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संपादकीय@ सरगुजा में कानून का राज बनाम अपराध का साया

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क्या समाज समय रहते सचेत होगा?
सरगुजा लंबे समय से छत्तीसगढ़ के अपेक्षाकृत शांत और सामाजिक सौहार्द वाले क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। लेकिन यदि किसी क्षेत्र में संगठित अपराध, बाहरी आपराधिक नेटवर्क,रंगदारी,संरक्षण शुल्क (प्रोटेक्शन मनी),अपहरण अथवा अपराधियों के प्रभाव की चर्चा होने लगे,तो यह केवल पुलिस के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
हाल के समय में विभिन्न राज्यों में सक्रिय संगठित अपराध गिरोहों के प्रभाव, सोशल मीडिया के माध्यम से धमकी,डिजिटल नेटवर्क और आर्थिक अपराधों पर देशभर की कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ लगातार कार्रवाई कर रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी पुलिस और केंद्रीय एजेंसियाँ यह मान चुकी हैं कि संगठित अपराध केवल हथियारों से नहीं,बल्कि आर्थिक नेटवर्क,स्थानीय सहयोग और डिजिटल संपर्कों के सहारे मजबूत होता है।
इसी संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी भी अपराधी नेटवर्क को स्थानीय स्तर पर सामाजिक या आर्थिक संरक्षण मिलना चाहिए?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं…
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक न्यायालय उसे दोषी सिद्ध न कर दे। इसलिए किसी भी आरोपी के संबंध में अंतिम निर्णय न्यायालय का ही होता है। यही संवैधानिक व्यवस्था है और इसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि यदि किसी फरार आरोपी को जानबूझकर शरण देना,उसके लिए संसाधन उपलब्ध कराना,उसकी सूचना छिपाना या उसके आर्थिक एवं सामाजिक नेटवर्क को मजबूत करना सिद्ध हो जाए,तो ऐसी परिस्थितियों में भारतीय कानून के अंतर्गत स्वयं सहयोग करने वाले व्यक्ति की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। यह सिद्धांत केवल किसी एक राज्य का नहीं बल्कि पूरे देश की आपराधिक न्याय प्रणाली का हिस्सा है।
आज अपराध का स्वरूप भी बदल चुका है…
एक समय था जब अपराधी केवल मोबाइल कॉल या प्रत्यक्ष मुलाकातों के माध्यम से संपर्क करते थे। अब एन्कि्रप्टेड मैसेजिंग एप,सोशल मीडिया,इंटरनेट कॉल,डिजिटल भुगतान,वर्चुअल नंबर और विभिन्न ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग बढ़ा है। इसके समानांतर डिजिटल फोरेंसिक विज्ञान भी अत्यधिक विकसित हुआ है। जांच एजेंसियाँ केवल संदेशों की सामग्री पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत डिवाइस, कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन पैटर्न, नेटवर्क विश्लेषण,डिजिटल उपकरणों और अन्य तकनीकी साक्ष्यों को मिलाकर जांच करती हैं। इसलिए यह मान लेना कि कोई भी डिजिटल माध्यम पूर्णतः जांच से परे है, वास्तविकता से मेल नहीं खाता।
हालाँकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर चल रही प्रत्येक चर्चा या आरोप को स्वतः सत्य न मान लिया जाए। किसी भी व्यक्ति, संस्था या व्यवसाय के विरुद्ध आरोप तभी स्वीकार्य माने जा सकते हैं जब उनके समर्थन में विश्वसनीय तथ्य,दस्तावेज या न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप साक्ष्य उपलब्ध हों। केवल अफवाह,अनुमान या सोशल मीडिया पोस्ट किसी को दोषी सिद्ध नहीं करते।
सरगुजा जैसे क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि यहां कानून का शासन केवल कागजों तक सीमित न रहे,बल्कि आम नागरिक अपने आपको सुरक्षित महसूस करें। व्यापार भयमुक्त वातावरण में हो,निवेश विश्वास के साथ आए और युवा अपराध के बजाय अवसरों की ओर बढ़ें।
यह जिम्मेदारी केवल पुलिस या प्रशासन की नहीं है। समाज,व्यापारी, जनप्रतिनिधि,मीडिया और आम नागरिक—सभी की समान भूमिका है। यदि किसी को किसी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी है तो उसका उचित माध्यम से पुलिस को सूचित करना नागरिक दायित्व है। वहीं किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध बिना प्रमाण सार्वजनिक आरोप लगाने से भी बचना चाहिए।
अंततः संगठित अपराध का सबसे बड़ा सहारा हथियार नहीं,बल्कि समाज की चुप्पी और स्थानीय सहयोग होता है। यदि समाज कानून के साथ खड़ा रहे, जांच एजेंसियाँ निष्पक्ष एवं पेशेवर ढंग से कार्य करें और न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से आगे बढ़े,तो कोई भी आपराधिक नेटवर्क स्थायी रूप से मजबूत नहीं हो सकता। सरगुजा की पहचान शांति,विकास और सामाजिक सद्भाव से है। यह पहचान किसी भी कीमत पर भय,रंगदारी और अपराध के साये में नहीं बदलनी चाहिए।


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