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बैकुण्ठपुर@पुलिसकर्मियों के वायरल चैट कांड के 1 साल पूरे फिर भी सवाल वही पत्रकार दोषी कैसे?

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  • एक साल पूर्व पुलिसकर्मियों के वायरल चैट पर खबर प्रकाशित कर जांच की मांग करना पड़ा था भारी, पत्रकार ही बना अपराधी
  • खबर प्रकाशित कर पहली बार कोरिया पुलिस के डॉयरी में मैं बतौर अपराधी हुआ दर्ज:रवि सिंह
  • 3 फरवरी 2022 को खबर प्रकाशित कर पहली बार बना अपराधी
  • चैट वायरल हुआ था पुलिसकर्मियों का और अपराध पंजीबद्ध हुआ पत्रकार पर
  • क्या कोरिया पुलिस की द्वेष ने पत्रकार को बना दिया अपराधी?
  • वायरल चैट में दिख रहे थे पुलिस कर्मियों के नंबर फिर भी पुलिसकर्मियों तक नहीं पहुंची जांच की आंच क्यों?
  • पुलिस ना तो अपने कर्मचारियों के वायरल चैट की जांच करा पाई और ना चैट वायरल करने तक पहुंच पाई,पत्रकार पर मामला पंजीबद्ध कर अपनी पीठ थपथपाई
  • वायरल चैट में कई पुलिसकर्मियों के आए थे नाम,जहां तक पहुंचनी थी जांच की लपटें जो पहुची नहीं,चैट का ठीकरा फुटा पत्रकार पर
  • वही पुलिसकर्मियों पर 2016 में मामला पंजीबद्ध करने के लिए न्यायालय ने दिया था आदेश पर बिना नाम के अज्ञात बताकर क्यों किया गया मामला पंजीबद्ध?
  • मामला पंजीकृत होने के बावजूद बिना जमानत हुआ बिना विभागीय जांच के पुलिसकर्मी आज भी काट रहे नौकरी?
  • जहां एफआईआर दर्ज होते हैं नौकरी से पृथक होना था पर पुलिसकर्मि प्रभाव में आज भी काट रहे अपनी नौकरी
  • वायरल चैट मामले में उच्च अधिकारियों ने अपने कर्मचारीयों पर क्यों नहीं की कार्यवाही?
  • कोरिया पुलिस के अंदर ही कलह की स्थिति है जो सोशल मीडिया पर बार-बार देखी जा रही है कौन दूर करेगा इस कलह को?

-रवि सिंह –
बैकुण्ठपुर 02 फरवरी 2023(घटती-घटना)।
अक्सर यह कहा जाता है कि पुलिस वालों से बड़ा गुंडा कोई नहीं होता वह इसलिए कहा जाता है क्योंकि यदि पुलिस अपने गुंडई पर आ जाए तो अच्छे-अच्छे गुंडे थरथर कांपते हैं और कांपना भी चाहिए पर कोरिया पुलिस इसके पूरा विपरीत है पुलिस विभाग यहां पर पुलिस वाले गुंडों से गुंडे नहीं थरथर कांपते आम जनमानस ही थरथर कांपती है क्योंकि यहां की पुलिस द्वेष पूर्वक कार्यवाही करने में निपुण हो गई है, पुलिस वाले की अंतरात्मा कुछ इस प्रकार से हो गई है कि वह यह सोच बैठे हैं जो वह जो कर रहे हैं उसे करने दिया जाए यदि कोई उनके रास्ते में आएगा और उनके उपरी कमाई में बाधा बनेगा तो वह उसको कभी भी निपटा सकते हैं क्योंकि इनके पास एफआईआर दर्ज करने की बहुत बड़ी ताकत है जिसका दुरूपयोग भी पुलिस अपने स्वर्थ के लिए करती है, यदि कोई भी इनके कमियां दिखाएगा तो वह पुलिस का दुश्मन होगा