01 नवंबर 2000 को देश के नक्शे पर छत्तीसगढ़ के रूप में एक नए राज्य का उदय हुआ था। अलग राज्य की परिकल्पना के पीछे यहां के लोगों की अपनी पहचान, बेहतर विकास,रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ्य और खुशहाली की आकांक्षाएं जुड़ी थीं। आज 26 वर्ष बाद छत्तीसगढ़ अपनी अलग पहचान स्थापित कर चुका है। इन वर्षों में प्रदेश ने कृषि,बिजली,खनिज,उद्योग,सड़क,शिक्षा और स्वास्थ्य सहित …
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संपादकीय@जब चुनाव आयोग की कुर्सी पर ‘टाइगर’ बैठा था
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे एक अधिकारी ने एक दिन ऐसा संदेश दिया था, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी। नाम था—टी.एन. शेषन। दिसंबर 1990 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला और बहुत जल्दी यह स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आयोग किसी सरकार का विभाग नहीं है।कहा जाता है कि …
Read More »लेख@ वकालत को सुरक्षित पेशा ही नहीं,सुरक्षित जीवन भी चाहिए : अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी
छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण की नई परिकल्पना : सुरक्षा,शुरुआती संघर्ष, बीमारी,वृद्धावस्था और न्यायालयीन कार्यस्थल…पांचों मोर्चों पर एक समग्र व्यवस्था की जरूरत…किसी न्यायालय में जब कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल की ओर से खड़ा होकर तर्क रखता है,तो सामने दिखाई देता है केवल उसका पेशेवर पक्ष। उसके पीछे एक ऐसा जीवन भी है जिसमें रोज की तैयारी, लगातार अध्ययन, न्यायालयीन दौड़-भाग,मुवक्किलों की …
Read More »संपादकीय@ सड़कें गड्ढों में नहीं,व्यवस्था की जवाबदेही में फंसी हैं…
सरगुजा की सड़कें इन दिनों केवल राहगीरों की परीक्षा नहीं ले रहीं,बल्कि व्यवस्था की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रही हैं। सड़क पर गड्ढा होना सामान्य बात हो सकती है,लेकिन एक ही सड़क का बार-बार टूटना,बारिश आते ही सड़क का गड्ढों में बदल जाना और मरम्मत के नाम पर कुछ दिनों के लिए खानापूर्ति कर देना सामान्य नहीं कहा …
Read More »संपादकीय@घोषणाओं से आगे बढ़े छत्तीसगढ़ अब फैसलों को चाहिए जमीन
500 करोड़ का स्टार्टअप मिशन,33 जिलों में उद्यमिता केंद्र और नई निर्यात नीति—साय सरकार ने विकास की दिशा तो तय की, अब परिणाम दिखाने की बारी है किसी सरकार की दिशा उसके भाषणों से नहीं,उसके फैसलों से दिखाई देती है। और फैसलों की असली कीमत तब सामने आती है,जब उनका असर फाइलों से निकलकर खेत,कारखाने, बाजार और युवा की जिंदगी …
Read More »संपादकीय@ एक कमेंट से पत्थर तकः आखिर हम कब सीखेंगे कि सोशल मीडिया खिलौना नहीं है?
बिलासपुर की हिंसक झड़प ने फिर चेताया…शब्द स्क्रीन पर लिखे जाते हैं,लेकिन उनका असर सड़क तक पहुंच सकता है। बिलासपुर के खपरगंज में सोशल मीडिया पर किए गए कथित आपत्तिजनक कमेंट से शुरू हुआ विवाद देर रात दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प और पथराव तक पहुंच गया। स्थिति संभालने पहुंची पुलिस भी पथराव की चपेट में आई और थाना …
Read More »संपादकीय@पोस्टर में कमजोर विद्यार्थी, असली परीक्षा में सरकार
छत्तीसगढ़ की राजनीति में पोस्टर वार ने फिर गर्माया माहौल;व्यंग्य के पीछे उठे सवालों का जवाब नारों से नहीं,काम से देना होगाछत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों पोस्टर केवल दीवारों पर चिपके कागज नहीं रह गए हैं। वे सत्ता और विपक्ष के बीच चल रहे राजनीतिक संवाद,आरोप-प्रत्यारोप और जनता के बीच अपनी-अपनी कहानी स्थापित करने का माध्यम बन चुके हैं। …
Read More »संपादकीय@ संत की वाणी में संयम जरूरी
अयोध्या के महंत राजू दास और कुंवर सिंह निषाद के बीच विवाद ने फिर खड़ा किया सवाल—धार्मिक पद गरिमा देता है, अपशब्द बोलने का अधिकार नहींअयोध्या केवल एक शहर नहीं,करोड़ों लोगों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। हनुमानगढ़ी जैसे धार्मिक स्थल से जुड़े संत-महंतों से समाज सामान्य व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक संयम, मर्यादा और विनम्रता की अपेक्षा …
Read More »संपादकीय@मिठास की धरती पर चीनी महंगी क्यों?
जिस देश ने दुनिया को चीनी बनाना सिखाया,आज उसी देश में मिठास की कीमत आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही है । भारत में चीनी केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है। यह हमारी संस्कृति,त्योहारों,परंपराओं और सामाजिक जीवन का हिस्सा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक,खुशी से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक—चीनी,गुड़ और मिठाई हमारी जिंदगी में किसी न किसी …
Read More »संपादकीय@जब अफसर की सख्ती से खाने की थाली तक बदलने लगे रंग
तुकाराम मुंढे का ‘FDA मॉडल’ बना चर्चा का विषय,लेकिन असली चुनौती कार्रवाई से आगे जाकर व्यवस्था को स्थायी रूप से बदलने की खाना हमारी जिंदगी की सबसे बुनियादी जरूरत है। लेकिन जिस चीज के बिना जीवन संभव नहीं, उसी भोजन की गुणवत्ता को लेकर हमारा समाज अक्सर सबसे ज्यादा लापरवाह दिखाई देता है। चमचमाते होटल हों या सड़क किनारे का …
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