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लेख@मनुज को मनुज ही क्यों खाये

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मनुष्यता सच्चरित्र की कुंजी है जिसमें प्रेम,त्याग और समपर्ण की गाथा है जहाँ यह तीनों नहीं वहां समझो मनुष्यता नही पशुता है। पशुता में शाकाहारी और मांसाहारी पशु होते है,जो अपने अपने स्वभाव अनुसार भोजन ग्रहण करते है,मांसाहारी के समक्ष जो भी जीव जंतु आ जाए तो वह उसका भोजन होता है,जब भूख लगी वह उनका शिकार कर भोजन ग्रहण करने बैठ जाता है। मांसाहारी पशु को भूख लगने पर उसका प्रेम सिर्फ भोजन से होता है,वह सामने वाले पशु को अपना आहार समझते समय उससे प्रेम कर अपनी भूख को त्यागने का ख्याल नहीं लाता बल्कि भूख के प्रति समर्पित हो शिकार को अपना धर्म समझकर शिकार करता है और पेट की भूख शांत करता है,किन्तु जब उसे भूख नहीं लगती तब वह आगामी भूख के लिए शिकार की व्यवस्था नहीं करता है। यानी पशु भी आवश्यकता पड़ने पर पशु होता है, शेष समय वह पशु होकर भी पशुता को नहीं जीता है। जरा मनुज की बात कर ले, मनुज इस समय अन्न से उबकर पशुता की सारी सीमाए लांघ चुका है। मनुज मनुज होने की लिए जन्मा है किन्तु आज का मनुज अपने आहार में पशुओ को भी भोजन रूप में ग्रहण कर अपने पेट को कब्रिस्तान बना चूका है, अब पशुओं के हांड मांस ने उसे मनुष्यता से गिरा दिया है और वह असुर बन मनुष्यों को निगलने के बाद पानी भी नही पी रही है।
आज देखा जाए जो मनुष्यों के जीवन का एक तिहाई बिना चरित्र के ही बीत चूका होता है लेकिन फिर भी वह समाज दुनिया के सामने खुद को चरित्रवान साबित करने में कोई कसर नही छोड़ रहा है। पद प्रतिष्ठा, शौहरत और धन- दौलत के लिए वह पशु बन जाता है किन्तु खुदको चरित्रवान साबित करके ही दम लेता है। जरा देखिये आज मनुष्यता कहा जाकर ठहर गई है जिसका आंकलन कर पाना मुश्किल है। एक घटना याद आती है जिसमें एक युवा प्रेम के बदले अपने मित्र का खून कर देता है, मित्र मारा जाता है,युवा जेल चला जाता है जिस युवती के प्रेम के चक्कर में दोनों मित्र स्वार्थ के दलदल में ईर्ष्यालु हुए,युवती को इनके प्रेम से कोई लेना देना नहीं था वह विवाह कर समाज में सुखमय गृहस्थी जीती है और इधर एक मित्र का जीवन समाप्त हो जाता है और दुसरे को जेल होने के बाद उसका सामाजिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। दूसरी और अगर जीवन के रंगों को देखें तो हर किसी के जीवन में दैन्य और अभाव बालसखा हैं, जो जन्म से अब तक सच्चे मित्र की तरह साथ-साथ है और महँगाई ढीठ-हरजाई-जैसी प्रेमिका है, जो कहीं भी जाएँ पीछा नहीं छोड़ती है। कुछेक लोग कुर्सियों की खेती करते है ताकि उनकी बोई कुर्सी पर वे ही विराजमान रहे,उनका पूरा व्यक्तित्व उस कुर्सी के इर्द गिर्द रहता है,वे अपनी कुर्सी पर जिसे बिठाये वे उनके लिए उनकी टोपी,उनका जूता भर है, जरुरत पड़ने पर वही कुर्सी उनके कब्जे में आकर उन्हें मान सम्मान और शौहरत दिलाती है। टोपी और जूते शौहरत का प्रसाद पाने भागे भागे फिरते है और वे कुर्सी स्थान पर काबिज हो कुर्सी के शान शौकत को चमकाने वालों को बच्चों की तरह पुचकारने और पत्नी को देख जो मुस्कुराहट बिखेरते है वह मुस्कुराहट सभी और नजर आती है, पर उसके पीछे के खौफ से होने वाली तबाही से वे उसी प्रकार निश्चित होते है जैसे संत-सन्यासी गृहस्थी से होते है, वे सभी को नजरअंदाज कर खुद को तीसमारखाँ समझ हरेक खौफ से आँखे बंद किये इस प्रकार निश्चित होते है मानों माया-मोह के सारे बंधन उन्होंने अपने-आप काट दिए हो ।