और उसके विरुद्ध द्वेष पूर्वक एफआईआर दर्ज करने में इनके हाथ पाव बिल्कुल नहीं फुलेगे। कुछ ऐसा ही मामला कोरिया जिले से जुड़ा हुआ है जहां 2 फरवरी 2022 को पुलिसकर्मियों के आपसी बातचीत व्हाट्सएप चैट अनजान नंबर से वायरल हुआ था जिसमें पुलिस अधीक्षक कार्यालय के कर्मचारी से लेकर थाना प्रभारी व प्रधान आरक्षक तक का नाम सामने आया था जिसमें अपने ही अधिकारियों के लिए आपत्तिजनक बात की गई थी जिस खबर के प्रकाशन के बाद पुलिस कर्मचारियों को बचाने के लिए पत्रकार पर ही मामला पंजीबद्ध कर उस चैट को तैयार करने का आरोप अपने ही पुलिसकर्मी को प्रार्थी बनाकर लगा दिया था और उसके बाद पत्रकार को पकड़ने के लिए अपनी सारी सीमाएं लांघ दी थी पर आज 1 साल बाद भी पुलिस ना तो उस व्हाट्सएप चैट की वास्तविकता का पता लगा पाई और ना ही उस व्हाट्सएप चैट को वायरल करने वाले तक पहुंच पाए सिर्फ पहुंच पाई तो उस चैट का खबर प्रकाशन कर जांच करने की मांग करने वाले पत्रकार तक उन्हें पत्रकार पर अपराध पंजीबद्ध करना आसान लगा।
पत्रकार पर मामला पंजीबद्ध करना पुलिस के लिए आसान,पुलिस पर मामला पंजीबद्ध कौन करें?
पुलिस पत्रकार पर या अन्य निर्दोषों पर बिना जांच के मामला पंजीबद्ध तो कर लेती है पर जब खुद इनके ऊपर मामला पंजीबद्ध होने की बारी आती है तो घबरा जाते हैं फिर बचाव के लिए पूरे पैतरे अजमाने लगते है एक तो इन की शिकायत हो भी जाए तो इन्ही के अधिकारी इन्हें बचाने लगते है जब की वह भी जानते है की उनका कर्मचारी गलत व दोषी है पुलिस के खिलाफ कितनी भी शिकायत हो जाए यही वजह है कि जांच तो उसी विभाग के अधिकारी को करना है जिस वजह से उन्हें हर बार बच निकलने में सहूलियत होती है, इनके ऊपर तो कार्यवाही तब होती है जब कोई इनके पीछे पड़ जाए उच्च स्तर पर या फिर न्यायालय की शरण ले तब जाकर उसे जीत हासिल हो पाती है पर जीत के आने के बाद ही फिर उसी विभाग के कार्यालय के चक्कर लगाकर अपने चप्पल घिसने पढ़ते हैं फिर भी राहत नहीं मिलती कुछ ऐसा ही मामला है कुछ सालों पहले कि जहां पर एक व्यक्ति के प्रभाव में पुलिस वाले एक महिला का घर तोड़ने व कब्जा दिलाने के लिए चले जाते हैं उस महिला की शिकायत पर अपराध पंजीबद्ध नहीं होता तब महिला को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है तब वहां पर उच्च न्यायालय संज्ञान लेते हुए अपराध पंजीबद्ध करने तो कहता है जिसके बाद 10 दिन के बाद उस मामले में अपराध पंजीबद्ध होता है पर उस पंजीबद्ध एफआईआर में पुलिस कर्मियों का नाम नहीं होता, वर्ष 2016 में एक महिला की शिकायत पर पुलिसकर्मियों ने मामला पंजीबद्ध नहीं किया तब उसने उच्च न्यायालय शरण लिया लिया था जिसमें उच्च न्यायालय ने 29 नवम्बर 2016 को अपराध पंजीबद्ध करने का आदेश दिया