आज का युग सूचना और संचार का युग है। इंटरनेट,सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विचारों के आदान-प्रदान को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। एक समय था जब जनमत बनाने का काम अखबारों, पत्रिकाओं और टेलीविजन तक सीमित था, लेकिन अब एक साधारण मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन के माध्यम से कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा …
Read More »संपादकीय
लेख@शहीद कहलाने लायक भी नहीं माने गए…सिर्फ नाविक थे न…
राष्ट्र के लिए जान देने वाले,राष्ट्र की नजर में अनजान क्यों?हार्मुज-ओमान क्षेत्र की लहरें अब तेल नहीं, भारतीय खून बहा रही हैं… कुछ मौतें केवल परिवारों को नहीं रुलातीं,वे राष्ट्र के विवेक को भी कठघरे में खड़ा कर देती हैं। जून 2026 में दुनिया फीफा विश्व कप की चमक-दमक और जीत-हार के रोमांच में डूबी है,लेकिन इसी बीच हार्मुज के …
Read More »लेख@महोब्बत क्या है…
महोब्बत एक खुशनुमा एहसास है, जिसमें दर्द है, इंतज़ार है,कभी – कभी बेवजह की तकलीफ़ भी है। फिर भी हर इंसान को अपनी महोब्बत की तलाश है क्योंकि जहां महोब्बत होती हैं, वहां उम्मीद होती हैं,जिम्मेदारी होती हैं, रिश्ते निभाने की समझदारी होती हैं और एक नई जिंदगी की कहानी होती हैं। महोब्बत का कोई रंग-रूप, जाति-धर्म नहीं होता,महोब्बत तो …
Read More »लेख@विनम्रता,सहजता और संकल्प बड़ी सफलता के मार्ग
मनुष्य सदैव प्रयास करता है कि उसे लक्ष्य और सफलता जल्द से जल्द प्राप्त हो पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं है,स्थाई सफलता के लिए कठोर श्रम, संकल्प,सहजता और विनम्रता सच्चे सन्मार्ग हैं। जल्दी का काम शैतान का होता है ऐसा कहावतें कहती है,लक्ष्य प्राप्ति के लिए जीवन में निरंतर श्रम सहजता सरलता और संघर्ष के साथ संयम का बड़ा योगदान …
Read More »लेख@कैसा है यह महिला सशक्तिकरण
शताब्दियो से हमारा समाज पुरुष प्रधान रहा है। घर के अंदर और घर के बाहर सभी फैसले पुरुषों द्वारा ही लिए जाते हैं। घोड़ी पर बैठकर पुरुष महिला के साथ विवाह करके घर लाता है। जहां वह अपने ससुराल वालों की सेवा करती है, बच्चे पैदा करती है और अगर कोई औरत बेटा पैदा करने के बदले में बेटियां पैदा …
Read More »लेख@स्त्री नहीं,सोच घर बनाती और बिगाड़ती है…
यह कौन-सा नियम है जहां दोष पहले से तय होता है?परिवार की सफलता और विफलता का बोझ केवल महिलाओं पर क्यों? हमारे समाज में कुछ फैसले ऐसे हैं जिन पर कभी बहस नहीं हुई, फिर भी वे अंतिम सत्य मान लिए गए हैं। उन्हीं में से एक है—घर बनाती भी स्त्री है और और घर बिगाड़ती भी वही है। परिवार …
Read More »लेख@भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ता अविश्वास
भारत और बांग्लादेश के संबंध दक्षिण एशिया की कूटनीति में विशेष महत्व रखते हैं। वर्ष 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय भारत ने जिस प्रकार राजनीतिक,सैन्य और मानवीय सहयोग प्रदान किया, उसने दोनों देशों के बीच मैत्री और विश्वास की मजबूत नींव रखी। पिछले पाँच दशकों में व्यापार, सुरक्षा,ऊर्जा,संपर्क,जल संसाधन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति …
Read More »लेख@बचपन को श्रम नहीं,शिक्षा,सुरक्षा और सम्मान का अधिकार मिलें
5 हर वर्ष 12 जून को मनाया जाने वाला बाल श्रम के विरुद्ध विश्व दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं,बल्कि मानवता के अंतःकरण को झकझोरने वाला अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि दुनिया का कोई भी बच्चा मजदूर बनने के लिए पैदा नहीं होता। उसके हाथों में औजार,ईंट,बर्तन, हथौड़े, कूड़े की बोरी या कारखानों की मशीनें नहीं,बल्कि …
Read More »लेख@व्यूज की अंधी दौड़ में लहूलुहान होती सामाजिक मर्यादा
गुरुग्राम के एक स्टैंडअप कॉमेडी शो में रु 370 की बिरयानी की कीमत एक महिला की अस्मिता से लगाने वाले दर्शक का वीडियो और उस पर ताली पीटते कॉमेडियन प्रणीत मोरे का ठहाका सिर्फ एक तात्कालिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय स्टैंडअप कॉमेडी के उस गहरे नैतिक और वैचारिक पतन का दस्तावेज़ है,जो पिछले एक दशक से धीरे-धीरे हमारे समाज में …
Read More »लेख@अदालत में रसूख का खेल
अमीर को बेल…गरीब को जेल…भारतीय न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को लेकर आम आदमी के मन में हमेशा से एक गहरी उलझन रही है। कानून की किताबों में लिखा है कि न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी होती है, यानी वह अमीर-गरीब,बड़े-छोटे,मशहूर-गुमनाम सबको एक तराजू पर तौलती है। लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इस आदर्श की धज्जियां उड़ाती नजर आती है। …
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