मैं पत्रकार होने के नाते इन घटनाओं और सभी बातों का सनसनीखेज समाचार पाठकों को परोसने में कितना सफल होता हूँ, यह बात में नहीं कहूँगा। किन्तु यह विचार मेरे मन में आज भी कौंधता है की आखिर प्रेम का इतना वीभत्स रूप हो सकता है जिसमें मित्र का मित्र से प्रेम भयावह, घृणित और अप्रिय रूप धारण करले और हत्या करने की स्थिति बन जाए तो यह प्रेम कहा हुआ? प्रेम तो त्याग समर्पण का दूसरा रूप है, युवती के लिए प्रेम ने प्रेम के लिए समर्पण ही किया है, न की अपने लिए या मित्र या अन्य के लिए नाश का साधन जुटाया है,अगर प्रेम के नाम पर यह अपराध हुआ है, तो यह मूर्खता है,पागलपन है, इस मुर्खता और पागलपन को प्रेम का नाम दिया ही नहीं जा सकता है। यह तो मनुष्यता के विपरीत अमानुषता है जिसमें जैसे जंगल में जंगली जानवरों और पशु का आहार जंगली जानवर-पशु ही होते है वैसे ही मनुज हो गया जो खुद मनुज को खाने लगा है, अर्थात मनुष्य ही स्वार्थ में तल्लीन होकर द्वेष भावना से ग्रसित हो मनुष्यता पर हमला कर दूसरे मनुष्य को समाप्त करने पर तुल जाए। वीरों की अपनी पहचान होती है जो देश के लिए समाज के लिया अपने प्राणों की आहुति हँसते-हँसते देने को तत्पर होते है, किन्तु देश के वीर सैनिको की बात छोड़ दी जाए तो आज समाज के ढांचे में दिखावटी जीवन जीने वाले अधिकांश वे लोग है जो आतिशवाजी जलाने के बाद उसे तोप-गोला बताकर अपनी वीरता के किस्से स्थानीय समाचार पत्रों में एक-एक पेज में प्रकाशित करवा कर समाज से अपनी करनी का लोहा मनवाते है। राम अपने पिता को दिए वचन का पालन करने 14 वर्ष के वनवास को निकल पड़ते है, स्पष्ट है समाज में दिए गए वचन के लिए प्राण देने वालों का समय था आज वचन तोडकर प्राण लेने वालों का समय है। प्रेम के नाम पर मरण की तांडव कला में आज का मनुष्य ही नहीं अपितु समाज भी इसमें रंगता जा रहा है, निश्चित ही कहा जा सकता है कि आज का मनुष्य जीवन जीने की कला,सिद्धांत और मान्य परम्पराओं की नीति और रीति का ज्ञान भुला चूका है और खुदको समर्थ शक्तिशाली समझ स्वेच्छाचारी हो गया है, जिसके समक्ष मनुष्यता शर्म से
पानी पानी हुई जा रही है।
राजनीति की कुर्सी हो या खुद की बोई गई कुर्सी, कुर्सी को मनुष्यता से कोई लेना देना नहीं है,असल देखा जाए तो दुनियाभर की कुर्सियों के फलने फूलने या जिन्दा रहने के एक भी भोज्य पदार्थ है और वह है आश्वासन। कुर्सियां आश्वासन के खाद-बीज पाकर पनपती है और झूठ के रसायन से समृद्धि का सूरज या चरित्र का सोना उपहार में देकर कुर्सासीन का भाग्य चमकाती है। कुर्सियों पर बैठाने वालों को अनगर्ल आरोप मिलते है की दान देकर महानता दिखाना बहुत ही सरल है लेकिन व्यवहार सम्भाल कर इंसानियत दिखाना उतना ही कठिन है। मनुज मनुज को खाते समय भी चरित्र की दुहाई दे और खुद अनैतिकता के लिए पश्चाताप न करे, ऐसे मनुज की बातों के क्या मायने? हाँ कुर्सी पाकर वह साधुता धारण कार ले तो साधु के तो गुण है की वह अपनी आत्मा के कल्याण के लिए जयघोष करेगा और वह कहने लगे अपनी आत्मा को ऊँचा उठाऊंगा ऊंचा ऊंचा और ऊंचा कि वह जीते-जो जाकर परमात्मा में मिल जाए, जो समझ लेना वह साधुता आपके हृदय में विराजमान सीता का हरण करने जा रहा है, उसके प्राण कुर्सी में बसते है, कुर्सी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।


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