था, जिसमें नामजद अपराध पंजीबद्ध होना था पर पुलिस वाले ही जब अपराध पंजीबद्ध करते हैं तो अपने ही पुलिस वालों का नाम कैसे लिख सकते हैं बिना नाम के ही उन्होंने 9 दिसंबर 2016 को अपराध पंजीबद्ध किया, जिसमें उन्होंने पुलिसकर्मियों के नाम की जगह अज्ञात लिख दिया पर सवाल यह है कि हाईकोर्ट के आदेश में सभी के नाम दिए गए थे पर इसके बावजूद पुलिस ने नामजद अपराध दर्ज नहीं किया ना आज तक उन पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी हुई और ना ही वह पुलिसकर्मी ने जमानत लिया और ना ही विभागीय जांच ही सही से हो पाई, अब समझा जा सकता है कि पुलिसकर्मी यदि करें तो सब सही बाकी ऊपर पुलिस टूट पड़ती है जबकि संविधान में साफ है कि पुलिसकर्मी भी यदि दोषी हैं तो उन पर भी अपराध पंजीबद्ध होना चाहिए पर अक्सर खाकी खाकी की मदद ही करता है और बचने का पूरा प्रयास करता है।
यह था पूरा मामला
ज्ञात हो कि कोरिया जिले के इतिहास में चैट कांड हमेशा याद किया जाएगा यह कांड इतना बड़ा कांड था कि इसमें पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही होनी थी पर पुलिसकर्मियों के सह पर और पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए पत्रकार पर ही मामला पंजीबद्ध किया गया था जिसके बाद पुलिस खुद भी सवालों के घेरे में फंसती दिखे, कई सवाल पुलिस के एफआईआर होने को लेकर खड़े हुए पर किसी का भी जवाब पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नहीं दे सकी, यहां तक की चैट फर्जी है यह भी पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नहीं बता पाया सिर्फ अंदर खाने में ही चैट को फर्जी मानकर पत्रकार के ऊपर गंभीर धाराओं के तहत मामला पंजीबद्ध करने के लिए अपने ही विभाग के एक पुलिसकर्मी को खड़ा कर चैट को कूट रचित बनाने का आरोप लगाया गया, जबकि उस चैट को पत्रकार ने ना तो कहीं पर भी शेयर किया था और ना ही उससे पत्रकार का कोई लेना देना था, जिस ग्रुप में वह चैट वायरल हुआ था उस ग्रुप में पुलिस प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी, जिला प्रशासन के अधिकारी सहित जनप्रतिनिधि व दर्जनों पत्रकार सहित 200 से अधिक सदस्य उस ग्रुप में शामिल थे जिन्होंने उस चैट को देखा था यहां तक की विभाग के स्टेनो ने खबर प्रकाशन से पहले अपने बचाव में पुलिस अधीक्षक को चैट वायरल होने की जानकारी दी थी खबर का प्रकाशन तो उसके बाद 3 फरवरी 2022 को हुआ था, सारे पुलिसकर्मी जो इस चैट को लेकर फंस रहे थे, तभी सभी मिलकर अपने ही अधिकारी को बरगला कर पूरे मामले को पत्रकार की तरफ मोड़ दिया था जिसके बाद पत्रकार को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी तब वहां से जमानत पर आज तक चल रहे।
पत्रकार टारगेट में क्यों?
