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रायपुर@बेनी का ‘चक्रव्यूह’ और नेताम की ‘क्लीन बोल्ड’ कहानी, नकली दवा कांड में कार्रवाई करने वाला ही बना निशाना?

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  • नकली दवा कांड में बड़ा उलटफेर…कार्रवाई करने वाले संजय नेताम निलंबित,बेनी राम साहू बने रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी!
  • नकली दवा की जांच या कुर्सी की जंग? निरीक्षण दल,छुट्टी और निलंबन ने खड़े किए बड़े सवाल
  • छुट्टी में निरीक्षण, खाली दुकान और निलंबन,खाद्य एवं औषधि प्रशासन में क्या पक रहा है?
  • नकली दवा से ज्यादा गर्म हुई कुर्सी,नेताम हटे,बेनी राम साहू आगे—पूरा घटनाक्रम सवालों में…
  • रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी की कुर्सी,राजनीतिक पकड़ और विभागीय फैसलों पर उठते तीखे सवाल
  • नकली दवा कांडः कार्रवाई करने वाले संजय कुमार नेताम निलंबित, बेनी राम साहू बने रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी-क्या यह महज संयोग है?
  • 10 दिसंबर से 28 जनवरी तक का ‘चक्रव्यूह’ः नेताम पर
  • गाज,बेनी को कुर्सी—महज संयोग या सुनियोजित खेल?


न्यूज डेस्क
रायपुर,08 मार्च 2026 (घटती-घटना)। खाद्य एवं औषधि प्रशासन का दफ्तर इन दिनों किसी मेडिकल विभाग से ज्यादा राजनीतिक शतरंज का बोर्ड नजर आ रहा है,यहां मोहरे दवाइयों के नहीं, अधिकारियों के चल रहे हैं,सवाल यह है कि नकली दवाइयों पर सख्त कार्रवाई करने वाले अधिकारी संजय कुमार नेताम अचानक कैसे ‘नियमों के उल्लंघनकर्ता’ घोषित कर दिए गए? और क्या इसी दौरान रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी की कुर्सी पर बेनी राम साहू की ताजपोशी महज संयोग है या एक सोचा-समझा ‘चक्रव्यूह’? (नोटः यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों,सूत्रों और विभागीय घटनाक्रम पर आधारित है। संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर प्रकाशित किया जाएगा।)


जिम्मेदारियों का पहाड़ या शक्ति का केंद्रीकरण?
बेनी राम साहू,सहायक औषधि नियंत्रक,एक ऐसे अधिकारी के रूप में चर्चित हैं जिनके पास जिम्मेदारियों की सूची इतनी लंबी है कि पढ़ते-पढ़ते ही थकान हो जाए,स्थापना,स्टोर,स्टेट लाइसेंस अथॉरिटी (होम्योपैथी मैन्युफैक्चरिंग),ब्लड बैंक कंट्रोलिंग अथॉरिटी, एनडीपीएस ड्रग्स,अस्पताल निरीक्षण,बलौदाबाजार लाइसेंस अथॉरिटी—और अंततः रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी का बहुप्रतीक्षित प्रभार, प्रश्न यह है की क्या विभाग में अधिकारियों की ऐसी भारी कमी है कि एक ही अधिकारी ‘सुपर कंट्रोलर’ बन जाए? या फिर यह कुर्सियों के केंद्रीकरण की वह रणनीति है जिसमें सारी चाबियां एक ही जेब में रखी जाती हैं? राजनीतिक पृष्ठभूमि भी कम दिलचस्प नहीं। भाजपा के पूर्व विधायक परिवार से संबंध, मजबूत संगठनात्मक पकड़, ऐसे में विभागीय फैसलों की दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

