्रमाण पत्र के लिए पंडो परिवार वर्षों से भटक रहे हैं,नई पीढ़ी उच्च शिक्षा से वंचित हो रही है, कई युवाओं को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा, सरकारी योजनाएं कागजों में हैं, लेकिन लाभार्थी सूची तक पहुंचने से पहले ही लोग दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते थक जाते हैं,विडंबना देखिए,जिन्हें शासन दत्तक पुत्र बताता है,वे आज भी अपनी पहचान साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के सामने खड़े हैं।
तीन साल,दो सुशासन तिहार और बिजली अब भी रास्ते में
चंदहा, बंशीपुर और कचोहर गांवों का विद्युतीकरण अब विकास से ज्यादा धैर्य परीक्षा का विषय बन चुका है,तीन साल गुजर गए, दो सुशासन तिहार निकल गए, कई शिविर लगे,अनगिनत आवेदन दिए गए, लेकिन बिजली अब भी फाइलों के जंगल में रास्ता तलाश रही है, ग्रामीण बताते हैं कि हर बार आश्वासन मिलता है,हर बार सर्वे होता है, हर बार अधिकारी आते हैं,तस्वीरें खिंचती हैं और फिर सब कुछ अगले वर्ष तक स्थगित हो जाता है,यदि आश्वासन से बल्ब जलते तो शायद इन गांवों में आज चौबीसों घंटे रोशनी होती।
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