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार ढोलक हो चुका है जो चाहे वह बजा कर चला जाए जो इस समय होता भी दिख रहा है, प्रशासन की कमियों को प्रकाशित करें तो प्रशासन के टारगेट में पत्रकार, पुलिस की कमियों को प्रकाशित करें तो पुलिस प्रशासन के टारगेट में पत्रकार, नेताओं की कमियों को प्रकाशित करें तो नेताओं के टारगेट में पत्रकार, अवैध कारोबारियों की खबर प्रकाशित करें तो अवैध कारोबारियों के टारगेट में पत्रकार, अब सवाल यह है कि आखिर पत्रकार क्या टारगेट में रहने के लिए ही खबर प्रकाशित करें? जिस कदर पत्रकारों को अवैध कारोबारी धमका रहे हैं क्या पत्रकार खबर प्रकाशित नहीं करेगा और कोई पुलिस वाला ही उनका कारोबार बंद करा देगा तो क्या पुलिस वाले को भी धमका पाएंगे यह अवैध कारोबारी? या फिर सिर्फ खबर प्रकाशन से अवैध कारोबार बंद होने पर ही पत्रकारों के साथ होगी मारपीट? जबकि पत्रकार सिर्फ खबर प्रकाशित कर सकता है ना कि अवैध कारोबारियों का काम बंद करा सकता है? काम बंद करना तो पुलिस प्रशासन काम है फिर भी पत्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए सिर्फ खबर प्रकाशन कर संबंधित विभाग को जानकारी देने का काम करता है पर यदि इस जानकारी देने के बाद भी उसकी आफत बढ़ती है तो फिर समझ लीजिए की स्थित क्या?
पुलिस अधीक्षक के स्टेनो खुद वाट्सएप चैट के जांच की मांग की पर क्या जाँच हुई?
मामले में जिस दिन वाट्सएप चैट जारी हुआ था ठीक उसी दिन खुद पुलिस अधीक्षक के स्टेनो ने अपने पुलिस अधीक्षक कोरिया को शिकायत पत्र सौंपकर जांच की मांग की थी और कहा था की उनकी स्वच्छ, बेदाग और निष्पक्ष छवि को धूमिल करने का यह कुत्सित प्रयास है और यह आधारहीन साथ ही सत्य से अलग हटकर असत्य वाट्सएप चैट है जिसकी जांच होनी चाहिए,वहीं जांच की मांग को अब कुछ लोग यह कहकर भी स्टेनो के लिए जरूरी बता रहें हैं क्योंकि पुलिस विभाग में जांच ही सबसे महत्वपूर्ण हथियार है किसी पुलिसकर्मी के बचने के लिए यदि कार्यवाही होने से पहले जांच का विषय पहले सामने आ जाये तो फिर पूरा मामला सम्हल जाने का पूरा विश्वास उत्तपन्न हो जाता है क्योंकि पुलिस की शिकायत की जांच पुलिस को करनी होती है और बात बन जाने की पूरी संभावना होती है। स्टेनो ने शिकायत व जिस आरक्षक के खिलाफ बातें की गई थी उस आरक्षक ने भी शिकायत कर जांच की मांग की साथी यह तक पत्रकार ने भी खबर प्रकाशित कर वायरल चैट की जांच करने की मांग की पर मांग के बीच जहां पुलिसकर्मियों के उस चैट की जांच होनी थी और उन पुलिसकर्मियों से स्पष्टीकरण मांगाना था जिनका नंबर उस कथित वायरल चैट में दिख रहा था पर उसकी जगह पत्रकार पर मामला पंजीबद्ध करना पुलिस के लिए आसान लगा और अपने कर्मचारियों को बचाना सही समझा, अब सवाल यह उठता है क्या अपने ही कर्मचारियों की शिकायत पर पुलिस ने जांच करना उचित नहीं समझा और आज तक क्या जांच नहीं हुई? आखिर वायरल चैट सही था या फिर फेक था और यदि फेक था तो किसने वायरल किया और क्यों वायरल किया? इस तक आज तक पुलिस नहीं पहुंच पाई।