10 दिसंबर 2025: जब खेल पलटा
कहानी शुरू होती है 10 दिसंबर 2025 से,रायपुर में सहायक औषधि नियंत्रक संजय कुमार नेताम ने गोल्डन ट्रांसपोर्ट के गोदाम से नकली दवाइयों की खेप पकड़ी,यह खेप इंदौर की ‘मां बिजासन ट्रेडिंग’ से आई बताई गई,गंतव्य—भाटापारा की प्रेम प्रकाश एजेंसी और सारंगढ़ की सरस्वती मेडिकोज, डिब्बों पर ‘सरस्वती मेडिकोज,सारंगढ़’ अंकित था,मामला साधारण नहीं था यह सीधा जनस्वास्थ्य से जुड़ा अपराध था।
15 दिसंबर से 15 जनवरी तक, निरीक्षण से बाहर…फिर छुट्टी में ‘अंदर’… दोस्ती की ऐसी डोज कि नियम भी हो गए बेअसर
15 दिसंबर 2025 को प्रेम प्रकाश एजेंसी,भाटापारा के निरीक्षण में ईश्वरी नारायण सिंह, नीरज साहू और राजेश सोनी शामिल थे,सैंपल लिए गए,लेकिन कार्रवाई असरदार नहीं रही,इसके बाद नीरज साहू की भूमिका पर संदेह गहराया,15 जनवरी 2026 को दोबारा निरीक्षण के लिए नई टीम बनी,इस बार नीरज साहू को निरीक्षण दल से हटा दिया गया,कागजों में वे बाहर थे और 15-16 जनवरी को वे पारिवारिक कार्यक्रम के लिए अवकाश पर भी थे,लेकिन तस्वीरों में वे फिर निरीक्षण स्थल पर दिखे ईश्वरी नारायण सिंह के साथ, बताया गया कि ‘सहयोग’ के नाम पर उन्हें जोड़ा गया,अब सवाल सीधा था की जिस अधिकारी पर संदेह था, जिसे टीम से हटाया गया, जो छुट्टी पर था तो फिर वह जांच स्थल पर कैसे पहुंच गया? और संयोग देखिए की जिस दिन टीम पहुंची, दुकान पहले से खाली मिली,क्या यह सिर्फ दोस्ती थी? या फिर नियमों को दरकिनार कर कोई ‘सेटिंग’ की पटकथा लिखी जा रही थी? नकली दवा जैसे गंभीर मामले में यदि निरीक्षण दल की संरचना ही सवालों में हो, तो कार्रवाई की विश्वसनीयता खुद-ब-खुद कठघरे में खड़ी हो जाती है,निरीक्षण दल में छुट्टी के दिन एक अधिकारी को बुलाया गया, आलोचना या फिरी प्रक्रियात्मक त्रुटि थी,पर यहां भी कार्रवाई आधी-अधूरी रही, वेतन रोका गया, पर कठोर दंड नहीं, कहा जा रहा है कि ‘ईश्वरी शक्ति’ कुछ लोगों को बचा रही थी और इस शक्ति का नाम फुसफुसाहटों में बेनी राम साहू बताया जा रहा है।
16 दिसंबर 2025 पहली टीम,पहला संदेह
प्रेम प्रकाश एजेंसी और सारंगढ़ की जांच के लिए टीम गठित की गई, जिसमें शामिल थे ईश्वरी नारायण सिंह,औषधि निरीक्षक,नीरज साहू,औषधि निरीक्षक,राजेश सोनी,नमूना सहायक साथ में रायगढ़ के औषधि निरीक्षक अमित राठौर और विजय राठौर, सारंगढ़ में टीम गठित हुई,जांच में लगभग 2.25 लाख रुपये की दवाइयां जब्त हुईं,पर वे वही दवाइयां नहीं थीं जो ट्रांसपोर्ट में मिली थीं,विभाग असंतुष्ट रहा, यहीं से कहानी में ‘गड़बड़ी की गंध’ आने लगी।
20 दिसंबर 2025 दूसरी रेड, 27 लाख की जब्ती
ऊपर से आदेश आया,नई टीम भेजी गई,इस बार 27 लाख रुपये की दवाइयां जब्त हुईं,मामला गंभीर हो चुका था,23 दिसंबर को स्पष्टीकरण मांगा गया,पर यहीं पर प्रशासनिक ‘न्याय’ की परिभाषा बदलती दिखी—कुछ अधिकारियों का वेतन रोका गया,कुछ को निलंबित कर दिया गया,सवाल यह कि एक ही प्रकरण में दंड अलग-अलग क्यों? क्या गलती का वजन अलग-अलग तराजू में तोला गया? भाटापाराः निरीक्षण से पहले खाली दुकान
15 जनवरी 2026 को प्रेम प्रकाश एजेंसी की जांच होनी थी,टीम पहुंची—दुकान खाली मिली ना दवा, ना स्टॉक,क्या यह महज संयोग था? या फिर सूचना पहले ही लीक हो चुकी थी? यदि निरीक्षण से पहले दुकान खाली हो जाती है तो यह विभागीय विफलता नहीं, बल्कि आंतरिक सांठगांठ की ओर इशारा करता है, सवाल यह है कि सूचना किसने पहुंचाई? और क्यों?
28 जनवरी 2026 वीडियो और सीधा निलंबन
अब आते हैं कहानी के चरम पर,28 जनवरी को वही अधिकारी संजय कुमार नेताम जो ट्रांसपोर्ट से नकली दवा पकड़ चुके थे,सारंगढ़ में 27 लाख की जब्ती कर चुके थे,एक सार्वजनिक स्थान पर संबंधित व्यक्ति से बातचीत करते दिखे,वीडियो वायरल हुआ, बिना लंबा स्पष्टीकरण के सीधा निलंबन की कार्यवाही और प्रश्नों की झड़ी लग गई क्या कारण बताओ नोटिस दिया गया? क्या प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत लागू हुआ? क्या वीडियो में स्पष्ट अपराध दिखा? यदि बातचीत सार्वजनिक स्थल पर थी, मीडिया मौजूद थी,तो इसे गुप्त साठगांठ कैसे मान लिया गया?
