अपने ही घर से कब कब भगाए गए हो,बिना कारण कहां कहां लतियाये गए हो,तुम्हारे विरुद्ध हुए अत्याचार की बातक्या तुम्हें कचोटता नहीं,इतिहास की अधूरी जानकारी परतू खुद अपने बाल क्यों नोचता नहीं,दोष तुम्हारा नहीं तुम्हारी शिक्षा का है,चमत्कारियों से मिल जायेइस झूठी प्रतीक्षा का है,क्यों महत्व नहीं दिया अपनी शिक्षा को,और महत्व दिया नहीं सामाजिक दीक्षा को,शिक्षा से दूर …
Read More »संपादकीय
लेख@परमाणु वैज्ञानिक डॉ श्रीकुमार बनर्जी की पुण्यतिथि 23 मई 25 पर विशेष
परमाणु ऊर्जा और परमाणु सामग्री के क्षेत्र में अग्रणी डॉ. श्रीकुमार बनर्जी का जन्म 25 अप्रैल 1946 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने 1967 में आईआईटी खड़गपुर से धातुकर्म इंजीनियरिंग में प्रौद्योगिकी स्नातक की डिग्री प्राप्त की और उसके बाद 1968 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के प्रशिक्षण विद्यालय के 11वें बैच से उत्तीर्ण हुए। डॉ. बनर्जी ने भाभा परमाणु …
Read More »लेख@हरियाणा के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का अंतिम संस्कार
जब पूरी क्लास फेल होती है,तो सिस्टम अपराधी होता है… हरियाणा के 18 सरकारी स्कूलों में 12वीं का रिजल्ट शून्य प्रतिशत रहा, जो राज्य प्रायोजित शैक्षिक विफलता का संकेत है। यह केवल छात्रों की असफलता नहीं,बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी है—जिसमें शिक्षक नहीं,संसाधन नहीं और जवाबदेही भी नहीं। सरकार को पहले से इन स्कूलों की हालत पता थी, फिर …
Read More »कविता@उसूलों का राही…
उसूलों पे चलने वाला कापाँव में पड़ जाता है छालाकर्ण बहिरा बन। जाता हैलव पे लटक जाता है तालादिल का सच्चा वो होता हैना होता है मन का वो कालाईष्या द्वेष की ना है फितरतसच्चा मन सच्चा दिलवालापाँव में ठोकर खा वो गिरतादिल में उम्मीदों को है पालापथ चाहे कितना मुश्किल होपार कर जाता कठिन सा नालाउसूलों पे चलने की …
Read More »कविता@उपेक्षित नारीःविधवा…
समाज की एक उपेक्षित नारीजनमानस कहते जिनको बेवादुर्भाग्य का प्रतीक समझते जिनकोजिनके साथ जुड़े तरह-तरह की भेवाइनके प्रति होते नकारात्मक भावऔर रूढç¸वादी विचारधारासामाजिक कार्यों से होती अलगावसब खुशहाली,पर्वों से होती किनाराजैसे उनकी परछाई या स्पर्श सेअशुभ लक्षण हममें भी घिर आयेगीज्यों हुए वह खुशियों से वंचितवैसे ही हमारे जीवन को भर जायेगीमुंडन,षष्ठी,विवाह हो चाहे अन्य कारजअमांगलिक सा बर्ताव होतीअछूत सा …
Read More »लेख@विलुप्त होती प्रजातियां:जीवन के अस्तित्व पर संकट की दस्तक
मनुष्यों की ही भांति जीव-जंतु और पेड़-पौधे भी इस धरती के अभिन्न अंग हैं लेकिन विडंबना यह है कि मनुष्य ने अपने स्वार्थों और तथाकथित विकास की दौड़ में इनके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई,शहरीकरण, औद्योगीकरण और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के चलते वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासउजड़ चुके हैं और वनस्पतियों की कई प्रजातियां …
Read More »लेख@मनुज को मनुज ही क्यों खाये
मनुष्यता सच्चरित्र की कुंजी है जिसमें प्रेम,त्याग और समपर्ण की गाथा है जहाँ यह तीनों नहीं वहां समझो मनुष्यता नही पशुता है। पशुता में शाकाहारी और मांसाहारी पशु होते है,जो अपने अपने स्वभाव अनुसार भोजन ग्रहण करते है,मांसाहारी के समक्ष जो भी जीव जंतु आ जाए तो वह उसका भोजन होता है,जब भूख लगी वह उनका शिकार कर भोजन ग्रहण …
Read More »लेख@ऑपरेशन सिंदूर:भारत की ताकत और विपक्ष की राजनीति का नया द्वंद्व
ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं,बल्कि भारत की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति का एक सशक्त प्रतीक बन चुका है । इस ऑपरेशन ने न केवल सीमाओं पर बैठे दुश्मनों को सीधा संदेश दिया है,बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत की स्थिति को मजबूत किया है। देशभर में इस ऑपरेशन की सराहना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा …
Read More »कविता@श्मशान घाट में मंडराया खतरा..
माँ का निधन हुआ बेटों ने निकाली अंतिम यात्रा,लेके गए नजदीकी श्मशान घाट मंडराया खतरा।विवाद अस्सी वर्षीय महिला छीतर रेगर के गहने,उसने जीवंत रहते ही अंतिम समय तक थे पहने।मुख्य लोगों ने शव को चिता पर रखने से पहले,श्रृंगार के गहने सेवाभावी बड़े बेटे को सौंपे रहले।माँ का निधन हुआ बेटों ने निकाली अंतिम यात्रा,लेके गए नजदीकी श्मशान घाट मंडराया …
Read More »लेख@श्रेष्ठ सफलता के लिए चिंता नही चिंतन की आवश्यकता
निराशा और चिंता मनुष्य के जीवन की प्रगति के बड़े बाधक हैं। निराशा को तत्काल विचारों से अलग करें और चिंता को अपने मस्तिष्क में ना आने दे अन्यथा अत्यधिक चिंता व्यक्ति को चिता तक ले जाने में देर नहीं करती है अतः सकारात्मक सोच के साथ नवीन संकल्प और दृढ़ निश्चय रखकर जीवन के पथ में अग्रसर हो होंद्य …
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