खबर पढ़कर समुदाय विशेष भी हुआ अवगत
पत्रकार की खबर पढ़कर समुदाय विशेष भी सोशल मिडीया में चल रही समाज के संदर्भ के लिखी जा रही अमर्यादित टिप्पणियों से अवगत हो सका और लिखने वाले पर कार्यवाही की मांग करने लगा,लेकिन पूरे मामले में पुलिस ने पत्रकार को ही दोषी ठहरा दिया गया था और उसके ऊपर एफआईआर दर्ज कर लिया,जबकि समुदाय विशेष के लोगों का भी यही मानना था और है कि जिस सोशल मीडिया वाट्सएप समूह की सूचना से पत्रकार ने खबर का प्रकाशन किया उक्त खबर से समाज अपने विरुद्ध लिखे जा रहे अप्रिय शदों से अवगत हो सका और यह समाचार पत्र की खबर से ही संभव हो सका और इसको लेकर पत्रकार को दोषी मानना न्यायोचित कहीं से नहीं होगा। वहीं अब लगभग सभी लोगों का मानना है कि पत्रकार ने समाज विरुद्ध जब कोई टिप्पणी की ही नही तो दोषी पत्रकार को ठहराया जाना कहां तक सही होगा क्योंकि पत्रकार ने तो समुदाय विशेष के सामने उन विषयों को अपने खबर के माध्यम से पहुचाने का प्रयास किया जो समुदाय विशेष को लेकर विरुद्ध लिखे जा रहे थे।
पत्रकार पूरे मामले में कैसे षड्यंत्रकारी हो सकता है?
पत्रकार पूरे मामले में कैसे षड्यंत्रकारी हो सकता है जबकि उसने कुछ छिपाने की बजाए सार्वजनिक रूप से यह सामने लाने का प्रयास किया कि सोशल मीडिया समूह के वाट्सएप समूह में कुछ ऐसा भी चल रहा है जो सभी के लिए जानना जरूरी है क्योंकि उस समूह में जिले के अन्य पत्रकारों सहित कई जनप्रतिनिधि व पुलिसकर्मि भी मौजूद हैं और जो विषय पर ठीक ढंग से सज्ञान नहीं ले रहें हैं। पत्रकार रवि सिंह पर कोरिया पुलिस के द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को लेकर अब प्रदेशभर के पत्रकार फिर से पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करने लगे हैं जिससे किसी खबर को लेकर किसी पत्रकार को इस तरह से कानूनी रूप से प्रताडि़त न होना पड़े। पत्रकार रवि सिंह पर दर्ज आनन फानन वाली एफआईआर को खत्म करने के लिए प्रदेशभर में पत्रकार सुरक्षा समिति ज्ञापन सौंप रही है और अभी तक 20 जिलों में ज्ञापन सौंपा जा चुका है। पूरे मामले में पत्रकार द्वारा समुदाय विशेष से भी आग्रह किया जा चुका है कि उसकी मंशा किसी को आहत करने की कतई नहीं थी और न ही उसने यह भी अपनी खबरों में लिखा जो कुछ समाचार में लिखा जा रहा है वह सत्य ही है पत्रकार ने सोशल मीडिया समूह के वाट्सएप समूह में चल रही एक ऐसी चैट को खबर बनाया जो शायद एक समुदाय विशेष के लिए गलत शब्दों के साथ लिखा जा रहा था और जिसमें षड्यंत्र की भी सुगबुगाहट थी। पत्रकार की खबर से कहीं न कहीं समुदाय विशेष भी उस सोशल मीडिया चैट से अवगत हो सका और सभी कुछ समाज व पुलिस के सामने आ सका।
कोरिया पुलिस में देखी गई थी आपसी कलह