कुर्सी का समीकरण
और ठीक इसी दौरान—रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी का प्रभार बदल जाता है,बेनी राम साहू को वह कुर्सी मिल जाती है जिसके लिए वे लंबे समय से प्रयासरत बताए जाते थे,तो क्या यह सब घटनाएं महज संयोग थीं? या फिर यह वही चक्रव्यूह था जिसमें अभिमन्यु की तरह नेताम फंस गए?
नकली दवा से ज्यादा ‘कंट्रोल’ की चिंता?
पूरे घटनाक्रम में एक बात साफ दिखती है की नकली दवा बेचने वालों पर कार्रवाई से ज्यादा ऊर्जा विभागीय खींचतान में खर्च होती दिखी, दुकान खाली कैसे हुई? सूचना किसने दी? चेन में और कौन शामिल है? इन सवालों से ज्यादा जोर वीडियो और निलंबन पर रहा।
राजनीतिक संरक्षण की परछाई
बेनी राम साहू की राजनीतिक पृष्ठभूमि चर्चा का विषय है, जब एक अधिकारी के पास असामान्य रूप से अधिक प्रभार हों और संवेदनशील मामले के बीच अचानक बदलाव हो जाए, तो राजनीतिक संरक्षण की आशंका उठना स्वाभाविक है,हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है,पर विभाग के गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि ‘कुर्सी की जंग’ में नियमों को मोहरा बनाया गया।
विभागीय न्याय या चयनात्मक सख्ती?
एक ही प्रकरण में किसी का वेतन रोका जाता है, किसी को निलंबित किया जाता है,किसी को प्रमोशन जैसा प्रभार मिल जाता है,क्या यह समानता का सिद्धांत है? या फिर विभागीय न्याय भी परिस्थितियों के अनुसार ‘डोज एडजस्ट’ करता है?
जनस्वास्थ्य बनाम सत्ता संतुलन
नकली दवाइयां किसी भी समाज के लिए जहर हैं, यह सीधे मरीज की जान से खेलना है,पर यहां फोकस बदलता दिखा और मरीजों की सुरक्षा से ज्यादा कुर्सियों की सुरक्षा महत्वपूर्ण नजर आई,यदि कार्रवाई करने वाला अधिकारी ही संदिग्ध बना दिया जाए, तो भविष्य में कौन जोखिम उठाएगा?
कार्रवाईः अलग-अलग दंड
स्पष्टीकरण के बाद ईश्वरी नारायण सिंह और नीरज साहू का वेतन रोका गया,अमित ठाकुर और विजय ठाकुर को निलंबित किया गया,एक ही मामले में अलग-अलग कार्रवाई ने सवाल खड़े किए।
चक्रव्यूह से बाहर कौन निकलेगा? पूरे घटनाक्रम ने कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए हैं…
– निरीक्षण से पहले प्रेम प्रकाश एजेंसी खाली कैसे हुई?
– नीरज साहू अवकाश में रहते हुए निरीक्षण में कैसे शामिल हुए?
– अलग-अलग अधिकारियों पर अलग-अलग दंड का आधार क्या था?
– क्या संजय कुमार नेताम को प्राकृतिक न्याय के तहत पूरा अवसर दिया गया?
– प्रभार परिवर्तन का समय क्या महज प्रशासनिक संयोग था?
– सूचना लीक की जांच क्यों नहीं?
– अलग-अलग दंड का आधार क्या?
– निलंबन से पहले विस्तृत सुनवाई क्यों नहीं?
– प्रभार परिवर्तन का समय इतना सटीक कैसे?
जब तक इन सवालों का स्पष्ट और पारदर्शी उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह मामला विभागीय फाइलों में दर्ज एक और विवाद बनकर रह जाएगा, फिलहाल इतना तय है, नकली दवा के खिलाफ छेड़ी गई जंग अब विभागीय राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है, और यह तय करना बाकी है कि असली दोषी कौन है,दवा माफिया,विभागीय सांठगांठ या कुर्सी का आकर्षण।
पूरे घटनाक्रम के प्रमुख नाम
– संजय कुमार नेताम – सहायक औषधि नियंत्रक (निलंबित)
– बेनी राम साहू – सहायक औषधि नियंत्रक, वर्तमान रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी
– दीपक कुमार अग्रवाल – नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन,छत्तीसगढ़
– ईश्वरी नारायण सिंह – औषधि निरीक्षक (वेतन रोका)
– नीरज साहू – औषधि निरीक्षक (वेतन रोका)
– राजेश सोनी – नमूना सहायक
– सुरेश कुमार साहू – औषधि निरीक्षक
– टेकचंद धीरहे – औषधि निरीक्षक
– अमित राठौर -औषधि निरीक्षक,रायगढ़ (निलंबित)
– विजय राठौर -औषधि निरीक्षक,रायगढ़ (निलंबित)


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