पूर्व पुलिस अधीक्षक विवेक शुक्ला के जाने के बाद कोरिया जिले के अंदर पुलिस विभाग में अचानक कलह की स्थिति क्यों निर्मित हो गयी ऐसे सवाल हर तरफ सुनायी पड़ रही है। उनके जाने के बाद से ही कोरिया पुलिस के अंदर काफी लंबे समय से कलह उत्पन्न है इस कलह की वजह कोई और नहीं विभाग के ही विवादित पुलिस कर्मचारी हैं जो अधिकारीयों को ही अपने वश में करने का हुनर रखते है। यही वजह है कि कुछ पुलिस कर्मचारी ही विवादित है जो हमेशा सुर्खियों में रहते हैं इनके खिलाफ शिकायतें भी खूब होती हैं और खबर छापने पर पत्रकार के प्रति विवादित पुलिसकर्मी द्वेष भी रखते हैं,कर्मचारियों के बीच कलह की स्थिति इसलिए निर्मित है क्योंकि अधिकारी इन विवादित कर्मचारियों पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं यही की वजह है कि अधिकारियों की लापरवाही से उनके कर्मचारी अनुशासन हीन हो चले हैं जिसका परिणाम है कि सोशल मीडिया हो या समाज पुलिस की छवि किस प्रकार धूमिल हो रही है यह साफ देखा जा सकता है पर अभी भी उच्च अधिकारी अपने कर्मचारियों को समझ जाएं तो शायद कोरिया की पुलिस अच्छी हो सकती है,पर क्या अधिकारी ऐसे कर्मचारियों को समझ पाएंगे या फिर इन पर अपने मेहरबानी बनाए रखेंगे और इन्हीं के मुताबिक सब कुछ होता रहेगा या फिर कहें तो अपने अधिकारीयों के लिये कमाऊं पुत्र बने रहेंगे?
मामले से जुड़े कुछ सवाल
सवाल: व्हाट्सअप ग्रुप में कथित पुलिस के बीच के स्क्रीनशॉट कैसे हुआ वायरल,वायरल करने वाले का क्या है मकसद, क्या पुलिस इस दृष्टिकोण से सोची?
सवाल: वायरल करने वाले तक क्यों नहीं पहुंच पा रही पुलिस?
सवाल: क्या खबर प्रकाशित कर पुलिस के सामने लाना अपराध है?
सवाल: पुलिस जान रही किस नम्बर से चैट हुआ वायरल फिर भी पत्रकार से क्यों जानना चाह रही कि कहां से मिला चैट?
सवाल: खबर पर यदि किसी को परेशानी हुई तो पहले विधिक तौर पर बयान के लिये क्यों नहीं दी नोटिस? सीधे दर्ज क्यों किया गया मामला
सवाल: कथित वायरल चैट की जानकारी खबर प्रकाशन से पहले पुलिस को थी फिर पत्रकार दोषी कैसे?
सवाल: पुलिस इतनी ही पाकसाफ थी तो प्रेस कान्फेंरस कर क्यों नहीं बताई की फर्जी था चैट
सवाल: प्रधान आरक्षक जिसके खिलाफ कई मामलो पर उनकी शिकायत लंबित है और उन्हीं को जांच में मुख्य भूमिका प्रदान की गयी है क्या यह सही है?
सवाल: प्रधान आरक्षक के सन्दर्भ में यदि जांच की जाये तो इनके खिलाफ शिकायतों की लम्बी फेहरिस्त है और कथित चैट में इनका भी नाम का उल्लेख किया गया था,वैसे जांच में इनसे बड़ा दोषी कोई नहीं पाया जायेगा जो तय है?
सवाल: पटना थाना के तत्कालीन प्रभारी सौरव द्विवेदी जिनकी कार्यप्रणाली शैली पर पहले भी सवाल उठ¸े है और खबर भी प्रकाशित हुये, कथित वायरल चैट में इनका भी नाम था और इस मामले की जांच में भी अधिकारी इन्हीं का सहारा लिया तो कैसे निष्पक्ष होगी जांच?
सवाल: क्या पत्रकार पर फर्जी एफआईआर करने के बाद महिला और नाबालिक बच्चे को परेशान करने का पुलिस को अधिकार था?
सवाल: पत्रकार को पकड़ने की चाह में कोरिया जिले की पुलिस अपनी हद भूल गई और महिला व बच्चे के साथ वह किया जो अन्यायपूर्ण व्यवहार था?


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